उत्तर प्रदेश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। 2027 के विधानसभा चुनावों की तैयारियां अभी से जोर पकड़ रही हैं और समाजवादी पार्टी ने अपनी कमर कस ली है। अखिलेश यादव के नेतृत्व में पार्टी ने संगठन के ढांचे को नए सिरे से गढ़ने का फैसला किया है। जून महीने में ही सभी जिलों की कार्यकारिणी समितियों को भंग कर दिया गया, सिर्फ कुशीनगर जिले को छोड़कर। यह कदम ऐसा था कि राजनीतिक गलियारों में सवाल उठने लगे क्या पुराने पदाधिकारी अब भरोसेमंद नहीं रहे? क्या पार्टी को लग रहा है कि मौजूदा टीम चुनावी जंग लड़ने लायक नहीं? लेकिन अंदरखाने की बातें कुछ और ही बयां करती हैं। पार्टी को लगता है कि संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत बनाना जरूरी है, ताकि पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक (पीडीए) फॉर्मूले को और धार दी जा सके। लोकसभा चुनावों में 37 सीटें जीतने वाली सपा अब विधानसभा की 403 सीटों पर नजरें गाड़े हुए है।
यह बदलाव अचानक नहीं आया। जनवरी से ही अखिलेश यादव ने 15 से 20 जिलाध्यक्षों को बदलने की योजना बनाई थी। उपचुनावों में सपा को सिर्फ 4 सीटें मिलीं, जबकि एनडीए गठबंधन ने 9 सीटें हासिल कीं। यह झटका पार्टी के लिए सबक था। अखिलेश को महसूस हुआ कि संगठन में सुस्ती आ गई है। बूथ स्तर पर कार्यकर्ता सक्रिय नहीं हैं, मतदाता सूची में नाम जोड़ने का काम ठप पड़ा है। अगस्त में सभी जिला और विधानसभा प्रभारियों को हटा दिया गया। अब नई सूची जल्द जारी होने वाली है। पार्टी का कहना है कि नए चेहरों को मौका देकर संगठन को ताजगी मिलेगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह फेरबदल सपा को भाजपा के “डबल इंजन” के खिलाफ मजबूत बनाएगा? राजनीतिक जानकार मानते हैं कि हां, अगर पीडीए को सही से लागू किया गया तो।
संगठन मजबूत क्यों? क्योंकि चुनाव तो बूथ पर जीते जाते हैं। भाजपा का संगठन आरएसएस की बदौलत लोहा लेता है। सपा को भी वैसा ही कुछ चाहिए। अखिलेश ने मई में ही टिकट वितरण का फॉर्मूला तय कर दिया जो नेता बूथ पर सक्रिय होगा, वोटर लिस्ट मजबूत करेगा, उसी को टिकट मिलेगा। सितंबर की बैठक में उन्होंने कार्यकर्ताओं को चेतावनी दी कि भाजपा मतदाता सूची में हेरफेर की साजिश रच रही है। नवंबर में तो सख्त लहजा अपनाया “करो या मरो”। कहा कि जब तक स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) चल रही है, कोई नेता लखनऊ न घूमे, वरना टिकट कटेगा। SIR प्रक्रिया से सपा को डर है कि उसके कोर वोट बैंक पीडीए के लाखों नाम कट सकते हैं। इसलिए “पीडीए प्रहरी” तैनात किए गए हैं। अखिलेश ने कहा, चुनाव सड़क पर लड़े जाएंगे, सोशल मीडिया पर नहीं।
बिहार चुनाव का असर यूपी पर साफ दिख रहा है। नवंबर 2025 में बिहार विधानसभा के नतीजे आए तो इंडिया गठबंधन को करारा झटका लगा। महागठबंधन सिर्फ 35 सीटों पर सिमट गया, जबकि एनडीए ने 202 हासिल कीं। कांग्रेस की हार से गठबंधन में दरार आ गई। सपा के विधायक रविदास मेहरोत्रा ने खुलकर अखिलेश को इंडिया ब्लॉक का नेता बनाने की मांग की। कहा कि राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल उठे हैं। बिहार में आरजेडी और कांग्रेस की रणनीति फेल हो गई, जो यूपी में सपा-कांग्रेस गठबंधन को चेतावनी है। अखिलेश ने अप्रैल में प्रयागराज में ऐलान किया था कि 2027 में इंडिया गठबंधन जारी रहेगा। लेकिन बिहार की हार से तनाव बढ़ा। झारखंड मुक्ति मोर्चा ने पहले ही गठबंधन छोड़ दिया था। अब यूपी में क्या होगा? क्या सपा अकेले चलेगी या कांग्रेस के साथ? जानकार कहते हैं, बिहार ने दिखा दिया कि गठबंधन में सीट बंटवारे पर झगड़ा हार का कारण बन सकता है। सपा अब पीडीए पर दांव लगाएगी, लेकिन अल्पसंख्यक वोट को साधने के लिए गठबंधन जरूरी।
