राहुल गांधी पर पप्पू का तमगा चिपक चुका है। संसद में नारे लगाना, विदेश यात्राओं पर बयानबाजी, और चुनावी हार के बाद भगोड़ा बन जाना ये सब तथ्य हैं। 2024 लोकसभा में इंडी गठबंधन में उनकी भूमिका रही, लेकिन कांग्रेस फिर 99 सीटों पर सिमट गई। प्रियंका वाड्रा की कहानी भी कमाल की है। पूर्वी उत्तर प्रदेश प्रभारी बनीं, लेकिन योगी आदित्यनाथ के सामने धराशायी। वायनाड उपचुनाव में राहुल की हार, प्रियंका की सड़क यात्राएं ये मीडिया में सब सुर्खियां बटोरती रहीं। मीडिया इन्हें मोदी-योगी जैसे दिग्गजों से तौलता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात से केंद्र तक का सफर तय किया, योगी ने उत्तर प्रदेश को अपराध मुक्त और विकास के पथ पर ला खड़ा किया। ममता बनर्जी ने बंगाल में टीएमसी को मजबूत बनाया, मायावती ने दलित राजनीति को नई ऊंचाई दी, अखिलेश यादव ने समाजवादी पार्टी को युवा चेहरा दिया। इनकी साख तथ्यों पर टिकी है विकास, सुशासन, जीत। परंतु राहुल-प्रियंका की साख? सिर्फ वंशवाद और हार की कहानियां।फिर भी टीवी चैनल्स पर राहुल का हर ट्वीट ब्रेकिंग न्यूज़। प्रियंका का कोई सड़क शो तो जैसे चुनाव जीत लिया। क्यों? तथ्य बताते हैं कि मीडिया का एक बड़ा हिस्सा वामपंथी विचारधारा से प्रभावित है। नेहरू युग में प्रेस को संरक्षण मिला, आज भी वही पुराना कनेक्शन काम करता है। टीआरपी की होड़ में विवादास्पद बयान बिकते हैं। राहुल का “चौकीदार चोर है” या प्रियंका का मोदी पर हमला ये चटपटे हैं। मोदी का कोई भाषण? बोरिंग विकास गाथा। योगी का बुलडोजर एक्शन? तो सांप्रदायिक करार दो। लेकिन गांधी परिवार को ग्लैमर का चोला पहनाना क्यों? शायद इसलिए कि वे विपक्ष के प्रतीक हैं। विपक्ष कमजोर हो तो सरकार की जवाबदेही कम। मीडिया जानबूझकर गांधी भाइयों-बहनों को फुल कवरेज देता है ताकि विपक्ष का भ्रम बना रहे।
तथ्यों पर गौर करें। 2019 चुनाव में राहुल की अमेठी हार ने परिवार की राजनीतिक पूंजी को चकनाचूर कर दिया। प्रियंका को सोनिया ने मैदान में उतारा, लेकिन परिणाम? जीरो। 2023 मध्य प्रदेश में कांग्रेस हारी, राहुल की भारत जोड़ो यात्रा बेकार। इसके उलट मोदी ने 2014 से तीन चुनाव जीते, योगी ने 2022 में 273 सीटें दिलाईं। अखिलेश ने 37 लोकसभा सीटें झटकीं। ये नेता काम से पहचाने जाते हैं, न कि वंश से। मीडिया की तुलना गलत क्यों? क्योंकि राहुल को युवा चेहरा कहना मजाक है। उम्र में अखिलेश से बड़े, पर उपलब्धि शून्य। प्रियंका को महिला सशक्तिकरण का प्रतीक बताया जाता है? जबकि पार्टी में महिलाओं की भागीदारी घट रही है।गांधी खानदान के प्रति यह ग्लैमर का भ्रम क्यों टूटता नहीं? सोशल मीडिया पर गांधी परिवार को ट्रोल किया जाता है, लेकिन मुख्यधारा मीडिया चुप। क्योंकि चैनल्स के मालिकों के हित जुड़े हैं। पुरानी कांग्रेसी सरकारों से लाभ मिला। आज भी विपक्षी ध्रुवीकरण से फायदा। राहुल का अमेरिका दौरा जहां वे “डेमोक्रेसी खतरे में” बोलते हैं, वहां मोदी की जी-20 सफलता दब जाती है। प्रियंका का हर बयान महत्वपूर्ण बन जाता है। तथ्य कहते हैं इनकी लोकप्रियता घटी है। सर्वे दिखाते हैं मोदी-योगी टॉप पर। फिर भी मीडिया गांधी परिवार को हीरो बनाता है। क्यों? शायद डर से। सरकार का पक्ष लेने पर लाइसेंस रद्द का भय। विपक्ष को जिंदा रखना सुरक्षित लगता है।खैर, कांग्रेसियों की मजबूरी समझ आती है, वे पार्टी बचाने के लिए झुकते हैं। लेकिन मीडिया का यह आग्रह तथ्यों का अपमान है। जब तक यह जारी रहेगा, राजनीति का संतुलन बना रहेगा, पर लोकतंत्र कमजोर होगा। राहुल-प्रियंका को सच्चाई का आईना दिखाना होगा। उनकी तुलना उन नेताओं से न करें जिन्होंने मेहनत से इतिहास रचा। वरना यह ग्लैमर का बुलबुला फूटेगा ही। समय आ गया है कि मीडिया तथ्यों पर खड़ा हो, वंशवाद के आगे न झुके।
