लखनऊ: उत्तर प्रदेश की सियासत में इन दिनों सरगर्मियां तेज हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव अभी एक साल दूर हैं, लेकिन नेताओं के बयानों से माहौल गर्म हो चुका है। एक तरफ डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य सपा पर हमले कर रहे हैं, तो दूसरी ओर सपा नेताओं का पलटवार आ रहा है। ताजा मामला चंदौली से सपा सांसद वीरेंद्र सिंह का है, जिन्होंने दावा किया है कि केशव प्रसाद मौर्य खुद सपा के संपर्क में हैं। यह बयान आज सुबह ही सामने आया है, जिसने राजनीतिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। वीरेंद्र सिंह ने कहा कि केशव मौर्य सिराथू से जुड़े रहने के दौरान सपा से जुड़े रहे हैं और उन्हें पार्टी में शामिल करने का फैसला अखिलेश यादव करेंगे। यह बात उन्होंने मजाकिया अंदाज में कही, लेकिन इसके पीछे गहरे सियासी मायने निकाले जा रहे हैं। सिंह ने भगवान राम को समाजवादी बताते हुए कहा कि राम ने वनवास में आदिवासी और दलितों का साथ लिया, जो समाजवाद की असली मिसाल है। इस बयान से बीजेपी असहज हो गई है, क्योंकि राम मंदिर उनके मुख्य एजेंडे में है।
उत्तर प्रदेश में राजनीति हमेशा से जाति और गठबंधन पर टिकी रही है। 2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 255 सीटें जीतीं, जबकि सपा को 111, बसपा को 1 और कांग्रेस को 2 सीटें मिलीं। वोट प्रतिशत की बात करें तो बीजेपी को 41.29 फीसदी, सपा को 32.06 फीसदी वोट मिले। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव ने तस्वीर बदल दी, जहां सपा ने 37 सीटें हासिल कीं और बीजेपी 33 पर सिमट गई। उपचुनाव में बीजेपी ने 9 में से 7 सीटें जीतकर वापसी की कोशिश की। करहल, सीसामऊ, कुंदरकी, खैर, गाजियाबाद, फूलपुर और मझवां जैसी सीटों पर उसका कब्जा रहा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इन नतीजों को विपक्ष के झूठ का जवाब बताया। अब 2027 की तैयारी में दोनों पार्टियां जुटी हैं, लेकिन बयानों का दौर चुनावी माहौल पहले ही बना रहा है।
केशव प्रसाद मौर्य बीजेपी के प्रमुख ओबीसी नेता हैं। 2017 में वे पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे, जब बीजेपी ने 312 सीटें जीतकर रिकॉर्ड बनाया। हालांकि, मुख्यमंत्री की कुर्सी से चूक गए और अब डिप्टी सीएम हैं। हाल ही में उन्होंने दावा किया कि 2027 में सपा पूरी तरह साफ हो जाएगी। उन्होंने कांग्रेस को भ्रष्टाचार की जननी बताया और कहा कि सपा का सफाया तय है। बरेली में पत्रकारों से बातचीत में मौर्य ने कहा कि विधानसभा चुनाव बीजेपी के खाते में जाएगा। उन्होंने अखिलेश यादव पर तंज कसते हुए कहा कि वे अनर्गल बयान दे रहे हैं और 2027 में सैफई लौट जाएंगे। मौर्य ने अगड़ा-पिछड़ा-दलित त्रिवेणी का जिक्र किया, जिससे बीजेपी 80 फीसदी हिंदू वोटरों को साधने की कोशिश कर रही है। योगी के 80-20 नैरेटिव से जुड़कर यह बयान सियासी हलचल बढ़ा रहा है।
दूसरी ओर, सपा प्रमुख अखिलेश यादव लगातार बीजेपी पर हमले कर रहे हैं। उन्होंने मनरेगा योजना के नाम बदलने को लेकर मौर्य पर निशाना साधा। अखिलेश ने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन को बीजेपी की साजिश बताया, जिसमें 2.89 करोड़ नाम वोटर लिस्ट से कटे। इससे 53 सीटों पर जहां जीत-हार का अंतर 5000 वोट से कम था, वहां समीकरण बदल सकते हैं। अखिलेश का कहना है कि इससे बीजेपी को ही नुकसान होगा। लेकिन मौर्य ने पलटवार किया कि विपक्ष फर्जी वोटरों से चुनाव जीतता था और अब मुद्दे नहीं बचे। मौर्य ने दावा किया कि 2027 में बीजेपी 2017 की जीत से भी बड़ा रिकॉर्ड बनाएगी। उन्होंने हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली, बिहार जैसे राज्यों में बीजेपी की जीत का हवाला दिया और पश्चिम बंगाल भी जीतने की बात कही।
