पंजाब विश्वविद्यालय के छात्र चुनाव में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की जीत ने राज्य की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। इस जीत को केवल एक छात्र संगठन की साधारण सफलता मानकर छोड़ना भूल होगी, क्योंकि पंजाब जैसे संवेदनशील प्रदेश में छात्र राजनीति हमेशा व्यापक राजनीतिक और सामाजिक संदेश देती रही है। छात्र संघ के नतीजे प्रायः इस बात का संकेत भी होते हैं कि युवा पीढ़ी किस दिशा में सोच रही है और आने वाले समय में राजनीतिक दलों के लिए कौन-से रास्ते कठिन या सहज होंगे।
अब तक पंजाब के विश्वविद्यालयों में प्रगतिशील, वामपंथी और पंजाबी अस्मिता से जुड़े संगठन अधिक प्रभावी माने जाते रहे हैं। छात्र आन्दोलनों में धर्मनिरपेक्ष और उदारवाद का प्रभाव दिखता रहा है। मगर इस बार एबीवीपी का असरदार प्रदर्शन पंजाब के परंपरागत राजनीतिक ढाँचों के लिए नयी चुनौती है। यह परिणाम इस बात का संकेत है कि राष्ट्रीय स्तर पर चल रही वैचारिक राजनीति का असर अब पंजाब के युवाओं तक पहुँच चुका है।इस जीत से यह धारणा बल पाती है कि पंजाब की नई पीढ़ी अब राष्ट्रीय मुद्दों पर भी अपनी स्पष्ट राय रख रही है और केवल क्षेत्रीय सवालों तक सीमित नहीं रहना चाहती। एबीवीपी ने छात्रहित के सवालों के साथ-साथ राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक अस्मिता और शिक्षा सुधार जैसे विषयों को चुनाव में प्रमुखता से रखा।पंजाब में इस समय आम आदमी पार्टी की सरकार है और कांग्रेस तथा शिरोमणि अकाली दल जैसी पारंपरिक ताकतें खुद को पुनर्जीवित करने के प्रयासों में लगी हैं। ऐसे में एबीवीपी की जीत इन दलों के लिए चेतावनी है कि युवा वर्ग का रुझान तेजी से बदल रहा है।
राज्य में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी ने शिक्षा संस्थानों और युवाओं में अपनी पैठ बनाने की कोशिश लगातार की है। परन्तु विश्वविद्यालय चुनाव में एबीवीपी की जीत ने उनके प्रयासों को झटका दिया है। यह संकेत है कि युवाओं में वैचारिक आधार पर समर्थन पाने की क्षमता भाजपा खेमे के पास भी है।कांग्रेस लम्बे समय से पंजाब की राजनीति में युवाओं पर अपना असर बनाए रखने का दावा करती रही है। लेकिन चंडीगढ़ जैसे उच्च शिक्षण संस्थान में एबीवीपी की सफलता कांग्रेस के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि यह उसका परंपरागत प्रभाव क्षेत्र माना जाता था।शिरोमणि अकाली दल सिख अस्मिता पर आधारित राजनीति करता रहा है। लेकिन छात्र राजनीति में उसकी पहुँच बेहद सीमित हो चुकी है। एबीवीपी की जीत ने यह स्पष्ट किया है कि अकाली दल अब युवा मन को प्रभावित करने की स्थिति में नहीं है।इस जीत का सबसे बड़ा राजनीतिक लाभ भारतीय जनता पार्टी को मिल सकता है।
पंजाब में भाजपा अभी तक स्वतंत्र रूप से मजबूत राजनीतिक आधार नहीं बना पाई है, क्योंकि अकाली दल के साथ उसका गठबंधन हमेशा केंद्र में रहा। परंतु यदि छात्र चुनाव से संकेत मिलता है कि एबीवीपी ने युवाओं के बीच वैचारिक जमीन तैयार कर दी है, तो भाजपा इसे भविष्य के चुनावी लाभ में बदलने का प्रयास करेगी।पंजाब जैसे सूबे में जहां अतीत में आतंकवाद और अलगाववाद ने जड़ें जमाई थीं, वहां राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक एकता की बात करके युवाओं का समर्थन पाना आसान नहीं था। मगर एबीवीपी की इस जीत ने भाजपा को यह भरोसा दिया है कि बदले हुए दौर में ऐसा संभव है। युवा राजनीति में बदलावछात्र राजनीति का असर केवल चुनाव तक सीमित नहीं होता। यह भविष्य की राजनीति की दिशा तय करती है।
