कैंसर की दवाओं की MRP और असली कीमत में कितना अंतर? दिल्ली के दवा बाजार से उठा बड़ा सवाल

कैंसर की दवाओं की MRP और असली कीमत में कितना अंतर? दिल्ली के दवा बाजार से उठा बड़ा सवाल

नई दिल्ली: कैंसर का इलाज पहले ही मरीजों और उनके परिवारों के लिए आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण होता है। ऐसे में जीवनरक्षक दवाओं की कीमतों को लेकर एक बार फिर सवाल उठ रहे हैं। दिल्ली के दवा थोक बाजार में दवाओं की अधिकतम खुदरा कीमत (MRP) और रिटेलर को मिलने वाली कीमत (PTR) के बीच अंतर ने दवा मूल्य निर्धारण की व्यवस्था पर बहस तेज कर दी है।

सितंबर 2026 में सामने आई एक ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, कुछ कैंसर दवाओं की पैकेट पर छपी कीमत और खुदरा विक्रेताओं को मिलने वाली कीमत में काफी बड़ा अंतर देखा गया। इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने भी चिंता जताई थी।

₹2,700 की दवा पर ₹27,000 की MRP ने खड़े किए सवाल

दवा मूल्य निर्धारण को लेकर चर्चा उस उदाहरण के बाद तेज हुई, जिसमें एक कैंसर दवा की रिटेलर को मिलने वाली कीमत लगभग ₹2,700 बताई गई, जबकि उसकी MRP करीब ₹27,000 थी। यानी पैकेट पर छपी अधिकतम कीमत, रिटेलर की खरीद कीमत से लगभग दस गुना थी। इस अंतर पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए।

हालांकि, MRP और PTR के बीच का अंतर अपने आप में किसी एक पक्ष के वास्तविक मुनाफे को नहीं बताता। दवा की आपूर्ति श्रृंखला, वितरण लागत, कर, छूट और अन्य व्यावसायिक खर्चों को समझना भी जरूरी है। वास्तविक मार्जिन का आकलन संबंधित दवा और उसके बिक्री रिकॉर्ड के आधार पर किया जाना चाहिए।

MRP, PTR और ट्रेड मार्जिन क्या होते हैं?

दवाओं की कीमत समझने के लिए इन तीन शब्दों का अर्थ जानना जरूरी है।

  • MRP (Maximum Retail Price): दवा के पैकेट पर छपी अधिकतम खुदरा कीमत, जिससे अधिक पर सामान्यतः बिक्री नहीं की जा सकती।
  • PTR (Price to Retailer): वह कीमत जिस पर दवा निर्माता या वितरक खुदरा विक्रेता अथवा मेडिकल स्टोर को दवा उपलब्ध कराता है।
  • ट्रेड मार्जिन: दवा की आपूर्ति श्रृंखला में खरीद और बिक्री कीमतों के बीच का अंतर, जिसमें संबंधित कारोबार के खर्च और लाभ शामिल हो सकते हैं।

यदि MRP और PTR के बीच अंतर बहुत अधिक हो, तो यह सवाल उठता है कि मरीज को दवा किस कीमत पर मिल रही है और मूल्य निर्धारण की व्यवस्था कितनी पारदर्शी है।

सभी दवाओं पर एक जैसी कीमत नियंत्रण व्यवस्था नहीं

भारत में दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO), 2013 और नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) की महत्वपूर्ण भूमिका है।

निर्धारित सूची में शामिल दवाओं की कीमतों पर सरकार द्वारा सीमा तय की जाती है। वहीं, सूची से बाहर की दवाओं के लिए शुरुआती कीमत तय करने की व्यवस्था अलग है। इसी अंतर को लेकर दवा मूल्य नियंत्रण के मौजूदा ढांचे पर सवाल उठते रहे हैं।

कैंसर मरीजों पर क्यों पड़ता है आर्थिक बोझ?

कैंसर के इलाज में कई बार लंबे समय तक दवाओं, जांच, अस्पताल में भर्ती और नियमित चिकित्सकीय देखभाल की जरूरत होती है। यदि किसी मरीज को महंगी दवाएं लगातार खरीदनी पड़ें, तो परिवार की बचत पर दबाव बढ़ सकता है।

विशेष रूप से उन परिवारों के लिए यह स्थिति कठिन हो सकती है, जिनके पास पर्याप्त स्वास्थ्य बीमा या आर्थिक संसाधन नहीं हैं। ऐसे में दवाओं की कीमतों में पारदर्शिता, उचित मूल्य निर्धारण और सस्ती उपचार सुविधाएं महत्वपूर्ण हो जाती हैं।

आगे क्या जरूरी है?

दवाओं की कीमतों पर प्रभावी निगरानी के लिए कुछ प्रमुख कदम महत्वपूर्ण हैं:

  • दवा की MRP और वास्तविक बिक्री कीमत की पारदर्शी जानकारी।
  • असामान्य रूप से अधिक ट्रेड मार्जिन की जांच।
  • लागू मूल्य नियंत्रण नियमों का प्रभावी पालन।
  • मरीजों को उपलब्ध छूट और कम कीमत वाले वैकल्पिक विकल्पों की जानकारी।
  • दवा निर्माताओं, वितरकों, अस्पतालों और खुदरा विक्रेताओं की मूल्य निर्धारण प्रक्रिया की जवाबदेही।

निष्कर्ष

कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के इलाज में दवाओं की उपलब्धता के साथ उनकी कीमत भी अहम है। MRP और PTR के बीच बड़े अंतर के उदाहरण ने यह सवाल सामने रखा है कि दवा मूल्य निर्धारण की व्यवस्था मरीजों के हितों की रक्षा किस तरह कर सकती है।

जरूरत इस बात की है कि दवाओं की कीमतों और ट्रेड मार्जिन की जांच तथ्यों के आधार पर हो तथा मरीजों को सुरक्षित, प्रभावी और किफायती उपचार उपलब्ध कराने के लिए पारदर्शी व्यवस्था मजबूत की जाए।

Leave a Reply

Your email address will not be published.