सपा-बसपा और भाजपा की वोटबैंक जंग तेज

उत्तर प्रदेश की सियासी जमीन पर 2027 के विधानसभा चुनावों की आहट तेज हो चली है। सितंबर 2025 का यह दौर एक नया रंग लिए हुए है, जहां सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अपने संगठन को पुनर्जनन देने में जुटी है, वहीं विपक्षी दल समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) जमीनी स्तर पर अपनी रणनीतियों को धार दे रहे हैं। यह नजारा यूपी की सियासत में लंबे अरसे बाद देखने को मिल रहा है, जहां विपक्ष एकजुट और आक्रामक दिखाई दे रहा है। सपा गैर-यादव ओबीसी और दलित वोटों को अपने पाले में लाने के लिए हरसंभव कोशिश कर रही है, तो बसपा अपने खोए हुए दलित आधार को फिर से जोड़ने की पुरजोर जद्दोजहद में है। अमर उजाला की शैली में कहें तो यह एक ऐसा सियासी रणक्षेत्र है, जहां जातिगत समीकरण, विकास की बातें और नेताओं की चतुर रणनीतियां मिलकर 2027 का भविष्य तय करेंगी।

समाजवादी पार्टी की रणनीति इस बार बेहद सधी और दूरदर्शी है। अखिलेश यादव ने 2024 के लोकसभा चुनावों में मिली कामयाबी से सबक लिया है, जहां उनके पीडीए पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक समीकरण ने यूपी में 37 सीटें दिलाईं। अब सपा का पूरा जोर गैर-यादव ओबीसी जातियों पर है। सैनी, कुशवाहा, शाक्य, गुर्जर और पासी जैसे समुदाय, जो 2024 में भाजपा से नाराज होकर सपा की ओर झुके, अब पार्टी के निशाने पर हैं। हाल ही में सपा नेतृत्व ने इन समुदायों के नेताओं के साथ कई दौर की बैठकों का आयोजन किया। पश्चिमी यूपी से सैनी समाज के विधायक, पूर्वी यूपी से कुशवाहा सांसद और शाक्य समाज के प्रतिनिधि इन चर्चाओं में शामिल रहे। पार्टी के सूत्र बताते हैं कि इन नेताओं को अपने-अपने इलाकों में पीडीए चौपालें लगाने के निर्देश दिए गए हैं। इन चौपालों का मकसद है कि ये समुदाय सपा के साथ जुड़ें और उनके मुद्दों को समझा जाए। जब ये चौपालें कामयाब हो जाएंगी, तब अखिलेश यादव खुद इन समुदायों के बीच रैलियां करेंगे। गुर्जर समुदाय को भी इसी तरह सक्रिय करने की योजना है, क्योंकि यह समुदाय भी भाजपा की नीतियों से खफा नजर आ रहा है।

2022 के विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनावों में सपा की जीत ने इस रणनीति को बल दिया। सिराथू से पल्लवी पटेल, जौनपुर से बाबू सिंह कुशवाहा और अयोध्या से अवधेश प्रसाद की जीत इसके ठोस उदाहरण हैं। सपा ने गैर-यादव ओबीसी की बूथ स्तर तक मैपिंग कराई है, ताकि हर सीट पर सटीक रणनीति बनाई जा सके। इसके साथ ही दलित उपजातियों, खासकर जाटव और पासी, पर भी पार्टी की नजर है। बसपा का जनाधार कमजोर होने के कारण सपा को लगता है कि ये वोट उसके पाले में आ सकते हैं। हाल ही में लखनऊ में एक सभा में अखिलेश ने जोर देकर कहा, भाजपा का ‘400 पार’ का सपना 2027 में चूर-चूर होगा। हम नौकरियों को स्थायी करेंगे, आउटसोर्सिंग बंद करेंगे और नौकरशाही में पारदर्शिता लाएंगे। उनकी यह बातें न केवल कार्यकर्ताओं में जोश भर रही हैं, बल्कि युवा और पिछड़े वर्ग के मतदाताओं को भी लुभा रही हैं। सपा ने उन 108 विधानसभा सीटों को चिह्नित किया है, जहां पिछले तीन चुनावों में हार मिली थी। अब इन सीटों पर कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने का अभियान शुरू हो चुका है। इंडिया गठबंधन की एकता को बनाए रखते हुए सपा 2027 में और मजबूती से मैदान में उतरेगी। अखिलेश ने कार्यकर्ताओं को चेताया कि भाजपा चुनाव में धांधली की साजिश रच सकती है, इसलिए हर कदम पर सतर्क रहना होगा।

