लखनऊ की सियासी फिजा में एक बार फिर हलचल तेज है। मुख्यमंत्री आवास पर मंगलवार को हुई कोर कमिटी की बैठक के बाद यह लगभग तय माना जा रहा है कि उत्तर प्रदेश भाजपा संगठन और प्रदेश मंत्रिमंडल में बड़ा फेरबदल मकर संक्रांति के बाद देखने को मिलेगा। यह बदलाव केवल नामों तक सीमित नहीं होगा, बल्कि इसके जरिए पार्टी 2027 के विधानसभा चुनाव की बुनियाद मजबूत करने की कोशिश करेगी। संगठन और सरकार के बीच संतुलन, क्षेत्रीय और जातीय समीकरण, परफॉर्मेंस और भविष्य की रणनीति सब कुछ इस बदलाव की धुरी में रहेगा।
कोर कमिटी की बैठक को इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि यह पंकज चौधरी के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद पहली बैठक थी। बैठक में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ दोनों उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और ब्रजेश पाठक, प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी, महामंत्री संगठन धर्मपाल सिंह और आरएसएस के क्षेत्र प्रचारक मौजूद रहे। इससे पहले पंकज चौधरी और धर्मपाल सिंह ने आरएसएस कार्यालय भारती भवन जाकर संगठनात्मक मुद्दों पर चर्चा की। साफ है कि किसी भी फैसले से पहले संघ और पार्टी के बीच तालमेल को पूरी तरह साधा जा रहा है।
सूत्रों की मानें तो बैठक में इस बात पर सहमति बनी कि संगठन में नए चेहरों को जिम्मेदारी दी जाए और सरकार में उन लोगों को लाया जाए, जिनकी पकड़ जमीनी स्तर पर मजबूत मानी जाती है। वहीं, कुछ मंत्रियों को संगठन में भेजकर चुनावी तैयारी में लगाया जा सकता है। भाजपा का यह आजमाया हुआ फॉर्मूला रहा है कि चुनाव से पहले संगठन को धारदार बनाया जाए और सरकार में ऐसे चेहरे रखे जाएं, जिनका प्रशासनिक प्रदर्शन बेहतर रहा हो।
फिलहाल योगी सरकार में मुख्यमंत्री समेत 54 मंत्री हैं। संवैधानिक प्रावधानों के तहत यह संख्या 60 तक जा सकती है। लोकसभा चुनाव के बाद दो मंत्री सांसद बन गए थे, जिससे मंत्रिमंडल में खाली जगह बनी हुई है। पीडब्ल्यूडी मंत्री रहे जितिन प्रसाद और राजस्व राज्य मंत्री रहे अनूप प्रधान वाल्मीकि लोकसभा पहुंच चुके हैं। उनकी जगह भरने का फैसला लंबे समय से टलता रहा, क्योंकि पार्टी प्रदेश अध्यक्ष के चयन का इंतजार कर रही थी। अब पंकज चौधरी की ताजपोशी के बाद यह अड़चन भी खत्म हो गई है।
भाजपा के अंदरखाने चर्चा है कि पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी को भी मंत्रिमंडल में जगह मिल सकती है। इसके अलावा संगठन से कुछ ऐसे चेहरे सरकार में आ सकते हैं, जिन्होंने चुनावी मोर्चे पर लगातार अच्छा प्रदर्शन किया है। वहीं, राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार के तौर पर काम कर रहे कुछ नेताओं का कद बढ़ाया जा सकता है और उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया जा सकता है। यह संदेश भी जाएगा कि पार्टी मेहनत और नतीजों को महत्व देती है।
बैठक में केवल मंत्रिमंडल ही नहीं, बल्कि विभिन्न आयोगों और बोर्डों में खाली पड़े पदों पर भी चर्चा हुई। लंबे समय से कई आयोग अध्यक्ष या सदस्यों के बिना चल रहे हैं। पार्टी का मानना है कि इन पदों के जरिए सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन को और बेहतर किया जा सकता है। ऐसे नेताओं को समायोजित किया जा सकता है, जिन्हें फिलहाल सरकार या संगठन में जगह नहीं मिल पा रही, लेकिन जिनका राजनीतिक महत्व बना हुआ है।
मकर संक्रांति के बाद बदलाव की टाइमिंग भी सियासी नजरिए से अहम मानी जा रही है। अभी खरमास चल रहा है, जिसे परंपरागत रूप से शुभ कार्यों के लिए अनुकूल नहीं माना जाता। इस अवधि में प्रदेश अध्यक्ष को संगठन के साथ व्यापक सलाह-मशविरा का मौका मिलेगा। इसके बाद प्रस्ताव केंद्रीय नेतृत्व के पास जाएंगे और अंतिम मंजूरी के बाद बदलावों की औपचारिक घोषणा होगी।
पूरा फोकस 2027 के विधानसभा चुनाव पर है। भाजपा नेतृत्व मानता है कि उत्तर प्रदेश में सत्ता की हैट्रिक आसान नहीं होगी और इसके लिए हर स्तर पर तैयारी जरूरी है। इसलिए मंत्रियों और पदाधिकारियों की परफॉर्मेंस का आकलन किया जा रहा है। जिनके विभागों में कामकाज बेहतर रहा है, उन्हें आगे बढ़ाया जा सकता है, जबकि कमजोर प्रदर्शन वालों को संगठन में भेजकर नई भूमिका दी जा सकती है।
क्षेत्रीय संतुलन भी इस कवायद का बड़ा आधार है। पार्टी के भीतर यह चर्चा रही है कि मौजूदा व्यवस्था में पूर्वांचल का प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत ज्यादा है। ऐसे में पश्चिमी उत्तर प्रदेश से कुछ चेहरों को संगठन या मंत्रिमंडल में आगे लाकर संतुलन साधने की कोशिश होगी। पश्चिम यूपी की राजनीति का असर न सिर्फ विधानसभा, बल्कि लोकसभा चुनावों में भी निर्णायक माना जाता है।
जातीय संतुलन पर भी खास नजर है। हाल के महीनों में ब्राह्मण, ठाकुर और अन्य जातीय समूहों के विधायकों और नेताओं के साथ अलग-अलग बैठकें हुई हैं। इसका संकेत साफ है कि पार्टी सभी वर्गों को साथ लेकर चलना चाहती है। मंत्रिमंडल और संगठन में फेरबदल के जरिए यह संदेश देने की कोशिश होगी कि भाजपा किसी एक वर्ग की नहीं, बल्कि सभी की पार्टी है।
कुल मिलाकर, मकर संक्रांति के बाद होने वाला यह बदलाव केवल प्रशासनिक या संगठनात्मक प्रक्रिया नहीं होगा, बल्कि यह आने वाले चुनावी संघर्ष की रणनीतिक शुरुआत मानी जाएगी। कौन सरकार में रहेगा, कौन संगठन में जाएगा और किसे किस मोर्चे पर लगाया जाएगा इन फैसलों से भाजपा यह तय करना चाहती है कि 2027 की लड़ाई किस टीम के साथ लड़ी जाएगी। लखनऊ से लेकर दिल्ली तक निगाहें टिकी हैं और सियासी गलियारों में एक ही सवाल गूंज रहा है इस बार बदलाव में किसका कद बढ़ेगा और किसकी भूमिका बदलेगी।