ओपिनियन पोल्स भी 2027 पर नजर रखे हैं। एक सर्वे में बीजेपी को 267 सीटें मिलने का अनुमान है, जबकि सपा को सिर्फ 87। दूसरे पोल में बीजेपी 252 और सपा 100 से कम पर दिख रही है। यूपी में 403 विधानसभा सीटें हैं और आबादी 23 करोड़ से ज्यादा है। गठबंधन की भूमिका निर्णायक होगी। सपा का पीडीए फॉर्मूला 2024 में सफल रहा, जिसमें पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक शामिल हैं। वहीं, बीजेपी राम मंदिर, विकास और कानून व्यवस्था पर जोर दे रही है। अयोध्या में राम मंदिर का कार्ड अवध क्षेत्र की 74 सीटों पर असर डाल सकता है। सपा जातिगत समीकरण साधने में जुटी है, लेकिन ब्राह्मण विधायकों की बैठक से सियासी घमासान मचा है। विपक्ष इसे जातिवादी बता रहा है, जबकि बीजेपी ने आरोप खारिज किए।
यूपी की राजनीति में पिछड़े और दलित वोट अहम हैं। केशव मौर्य ओबीसी चेहरा हैं, जबकि सपा यादव वोट पर निर्भर। 2022 में बीजेपी को ओबीसी वोट का बड़ा हिस्सा मिला, लेकिन 2024 में सपा ने कमबैक किया। अब बीजेपी अन्य नेताओं को आगे कर रही है। एक नेता ने अयोध्या सीट से चुनाव लड़ने का दावा किया, कहा कि राम जन्मभूमि उनकी कर्मभूमि है। यह पार्टी में आंतरिक कलह की ओर इशारा करता है। सपा छोटे दलों से गठजोड़ कर रही है। कुछ सहयोगी बीजेपी के साथ हैं, लेकिन उनके बयान हलचल पैदा कर रहे हैं। कैबिनेट मंत्री ने 2027 और पंचायत चुनाव के लिए कार्यकर्ताओं को तैयार रहने का निर्देश दिया। उन्होंने सपा पर एमवाई समीकरण के अलावा कोई वोट बैंक न होने का तंज कसा। स्वतंत्र देव पटेल, बृजेश पाठक, संजय निषाद जैसे नाम लेकर एनडीए की ताकत बताई।
2027 में बीजेपी का लक्ष्य 300 से ज्यादा सीटें हैं। दावा है कि योगी 15 साल राज करेंगे। लेकिन सपा का कहना है कि वोटर लिस्ट बदलाव से बीजेपी की जमीन खिसक रही है। कुछ विधानसभाओं के आंकड़े देखें तो बेहट में 2012 सपा, 2017 बीजेपी, 2022 फिर सपा जीती। हर सीट पर कड़ी टक्कर होगी। अवध में राम मंदिर बनाम जाति का मुकाबला है। एक विवादित नेता ने 2029 में चुनाव लड़ने का ऐलान किया, जो 2027 पर असर डाल सकता है। वे टिकट न मिलने पर निर्दलीय लड़ सकते हैं।सियासत में आरोपों का सिलसिला जारी है। केशव मौर्य ने कहा कि वे और योगी एक साथ थे, हैं और रहेंगे। 2027 में सपा का सफाया करेंगे। अखिलेश को गुमराह करने वाला बताया। सपा नेताओं ने पलटवार किया कि मौर्य कुर्सी बचाने के लिए सपा से संपर्क में हैं। बीजेपी आंतरिक खींचतान से जूझ रही है। कुछ कार्यकर्ता मौर्य को जीत का जादू मानते हैं।
फिलहाल, 2027 की बिसात बिछ रही है। बीजेपी विकास पर जोर दे रही, सपा सामाजिक न्याय पर। पोल्स बीजेपी को आगे दिखाते हैं, लेकिन यूपी में कुछ भी संभव है। 2017 में लहर आई, 2022 में टिकी रही। अब जनता फैसला करेगी, लेकिन बयानबाजी से माहौल गर्म रहेगा। वीरेंद्र सिंह का ताजा दावा नई बहस छेड़ सकता है, क्या कोई बड़ा दल-बदल होगा? समय बताएगा, लेकिन सियासत की यह जंग रोचक हो चली है। प्रदेश में विकास कार्य जारी हैं, लेकिन चुनावी बुखार पहले ही चढ़ गया है। योगी सरकार ने कई योजनाएं चलाईं, जैसे मनरेगा का नाम बदलना, जिस पर विवाद हुआ। अखिलेश ने इसे राजनीतिक बताया। मौर्य ने जवाब दिया कि योजना पहले से बेहतर चलेगी। ऐसे में 2027 तक कई ट्विस्ट आ सकते हैं। सपा युवाओं और किसानों को साध रही है, बीजेपी हिंदुत्व और सुरक्षा पर। अल्पसंख्यक वोट निर्णायक होंगे। 2024 में सपा को मुस्लिम समर्थन मिला, लेकिन बीजेपी इसे तोड़ने की कोशिश में है। पंचायत चुनाव भी करीब हैं, जहां ग्रामीण मुद्दे हावी होंगे। मंत्री ने कार्यकर्ताओं को फूंका चुनावी बिगुल, कहा कि जीत तय है। लेकिन विपक्ष एकजुट हो रहा है। कांग्रेस भी मैदान में है, हालांकि कमजोर। मौर्य ने उसे भ्रष्टाचार की जननी कहा, जो पुराने घोटालों का हवाला है। कुल मिलाकर, यूपी की सियासत 2026 में ही 2027 की तैयारी कर रही है। बयान, दावे और पलटवार से जनता का मनोरंजन हो रहा है, लेकिन असली लड़ाई वोटर तय करेगा। क्या केशव मौर्य का दावा सच होगा या वीरेंद्र सिंह का मजाक हकीकत बनेगा? इंतजार कीजिए, क्योंकि यूपी में राजनीति कभी ठंडी नहीं पड़ती।