दूसरी ओर, बहुजन समाज पार्टी अपने पुराने रुतबे को फिर से हासिल करने के लिए जी-जान से जुटी है। मायावती 9 अक्टूबर 2025 को लखनऊ के कांशीराम स्मारक स्थल पर बसपा संस्थापक कांशीराम की पुण्यतिथि पर एक विशाल रैली करेंगी। नौ साल बाद होने वाली यह रैली 2027 के लिए बसपा का शंखनाद मानी जा रही है। लाखों कार्यकर्ताओं और समर्थकों के जुटने की उम्मीद है। पार्टी ने हर चार विधानसभा क्षेत्रों के लिए एक-एक बस की व्यवस्था की है, ताकि लोग आसानी से रैली में पहुंच सकें। मायावती इस मंच से दलित वोटों को एकजुट करने का आह्वान करेंगी। सूत्रों का कहना है कि मायावती पुराने नेताओं को वापस लाने की कोशिश करेंगी। स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे नेताओं पर खास नजर है, जो कभी बसपा के करीबी थे और अब भाजपा में हैं। इस रैली के बाद लखनऊ के रामाबाई अंबेडकर मैदान में एक और बड़ी सभा की योजना है। बसपा के लिए यह समय कठिन है। पिछले तीन लोकसभा और विधानसभा चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन लगातार कमजोर हुआ। 2019 में एक भी सीट नहीं मिली, 2024 में भी खाता नहीं खुला। परंपरागत दलित वोटबैंक का बड़ा हिस्सा सपा और भाजपा की ओर खिसक गया। फिर भी, कई दलित मतदाता आज भी दिल से बसपा से जुड़े हैं, बस वोट खराब न हो, इसलिए दूसरी पार्टियों का रुख कर लिया।

मायावती अगर इस वर्ग में यह भरोसा जगा पाईं कि बसपा पूरी ताकत से वापसी कर रही है, तो उनका कोर वोटबैंक लौट सकता है। पार्टी फिर से दलित सम्मान और पहचान का मुद्दा उठा रही है, जो कभी उसकी ताकत थी। मायावती के भतीजे आकाश आनंद को युवा चेहरा बनाकर पेश किया जा रहा है। ब्राह्मण सम्मेलनों की शुरुआत सतीश चंद्रा मिश्रा के नेतृत्व में होगी। इसके अलावा, मुसलमानों और अति पिछड़ों को जोड़ने का अभियान भी तेज है। बसपा अध्यक्ष विश्वनाथ पाल कहते हैं, अखिलेश का पीडीए ‘परिवार दल एलायंस’ है। सपा की सत्ता सिर्फ यादवों तक सीमित रहती है। बसपा में निषाद, राजभर, चौरहरा जैसे समुदाय मजबूत हुए। मायावती के शासन में अपराध पर सख्ती थी, अफसर समय पर काम करते थे। जनता उन्हें फिर मुख्यमंत्री देखना चाहती है।

भाजपा की रणनीति अभी धीमी गति से चल रही है। संगठन में फेरबदल की प्रतीक्षा है, लेकिन जैसे ही योगी आदित्यनाथ और जेपी नड्डा सक्रिय होंगे, मैदान गर्म हो जाएगा। भाजपा ने गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलितों को साधने में खासा जोर लगाया है। उज्ज्वला, आयुष्मान भारत और पीएम आवास जैसी योजनाओं से इन वर्गों को जोड़ा गया। संगठन और सरकार में उनकी भागीदारी ने भाजपा को हर वर्ग में स्वीकार्य बनाया। यूपी भाजपा प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी कहते हैं, “मायावती का जादू अब खत्म हो चुका है। दलित मतदाता जानते हैं कि मोदी-योगी सरकार उनके बच्चों का भविष्य संवार रही है। बसपा की रैली बस दिखावा है, जातिवादी सियासत का दौर लद गया।” जवाब में सपा प्रवक्ता मोहम्मद आजम खान कहते हैं, “अखिलेश ने हर वर्ग को टिकट देकर पीडीए की सच्चाई साबित की। मायावती भाजपा की गुप्त सहयोगी हैं। दलित-पिछड़े अब सपा पर भरोसा करते हैं।” कांग्रेस के विश्व विजय सिंह का दावा है, दलित युवा राहुल गांधी की ओर लौट रहे हैं। संविधान और अंबेडकर के आदर्शों की रक्षा सिर्फ कांग्रेस कर सकती है।

ये सारी हलचलें यूपी की सियासत को नया रंग दे रही हैं। अगर बसपा मजबूत हुई, तो भाजपा का गैर-जाटव दलित वोटबैंक प्रभावित हो सकता है, जो 2022 में उसकी जीत का आधार बना। सपा का पीडीए, जो 2024 में चमका, अब बसपा की चुनौती से जूझेगा। जानकार मानते हैं कि जातीय पहचान का मुद्दा विकास की राजनीति पर भारी पड़ सकता है। अखिलेश की चेतावनी कि भाजपा धांधली कर सकती है, विपक्ष को एकजुट रखने का हथियार है। इंडिया ब्लॉक की एकता 2027 का परिणाम तय करेगी। सवाल वही है कौन किसके वोट छीनेगा? दलित और ओबीसी किसके साथ जाएंगे? मायावती की कोशिशें रंग लाएंगी या अखिलेश का पीडीए फिर बाजी मारेगा? भाजपा कैसे पलटवार करेगी? आने वाले महीने जवाब देंगे, लेकिन यूपी का जागरूक मतदाता एक बार फिर इतिहास रचेगा।

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