विरोध की लहर तेज हो रही है। छात्र संगठनों ने सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं। दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में छात्रों ने धरना दिया और विनियमों को वापस लेने की मांग की। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के छात्रों ने भी केंद्रीय विश्वविद्यालय में कुलपति को ज्ञापन सौंपा। उनका कहना है कि ये नियम मेरिट को नजरअंदाज कर रहे हैं। सवर्ण छात्र लंबे समय से मेहनत करके प्रवेश पा रहे हैं लेकिन अब उनके साथ अन्याय हो रहा है। एक छात्र नेता ने कहा कि हमारा संघर्ष तब तक जारी रहेगा जब तक ये विनियम पूरी तरह समाप्त न हो जाएं।राजनीतिक दलों ने भी इस मुद्दे को हाथोंहाथ लिया है। विपक्षी दल इसे आरक्षण विरोधी बताकर सरकार पर हमलावर हो गए हैं। उनका तर्क है कि ये विनियम सामाजिक न्याय के नाम पर एक वर्ग को दूसरे के ऊपर थोप रहे हैं। सत्ताधारी दल ने हालांकि सफाई दी है कि उद्देश्य समानता बढ़ाना है लेकिन विपक्ष इसे बहाना बता रहा है। संसद में भी इस पर बहस छिड़ गई है। सांसदों ने कहा कि उच्च शिक्षा में एकता जरूरी है न कि विभाजन। कई पूर्व कुलपतियों ने भी खुलेआम विरोध जताया है। उनका मानना है कि ये नियम संस्थानों के कामकाज को बाधित करेंगे।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने इन विनियमों को उच्च शिक्षा में समस्याओं से निपटने के लिए बनाया था। इसमें उत्पीड़न की शिकायतों के निपटारे की प्रक्रिया बताई गई है। लेकिन सामान्य वर्ग को बाहर रखना विवाद का केंद्र बन गया। आयोग का कहना है कि यह अल्पसंख्यक वर्गों की रक्षा के लिए है लेकिन आलोचक इसे उल्टा भेदभाव बता रहे हैं। कई विश्वविद्यालयों ने पहले ही इनका पालन शुरू कर दिया है जिससे स्थानीय स्तर पर टकराव बढ़ रहे हैं। छात्रों के बीच तनाव फैल रहा है और कक्षाओं का बहिष्कार होने लगा है।सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका पर सुनवाई जल्द हो सकती है। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि ये विनियम संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करते हैं जो सभी को समान अधिकार देता है। अदालत अगर हस्तक्षेप करती है तो पूरे देश में असर पड़ेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला उच्च शिक्षा नीति पर सवाल खड़ा कर रहा है। आरक्षण के मुद्दे पहले भी अदालत पहुंचे हैं लेकिन इस बार पीड़ित परिभाषा का सवाल नया है। अगर कोर्ट नियमों को रद्द करता है तो आयोग को नया ढांचा बनाना पड़ेगा।
