प्रभु राम लाल के मंदिर के शिखर पर केसरिया ध्वज

अयोध्या की पवित्र भूमि पर सुबह का सूरज जैसा ही उग आया, सरयू के तट पर सुनहरी किरण की बारिश लग गई। इस पूर्णिमा घड़ी में प्रभु राम लाल के मंदिर के शिखर पर केसरिया ध्वज फहराने का शुभ अवसर आया। शहर के हर कोने में भक्ति और उल्लास की लहर थी। जब ध्वज को मंदिर के सर्वोच्च ध्वजदंड पर स्थापित किया गया, तो आस्था का एक अद्भुत दृश्य दिखाई दिया। यह उद्देश्य केवल एक धार्मिक जुलूस नहीं था, बल्कि लाखों भारतीयों की भावनाओं और सपनों का प्रतीक भी था, प्रस्तावना वर्षों से चल रही थी।मंदिर में एक भव्य समारोह का आयोजन किया गया। चारों ओर रंग-बिरंगी रौशनी, फूलों से सजी गलियाँ और भक्तों का अपार जनसैलाब। लोग दूर-दूर से आये थे—किसी की आंखों में आस्था की चमक थी, किसी के नारे पर जय श्रीराम का उद्घोष था। इस मस्जिद पर देश के प्रमुख संत, महामंडलेश्वर, विद्वान, कलाकार और रिज़र्व लोग उपस्थित थे। मंच को भव्य रूप से प्रदर्शित किया गया था, और उसके सामने हजारों की भीड़ मंतरमुग ने हर दृश्य को पहाड़ों में कैद कर रखा था।

कार्यक्रम की शुरुआत वैदिक ऋषियों द्वारा रामायण और वेदों के मंत्रोचारण से हुई। उसके बाद सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने सांता को और मनोहारी बनाया। राम लीला की कुछ झलकियों को मंच पर साकार किया गया- राम जन्म, वनवास और अयोध्या के प्रसंगों ने सभी को भाव-विह्वल कर दिया। बच्चों ने प्रभु श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण और हनुमान के रूप में नृत्य प्रस्तुत किया तो तालियों और जयकारों से वातावरण की गूंज उठाई।इसी पावन अवसर पर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंच पर देश। भीड़ ने उनका स्वागत किया। उन्होंने मंदिर के ध्वज को नमन करते हुए कहा कि यह क्षण भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान का प्रतीक है। उन्होंने अपनी बात में इस दिन को देश के लिए गौरव का दिन बताया और कहा कि प्रभु राम केवल धर्म के आदर्श नहीं हैं, बल्कि राष्ट्र के निषेध – मर्यादा, कर्तव्य और करुणा – के दूत हैं। उन्होंने उपस्थित जनसमूह से आग्रह किया कि वे प्रभु राम के आदर्शों पर आधारित देश निर्माण में अपना योगदान दें। उन्होंने यह भी कहा कि अयोध्या केवल एक नगर नहीं है, बल्कि भारत की आत्मा का केंद्र है, जहां प्रेम, शांति और समरसता का संदेश दुनिया भर में रहता है। उनके शब्दों में दृढ़ संकल्प और उत्साह था, और लोगों की तालियाँ उनकी भावनाओं का प्रत्युत्तर दे रही थीं।

इसके बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मंच पर आये। उन्होंने कहा कि यह अवसर प्रदेश और संपूर्ण भारत के लिए ऐतिहासिक है। उन्होंने राम राज्य की जनसेवा और न्याय के सिद्धांतों की कल्पना का वर्णन किया। उन्होंने कार्यक्रम में सभी साधु-संतों और तीर्थयात्रियों को शामिल किया और यह भरोसेमंद सहयोगी कि अयोध्या आने वाले समय में विश्व के महानतम आध्यात्मिक केंद्र के रूप में विकसित होंगे। उनकी आस्था में श्रद्धा और समाजवादी ताकत दोनों का समावेश था। उन्होंने कहा कि यहां आने वाले हर व्यक्ति को गौरव और सुरक्षा का अनुभव होगा।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने भी इस समारोह में भाग लिया। उन्होंने अपने विचार रखते हुए कहा कि प्रभु राम के जीवन में आदर्श आचरण और समाज के प्रति उत्तरदायित्व की जो भावना है, वह हम सबके जीवन में अपनाने योग्य है। उन्होंने राम मंदिर निर्माण में सभी लोगों की प्रति कृतज्ञता प्रकट की और कहा कि यह किसी एक संगठन या व्यक्ति का नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज की सामूहिक साधना का फल है। उन्होंने लोगों से एकजुटता और एकता बनाए रखने का संदेश दिया और भारत की सांस्कृतिक खेती को मजबूत बनाए रखने की अपील की।

