सुप्रीम कोर्ट ने योगी सरकार के क्यूआर कोड वाले फैसले पर रोक से किया इंकार

संजय सक्सेना,लखनऊ

उत्तर प्रदेश में कांवड़ यात्रा के दौरान योगी आदित्यनाथ सरकार द्वारा लिया गया दुकानों पर क्यूआर कोड लगाने का फैसला धार्मिक भावनाओं, पारदर्शिता और सामाजिक सौहार्द को बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह निर्णय श्रावण मास में होने वाली इस पवित्र यात्रा के दौरान कांवड़ियों की आस्था और सुविधा को प्राथमिकता देता है, जो लाखों भक्तों के लिए एक गहन धार्मिक अनुभव है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस आदेश पर रोक लगाने से इनकार करना इस बात का प्रमाण है कि यह नीति न केवल व्यावहारिक है, बल्कि संवैधानिक और सामाजिक दृष्टिकोण से भी उचित है।सुप्रीम कोर्ट ने क्यूआर कोड़ मुद्दे पर दखल देने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने राज्य सरकारों के क्यूआर कोड़ के खिलाफ अर्जी पर कोई भी आदेश जारी करने से इनकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दुकानदार लाइसेंस और पंजीकरण सर्टिफिकेट लगाएं. बाकी मुद्दों पर हम नहीं जाएंगे. बहरहाल, योगी सरकार का यह कदम न केवल यात्रियों की सुविधा के लिए है, बल्कि खाद्य सुरक्षा और पारदर्शिता को बढ़ावा देने के लिए भी उठाया गया है, जो आज के डिजिटल युग में एक प्रगतिशील सोच को दर्शाता है।

गौरतलब हो, कांवड़ यात्रा हर साल उत्तर भारत में विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों में बड़े उत्साह के साथ आयोजित होती है। इस दौरान भक्त गंगा नदी से पवित्र जल लेकर शिव मंदिरों में चढ़ाते हैं। इस यात्रा में भोजन की शुद्धता और स्वच्छता को लेकर कांवड़ियों की विशेष अपेक्षाएँ होती हैं, क्योंकि श्रावण मास में कई श्रद्धालु मांसाहार, प्याज और लहसुन से परहेज करते हैं। योगी सरकार का यह निर्णय कि कांवड़ मार्ग पर स्थित दुकानों, ढाबों और रेस्तरां में क्यूआर कोड लगाए जाएँ, जिससे दुकानदारों की जानकारी, जैसे उनका नाम, लाइसेंस नंबर और संपर्क विवरण, आसानी से उपलब्ध हो, एक स्वागत योग्य कदम है। यह क्यूआर कोड न केवल ग्राहकों को पारदर्शिता प्रदान करता है, बल्कि खाद्य सुरक्षा और गुणवत्ता सुनिश्चित करने में भी मदद करता है।

इस नीति का एक प्रमुख उद्देश्य कांवड़ियों की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करना है। अतीत में कुछ घटनाएँ सामने आई हैं, जहाँ दुकानदारों द्वारा भोजन में प्याज, लहसुन या मांसाहारी सामग्री का उपयोग करने से श्रद्धालुओं की भावनाएँ आहत हुई थीं। क्यूआर कोड के जरिए दुकानदारों की जानकारी उपलब्ध होने से कांवड़िए अपनी आस्था के अनुरूप भोजन का चयन कर सकते हैं। यह कदम न केवल यात्रियों की सुविधा बढ़ाता है, बल्कि दुकानदारों और स्थानीय प्रशासन के बीच विश्वास को भी मजबूत करता है। इसके अलावा, यह व्यवस्था खाद्य सुरक्षा और औषधि प्रशासन विभाग (एफएसडीए) द्वारा शुरू किए गए जागरूकता अभियानों का हिस्सा है, जो मिलावट और खाद्य गुणवत्ता से संबंधित शिकायतों को कम करने में मदद करता है।

क्यूआर कोड की व्यवस्था डिजिटल भारत के विजन के अनुरूप भी है। यह तकनीक का उपयोग करके पारदर्शिता को बढ़ावा देता है और ग्राहकों को त्वरित जानकारी प्रदान करता है। कांवड़ मार्ग पर दुकानदारों को अपनी दुकान का नाम, लाइसेंस नंबर और अन्य विवरण क्यूआर कोड के माध्यम से प्रदर्शित करने का निर्देश न केवल तकनीकी रूप से उन्नत है, बल्कि यह दुकानदारों को अपनी पहचान छिपाने की आवश्यकता को भी समाप्त करता है। इससे सामाजिक भेदभाव की आशंकाएँ कम होती हैं, क्योंकि जानकारी डिजिटल रूप से उपलब्ध होती है और इसे केवल जरूरत पड़ने पर ही स्कैन किया जाता है। यह प्रणाली निजता का सम्मान करते हुए भी पारदर्शिता सुनिश्चित करती है।

कुछ आलोचकों ने इस नीति को धार्मिक आधार पर भेदभावपूर्ण बताने की कोशिश की है, लेकिन यह तर्क तथ्यों पर आधारित नहीं है। सरकार का यह आदेश किसी विशेष समुदाय को लक्षित नहीं करता, बल्कि सभी दुकानदारों के लिए एक समान नियम लागू करता है। यह नीति कांवड़ियों की धार्मिक संवेदनाओं को ध्यान में रखते हुए बनाई गई है, जो कि संवैधानिक रूप से स्वीकार्य है। सुप्रीम कोर्ट का इस पर रोक न लगाना इस बात का संकेत है कि यह नीति संविधान के दायरे में है और इसका उद्देश्य सामाजिक सौहार्द को बनाए रखना है।

इसके अलावा, यह कदम स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी समर्थन देता है। कांवड़ यात्रा के दौरान लाखों यात्री मार्ग पर भोजन और अन्य सुविधाओं का उपयोग करते हैं। क्यूआर कोड के जरिए दुकानदारों को अपनी विश्वसनीयता बढ़ाने का मौका मिलता है, जिससे उनका व्यवसाय भी फलता-फूलता है। यह व्यवस्था न केवल कांवड़ियों के लिए, बल्कि सभी ग्राहकों के लिए खाद्य सुरक्षा और विश्वास का एक नया मानक स्थापित करती है।

योगी सरकार का यह निर्णय एक संतुलित और दूरदर्शी कदम है, जो धार्मिक आस्था, पारदर्शिता और तकनीकी प्रगति को एक साथ जोड़ता है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस पर रोक न लगाना इस बात का प्रमाण है कि यह नीति न केवल कानूनी रूप से उचित है, बल्कि यह सामाजिक और धार्मिक संवेदनाओं के प्रति भी संवेदनशील है। यह कदम कांवड़ यात्रा को और अधिक व्यवस्थित और सुरक्षित बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

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