पुण्यतिथि पर विशेषः महात्मा गांधी की हत्या के अनसुलझे पहलू

आज महात्मा गांधी की पुण्यतिथि है। इसी के साथ कई पुराने सवाल फिर से याद आने लगे हैं, जिनका आज तक जवाब नहीं मिल पाया है। सवाल यही है कि गांधी की हत्या के बाद उनके शव का पोस्टमार्टम क्यों नहीं कराया गया? गांधी को कुल कितनी गोलियां लगी थीं? और गोडसे ने कितनी गोलियां चलाई थीं? क्या तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नहीं चाहते थे कि गांधी की हत्या के कारणों की जांच किसी निष्कर्ष पर पहुंचे? इतिहास के पन्नों में ऐसे कई रिकॉर्ड दर्ज हैं, जिससे लगता है कि तत्कालीन सरकार ने गांधी की मौत की तहकीकात में लापरवाही बरती थी। सवाल यह भी है कि कहीं गांधी कांग्रेस और पंडित नेहरू को भी बोझ तो नहीं लगने लगे थे। गांधी जिस तरह से कांग्रेस को खत्म करने की बात करते थे, वह नेहरू को बहुत चुभता था। ऐसे ही तमाम बिंदु थे, जिनको लेकर गांधी और नेहरू में मतभेद अक्सर खुलकर सामने आते रहते थे।

गौरतलब हो, 30 जनवरी 1948 को शाम के समय मोहनदास करमचंद गांधी उर्फ महात्मा गांधी नई दिल्ली के बिड़ला हाउस (अब गांधी स्मृति) में रोज़ की प्रार्थना सभा के लिए जा रहे थे, तभी नाथूराम गोडसे ने उन्हें गोली मार दी। पुलिस रिकॉर्ड और ऐतिहासिक दस्तावेज़ बताते हैं कि गोडसे ने तीन गोलियां चलाईं और गांधी जी को तीन गोलियां लगीं, लेकिन कुछ रिकॉर्ड यह भी बताते हैं कि गोडसे ने अपने बयान में कहा था कि उसने दो गोलियां चलाईं, लेकिन पुलिस की जांच में तीन गोलियों के निशान मिले हैं। उस समय सुप्रीम कोर्ट में याचिकाओं में भी यह सवाल उठ चुका था कि क्या चार गोलियां चली थीं, लेकिन इसका कोई ठोस सबूत नहीं मिला। इसी तरह सवाल यह भी है कि गांधी गंभीर रूप से घायल हुए, लेकिन उन्हें अस्पताल नहीं ले जाया गया और उन्हें मौके पर ही मृत घोषित कर दिया गया।

पोस्टमार्टम क्यों नहीं हुआ?

यह एक ऐसा सवाल है, जो आज भी इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के बीच चर्चा में है। इसके पीछे प्रमुख कारण यह बताया गया कि गांधी के परिवार या उनके सहयोगियों ने पोस्टमार्टम की अनुमति नहीं दी थी, जबकि यह बात गले नहीं उतरती है। यह भी उल्लेख है कि सरकार और प्रशासन ने तत्कालीन परिस्थिति में ‘पारिवारिक इच्छाओं को प्राथमिकता दी’, और देशभर में शोक और तनाव की स्थिति के कारण आगे की प्रक्रियाएं सीमित रहीं। बाद में कुछ नेताओं और नागरिकों ने गांधी हत्या की फिर से जांच और पोस्टमार्टम की मांग की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में इसे खारिज कर दिया था।

गोलियों और घटनाक्रम पर तथ्य

पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार गांधी जी को तीन गोलियां लगी थीं। ये गोलियां नाथूराम गोडसे ने ही चलाई थीं और अदालत ने यह तय किया था कि वही मुख्य अपराधी है। गोडसे और उसके सहयोगी नारायण आप्टे को 15 नवंबर 1949 को फांसी दी गई थी। अन्य साथियों को अलग-अलग सजा मिली थी और कुछ बरी भी हुए थे।

नेहरू-गांधी के बीच राजनीतिक और वैचारिक अंतर

गांधी की हत्या गोडसे ने जरूर की थी, लेकिन यह भी सच है कि गांधी और नेहरू के बीच कई मुद्दों पर मतभेद थे। लेकिन यह कहना सही नहीं होगा कि इन्हीं मतभेदों ने कोई हत्या या षड्यंत्र जन्म दिया। दोनों भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के बड़े नेता थे, लेकिन उनकी सोच और रणनीति अलग थी। गांधी अहिंसा, सत्याग्रह, छोटे गांवों और कृषि-आधारित समाज को प्राथमिकता देते थे। उनका मानना था कि हम आत्मनिर्भर हों, और शक्ति का प्रयोग हिंसा के बिना किया जा सकता है। वहीं नेहरू केंद्रीय सरकार, औद्योगिक विकास, आधुनिक शिक्षा और व्यापक समाजवाद की सोच रखते थे। वे मानते थे कि भारत को आधुनिक, औद्योगिक और वैज्ञानिक रूप से विकसित होना चाहिए, ताकि वह दुनिया में अपना स्थान बना सके।

ये मतभेद अक्सर खुलकर सामने आते थे

गांधी ने 1922 में अहिंसा के नाम पर नॉन-कोऑपरेशन आंदोलन रोक दिया, लेकिन नेहरू इससे असहमत रहे थे। विभाजन और स्वतंत्रता के समय पर भी विचार अलग थे। गांधी चाहते थे कि सबका समझौता हो, जबकि नेहरू राजनीति को अलग रूप में देख रहे थे। बहरहाल, इन विरोधाभासों के बाद भी गांधी और नेहरू के रिश्ते में गहरा सम्मान और प्रेम भी था, लेकिन विचारों का संघर्ष और राजनीतिक रणनीति पर चर्चा अक्सर होती थी। नेहरू ने स्वयं लिखा है कि गांधी की विचारधारा के कुछ पहलुओं से वे असहमत थे, और गांधी ने कई बार स्पष्ट किया कि राजनीति में आत्म-निर्णय आवश्यक है। इसका मतलब यह नहीं है कि नेहरू किसी भी तरह से गांधी को बोझ समझते थे या हत्या में शामिल थे। ऐसे आरोपों का कोई प्रमाण नहीं है और जिन मामलों में जांच पुनः खोलने की मांग हुई, उन्हें अदालत ने खारिज किया है।

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