Faridabad News: नवरात्र और दुर्गा पूजा के दौरान मां दुर्गा की भव्य प्रतिमाएं श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बनती हैं। इन प्रतिमाओं के पीछे मूर्तिकारों की महीनों की मेहनत, कला और आस्था जुड़ी होती है। हरियाणा के फरीदाबाद में पदमा और उनके पति पिछले करीब 30 वर्षों से मां दुर्गा की प्रतिमाएं बनाने का काम कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल से आए इस दंपती की बनाई मूर्तियों की मांग दिल्ली-एनसीआर से लेकर राजस्थान तक बताई जा रही है।
16 फीट ऊंची प्रतिमा की कीमत करीब 2 लाख रुपये
इस बार पदमा और उनके पति ने करीब 16 फीट ऊंची मां दुर्गा की प्रतिमा तैयार की है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस प्रतिमा का ऑर्डर गाजियाबाद के एक संगठन ने दिया है। इसकी कीमत करीब 2 लाख रुपये बताई गई है।
गाजियाबाद के इंदिरापुरम निवासी दिप्तेंद्र बोस के मुताबिक, उनका संगठन इस बार दुर्गा पूजा का 20वां आयोजन कर रहा है। इसके लिए उन्होंने फरीदाबाद से करीब 16 फीट ऊंची प्रतिमा बनवाई है। उन्होंने बताया कि उनका संगठन कई वर्षों से यहीं से प्रतिमा ले रहा है और उन्हें मूर्तियों की कीमत तथा बनाने का तरीका पसंद है।
30 साल से मूर्ति बनाने में जुटा है दंपती
पदमा और उनके पति ने करीब तीन दशक पहले मिट्टी से मूर्तियां बनाने का काम शुरू किया था। धीरे-धीरे उनका अनुभव और कला इस काम की पहचान बन गई। दुर्गा पूजा के दौरान बड़ी और आकर्षक प्रतिमाओं की मांग के बीच मूर्तिकारों के लिए हर प्रतिमा को तय समय पर तैयार करना एक बड़ी जिम्मेदारी होती है।
मूर्ति निर्माण में केवल आकार देना ही नहीं, बल्कि चेहरे के भाव, हाथों की बनावट, वस्त्रों की सजावट और रंगों के संयोजन पर भी ध्यान देना पड़ता है। प्रतिमा का अंतिम रूप उसकी बारीक कारीगरी और कलाकार के अनुभव को दिखाता है।
फरीदाबाद से दिल्ली-एनसीआर और राजस्थान तक मांग
फरीदाबाद में तैयार की जा रही इन प्रतिमाओं की मांग आसपास के क्षेत्रों के अलावा दिल्ली-एनसीआर और राजस्थान तक बताई गई है। दुर्गा पूजा समितियां अपनी जगह, पंडाल और आयोजन की जरूरत के हिसाब से प्रतिमाओं का आकार और डिजाइन तय करती हैं।
करीब 16 फीट ऊंची प्रतिमा का गाजियाबाद जाना इस बात को भी दिखाता है कि धार्मिक आयोजनों के साथ पारंपरिक मूर्तिकला से जुड़े कारीगरों का काम अलग-अलग शहरों तक पहुंच रहा है।
आस्था के साथ जुड़ी है कारीगरों की मेहनत
दुर्गा पूजा के दौरान मां दुर्गा की प्रतिमा श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र होती है, लेकिन इसे तैयार करने वाले कलाकारों की मेहनत अक्सर पर्दे के पीछे रह जाती है। पदमा और उनके पति जैसे कारीगर अपनी कला के जरिए इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। तीन दशक से जारी उनका काम दिखाता है कि पारंपरिक हस्तकला आज भी धार्मिक आयोजनों और स्थानीय कारीगरों की आजीविका का अहम हिस्सा है।
नोट: यह लेख उपलब्ध प्रकाशित रिपोर्टों में दी गई जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है।

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