इन प्रमुख प्रमुख वैज्ञानिकों ने एकता, विकास, आध्यात्मिकता और राष्ट्रीय गौरव की भावना से भरे कार्यक्रमों को प्रस्तुत किया। मंच के चारों ओर लगे बड़े स्क्रीन पर ये दृश्य पूरे गोदाम में बैठे लोगों को दिखाई दे रहे थे। श्रेष्ठ कलाकारों द्वारा प्रस्तुत भजन और कीर्तन कार्यक्रम के अंत तक लोग मंत्रमुग्ध करते रहते हैं। मंच के सामने के शिष्य में बैठे साधु-संतों की आँखों में चमक थी – वह पीछे की ओर चमक रहा था, सदियों की प्रतीक्षा, संघर्ष और आस्था का इतिहास छिपा हुआ था।मंदिर पर केसरिया ध्वज लहराते हुए, अयोध्या की धरती से आकाश तक श्रद्धा का संदेश भेजा जा रहा है। ध्वज की फफड़ाहाट में विजय, भक्ति और मर्यादा की कहानी सजीव हो उठी। परिसर में गूंजते जयकारों में हर कोई स्वयं को धन्य महसूस कर रहा था। कुछ लोग आँख मारते हुए नज़र आ रहे थे, तो कुछ अपने बच्चों को ये मूर्तियाँ दिखाई दे रहे थे कि ये क्षण आने वाली आँखे वाली की याद में यादगार बनी रहेगी।

शाम होते-होते मंदिर की रोशनियों से पूरा शहर जगमगा उठा। दीपों की पंक्तियाँ मनो धरती को सितारों की चाँदनी ओढ़ा रही हैं। सरयू तट पर लाखों दीपों की झीलहाट जल में एक अद्भुत दृश्य उत्पन्न हो रहा था। लोग परिवार सहित तट पर टहल रहे थे और फोटो खींचते हुए इस पवित्र दिन की स्मृति खो रहे थे।बौद्धों के हाथों में नारियल, चढ़ावा और केसरिया पटका था। वे मंद-मंद मुसकान के साथ मंदिर की ओर बढ़ रहे थे। कई वृद्ध लोगों ने अपनी युवावस्था में इस क्षण का सपना देखा था, आज उसे अपने सामने साकार रूप देखकर निहाल हो गए। बच्चों में उत्साह था कि वे अपने इष्ट देव का इतना भव्य मंदिर देख रहे हैं। आस्थावान माताएं अपने बालकों को श्रीराम के आदर्शों से रूबरू कराने का संकल्प ले रही थीं।

समापन की ओर बढ़ती हुई लोगों की भावनाएँ अभी भी उसी उत्साह में डूबी हुई थीं। इस दिन की यादें उनके दिलों में प्रतिष्ठित रूप से अंकित हो गईं। मंदिर पर हो रही फ़्लाइट केसरिया ध्वज उन्हें यह याद दिलाती है कि अप्रभावी विशिष्ट वाली वस्तुएं भी सामूहिक प्रयास, विश्वास और धैर्य से संभव हो सकती हैं। प्रभु राम का संयम और नीति की शिक्षा उन्हें निरंतर यह प्रेरणा देती है कि समाज में प्रेम, न्याय और सद्भाव ही सच्ची जीत है।अयोध्या की इस रात चाँद भी छोटा और उजला हो गया था। की ऊँचाईयों पर फ़्लैट ध्वज हवा के साथ जुमता हुआ सभी मनुष्यों को संदेश दे रहा था – कि सत्य की विजय समान होती है, और आस्था का प्रकाश सदा दिशा प्रदान करता है। इस दिन केवल इतिहास में दर्ज एक तारीख नहीं थी, बल्कि एक युगांतकारी परिवर्तन का प्रमाण था। लोगों ने अपने दिल में आशा, उत्साह और एकजुटता के नए संकल्प लिए और प्रभु राम के जयघोष के साथ इस दिव्य दिन को विदा किया।

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