पंजाब विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में एबीवीपी की जीत का मतलब है कि यहां से शिक्षा प्राप्त करने वाले युवा आने वाले समय में समाज में वैचारिक परिवर्तन लेकर जाएँगे।इस जीत ने यह संदेश दिया है कि अब पंजाब का छात्र भी राष्ट्रीय स्तर पर चल रही बहसों और विचारधाराओं से जुड़कर अपनी भूमिका तय करना चाहता है। युवाओं में अब केवल स्थानीय मुद्दे जैसे फीस वृद्धि, रोजगार या खेल सुविधाएँ ही नहीं, बल्कि देश और समाज से जुड़े बड़े प्रश्न भी महत्वपूर्ण हो चुके हैं।एबीवीपी की जीत से वामपंथी छात्र संगठनों में गहरी बेचैनी है। उनका मानना है कि यह जीत प्रचार, धनबल और बाहरी दखल से हासिल की गई है। वहीं कांग्रेस समर्थक छात्र संगठन इसे अस्थायी लहर करार देंगे। लेकिन यह भी सच है कि अगर एबीवीपी छात्रों की वास्तविक समस्याओं को हल करने की क्षमता दिखाती है, तो उसका प्रभाव स्थायी हो सकता है।
पंजाब की राजनीति लंबे समय तक सांप्रदायिक और अस्मितामूलक सवालों में उलझी रही है। यदि एबीवीपी युवा वर्ग में अपनी पकड़ बनाती है, तो इसका सांस्कृतिक असर भी पड़ेगा। राष्ट्रीय चेतना और अखिल भारतीय सोच की ओर झुकाव पंजाब को नए सामाजिक संवाद की ओर ले जा सकता है।यह बदलाव कई बार टकराव भी पैदा करेगा, क्योंकि उदार और वामपंथी धारा पंजाब की बौद्धिक राजनीति में गहराई से जुड़ी रही है। मगर यह भी संभव है कि दोनों धाराओं के बीच विचार-विमर्श का नया मंच बने और युवाओं को बहस का सशक्त अवसर मिले।एबीवीपी के लिए यह केवल शुरुआत है। छात्र चुनाव जीतकर उसने शक्ति का प्रमाण दिया है, लेकिन उसकी असली परीक्षा यही होगी कि क्या वह छात्रहित के मुद्दों पर ठोस काम कर पाती है या नहीं। यदि संगठन केवल वैचारिक नारेबाज़ी तक सीमित रहा, तो उसका असर सीमित होगा।
वहीं राजनीतिक दल भी अब यह समझने लगे हैं कि पंजाब जैसे प्रदेश में युवा पीढ़ी को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। जो दल युवाओं के सपनों और उनकी आकांक्षाओं को पूरा करने का प्रयास करेगा, भविष्य की राजनीति पर वही हावी रहेगा।लब्बोलुआब यह है कि पंजाब विश्वविद्यालय में एबीवीपी की जीत न केवल छात्र राजनीति में बड़ा परिवर्तन है, बल्कि यह राज्य की राजनीति के लिए भी अहम संकेत है। यह जीत आने वाले समय में भाजपा और एबीवीपी के लिए अवसर का द्वार खोल सकती है और कांग्रेस, आम आदमी पार्टी तथा अकाली दल जैसे दलों के लिए नई चुनौती खड़ी कर सकती है।यह भी साफ है कि यदि पंजाब की नई पीढ़ी वैचारिक आधार पर राजनीति तय करने लगी है, तो आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में उसका असर दिखाई देगा। इस लिहाज़ से यह छात्र चुनाव केवल विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे पंजाब की राजनीति की दिशा बदलने का संकेत है।