बिहार की हार ने सपा को सबक दिया कि कानून-व्यवस्था और विकास के मुद्दों पर जनता का भरोसा जीतना पड़ेगा। अखिलेश ने बुलडोजर राजनीति पर हमला बोला। लखनऊ के अकबरनगर और काशी की दालमंडी को जमींदोज करने का जिक्र किया। कहा कि भाजपा विकास के नाम पर तोड़फोड़ कर रही है। सपा का फोकस अब ग्रामीण इलाकों पर है। पंचायत चुनाव 2026 में हैं, जो 2027 का सेमीफाइनल होंगे। संगठन को वहां मजबूत करने के लिए नए पदाधिकारी लाए जा रहे हैं। कुशवाहा समुदाय को मजबूत करने की कोशिश हो रही है। नवंबर में खबर आई कि प्रदेश अध्यक्ष पद पर नवल किशोर शाक्य को बनाया जा सकता है। यह पहली बार होगा जब कुशवाहा को इतना बड़ा पद मिलेगा। पार्टी के पास पहले से बाबू सिंह कुशवाहा, नीरज मौर्य जैसे सांसद हैं। यह दांव केशव प्रसाद मौर्य पर भारी पड़ सकता है।
सपा का कुनबा बढ़ रहा है। सितंबर में अखिलेश की मौजूदगी में कई बड़े नेता शामिल हुए। अप्रैल में बुंदेलखंड से चित्रकूट के चार बार विधायक दद्दू प्रसाद सपा में आए। कांशीराम के करीबी रहे दद्दू का आना बहुजन वोट को मजबूत करेगा। पार्टी ने कहा कि यह सामाजिक न्याय की लड़ाई है। लेकिन बसपा की क्या प्रतिक्रिया होगी? मायावती 2027 में अकेले लड़ने की तैयारी कर रही हैं, दलित-मुस्लिम-ओबीसी एकता पर फोकस। सपा को सावधान रहना होगा कि उसका पीडीए फॉर्मूला चुराया न जाए। अपना दल (एस) की अनुप्रिया पटेल भी पीडीए को टारगेट कर रही हैं। जून में उन्होंने संगठन पुनर्गठन किया, दलित-ओबीसी-मुस्लिम को साधने का प्लान। 2026 पंचायत चुनाव में अकेले लड़ेंगी।
अखिलेश की रणनीति साफ है जातीय जनगणना पर दबाव डालना। मई की बैठक में उन्होंने कहा कि पीडीए ने ही केंद्र को जनगणना के लिए मजबूर किया। बेरोजगारी, महंगाई, महिलाओं की सुरक्षा ये मुद्दे उठाएंगे। समाजवादी सरकार के पुराने काम एक्सप्रेसवे, मेट्रो, लैपटॉप इनकी याद दिलाएंगे। आगरा-मथुरा जैसे इलाकों के लिए अलग घोषणा पत्र बन रहा है। पर्यटन को बढ़ावा देने का वादा। लेकिन चुनौतियां कम नहीं। भाजपा कह रही है कि सपा का गठबंधन टूटेगा। केशव मौर्य ने तंज कसा कि सपा को बिहार जैसी दुर्गति मिलेगी। लेकिन सपा का जवाब है हम अवध जीत चुके, अब पूरे यूपी में।
संगठन बदलाव से सपा में जोश आया है। कार्यकर्ता घर-घर पीडीए पर्चा पहुंचा रहे हैं। मतदाता सूची पर नजर। अखिलेश ने कहा, भाजपा नफरत फैला रही, हम एकता। अगर यह रणनीति कामयाब रही तो 2027 में यूपी में सत्ता परिवर्तन हो सकता है। जनता त्रस्त है अपराध, बेरोजगारी से। सपा को मौका मिले तो पीडीए की ताकत से भाजपा हिल सकती है। लेकिन बिहार ने सिखाया कि गठबंधन में संतुलन जरूरी। सपा अब इंडिया ब्लॉक में अखिलेश की भूमिका बढ़ाने की कोशिश करेगी। राजनीति की यह जंग लंबी है, लेकिन सपा ने अभी से मोर्चा संभाल लिया है। 2027 का फैसला संगठन की मजबूती पर टिकेगा। क्या सपा सफल होगी? वक्त बताएगा, लेकिन तैयारी तो पूरी हो चुकी है।
