पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते पूर्व मंत्री आर के सिंह बीजेपी से बाहर

बिहार की राजनीति में इन दिनों भारतीय जनता पार्टी के भीतर मची हलचल सबके ध्यान का केंद्र बनी हुई है। विधान सभा चुनाव के बीच पार्टी ने अपने वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री आर के सिंह पर बड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए कारण बताओ नोटिस जारी किया है। नोटिस जारी होने से पहले ही आर के सिंह को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निलंबित कर दिया गया था। अब यह मामला न केवल बिहार की सियासत में नई बहस छेड़ रहा है बल्कि पार्टी के भीतर बढ़ते अंतर्विरोधों का संकेत भी दे रहा है।आर के सिंह भाजपा के पुराने और प्रभावशाली चेहरों में माने जाते हैं। उन्होंने न केवल केंद्रीय मंत्री के रूप में कार्य किया, बल्कि उनके पास प्रशासनिक अनुभव का भी लंबा सफर रहा है। वे भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रह चुके हैं और इन्हीं अनुभवों के दम पर उन्हें राजनीति में एक साफ-सुथरी और प्रखर छवि का नेता माना जाता रहा है। लेकिन इस बार जिस तरह से उन पर पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप लगे हैं, उसने उनके राजनीतिक भविष्य पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया है।

सूत्रों के मुताबिक, पार्टी नेतृत्व को यह शिकायत मिली थी कि आर के सिंह लगातार पार्टी की आधिकारिक लाइन से हटकर बयानबाजी कर रहे हैं और कुछ सीटों पर पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवारों के खिलाफ काम कर रहे हैं। यह आरोप लगाया गया कि उन्होंने अपने प्रभाव क्षेत्र की कुछ सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों या अन्य दलों के प्रत्याशियों को अप्रत्यक्ष समर्थन दिया। भाजपा नेतृत्व ने इसे गंभीर अनुशासनहीनता माना। बिहार प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ने मामले की जांच कर रिपोर्ट केंद्रीय अनुशासन समिति को सौंपी, जिसके बाद यह कड़ा फैसला लिया गया।पार्टी के अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि यह कार्रवाई सिर्फ आर के सिंह तक सीमित नहीं है। कई और वरिष्ठ नेताओं पर भी अनुशासनहीनता और पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप लगे हैं। चुनावी मौसम में टिकट वितरण से असंतुष्ट कुछ नेताओं ने पार्टी लाइन से अलग जाकर अपनी असहमति सार्वजनिक की थी, जिसके बाद पार्टी हाईकमान ने साफ संकेत दिया था कि भाजपा में अनुशासन सर्वोपरि है और कोई भी नेता संगठन से ऊपर नहीं है। इस नीति के अंतर्गत अब कार्रवाई का सिलसिला जारी है।

भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता ने कहा कि पार्टी ने हमेशा संगठनात्मक अनुशासन को सर्वोच्च रखा है। कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना भी वरिष्ठ क्यों न हो, अगर पार्टी के खिलाफ काम करेगा तो उस पर कार्रवाई तय है। उन्होंने कहा कि बिहार चुनाव भाजपा के लिए निर्णायक मोड़ पर हैं और ऐसे समय में किसी भी प्रकार की अंदरूनी कलह से पार्टी को नुकसान पहुंच सकता है, इसलिए अनुशासन तोड़ने वालों के खिलाफ सख्त कदम जरूरी थे।दूसरी ओर आर के सिंह खेमे का कहना है कि उन्हें साजिश के तहत निशाना बनाया गया है। उनके करीबी सूत्रों के अनुसार, आर के सिंह पिछले कुछ महीनों से संगठन की कार्यप्रणाली और टिकट वितरण की प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे थे। उन्होंने सार्वजनिक मंचों पर भी यह कहा था कि पार्टी को “योग्यता के आधार पर टिकट देना चाहिए, न कि केवल जातीय समीकरणों का ध्यान रखते हुए।” माना जा रहा है कि उनके इस रुख ने संगठन के शीर्ष नेताओं को नाराज कर दिया था। यही वजह है कि उन्हें अब निलंबन और नोटिस का सामना करना पड़ रहा है।

बिहार की सियासत में भाजपा इस समय बड़े बदलावों के दौर से गुजर रही है। नीतीश कुमार के साथ लगातार टूट और जोड़ के बाद भाजपा ने इस बार चुनाव में पूरी ताकत के साथ मैदान में उतरने की रणनीति बनाई है। ऐसे में पार्टी नेतृत्व नहीं चाहता कि कोई भी वरिष्ठ नेता संगठनात्मक एकता पर असर डाले। आर के सिंह का मामला भाजपा के लिए अनुशासन दिखाने का उदाहरण बन गया है, जिससे अन्य असंतुष्ट नेताओं को भी संदेश दिया जा सके कि पार्टी लाइन से विचलन बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम भाजपा के अंदर चल रही गुटबाजी को उजागर करता है। आर के सिंह जैसे वरिष्ठ नेता का निलंबन यह दर्शाता है कि बिहार भाजपा में शीर्ष नेतृत्व और कुछ प्रभावशाली स्थानीय गुटों के बीच मतभेद काफी समय से सुलग रहे थे। हालांकि यह भी कहा जा रहा है कि चुनावी रणनीति के लिहाज से भाजपा नेतृत्व यह सुनिश्चित करना चाहता है कि उम्मीदवारों को लेकर किसी प्रकार की असंतोष की लहर चुनावी परिणामों को प्रभावित न करे।

इस पूरे घटनाक्रम ने विपक्षी दलों को भी भाजपा पर हमला बोलने का मौका दे दिया है। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और कांग्रेस ने भाजपा पर आरोप लगाया है कि वह अपने ही नेताओं को दबाने में लगी है और जनता के असली मुद्दों से ध्यान भटका रही है। राजद प्रवक्ता ने कहा कि भाजपा की अंदरूनी लड़ाई अब जनता के सामने आ रही है और यह दिखाने के लिए काफी है कि पार्टी में सब कुछ ठीक नहीं है।हालांकि भाजपा के रणनीतिकार इस विवाद को ज्यादा तूल देने के बजाय इसे “संगठन में सुधार की प्रक्रिया” के रूप में पेश कर रहे हैं। उनका कहना है कि पार्टी में अनुशासन की परंपरा कोई नई बात नहीं है। जो नेता व्यक्तिगत स्वार्थ या क्षेत्रीय समीकरणों के कारण पार्टी के हितों को नुकसान पहुंचाते हैं, उन पर कार्रवाई हमेशा होती रही है। आर के सिंह को जारी कारण बताओ नोटिस में भी उनसे पूछा गया है कि क्यों न उनके खिलाफ स्थायी निष्कासन की कार्रवाई की जाए। उन्हें सात दिनों का समय दिया गया है ताकि वे अपना जवाब पार्टी की अनुशासन समिति को सौंप सकें।अब सबकी नजर इस बात पर है कि आर के सिंह इस नोटिस का क्या जवाब देते हैं और पार्टी आगे क्या रुख अपनाती है। यदि वे अपनी स्थिति स्पष्ट करने में असफल रहते हैं तो उन्हें पार्टी से स्थायी रूप से निष्कासित किया जा सकता है। वहीं अगर वे अपने पक्ष में ठोस तर्क पेश करते हैं तो संभव है कि पार्टी कुछ नरमी दिखाए। लेकिन फिलहाल जो संकेत मिल रहे हैं, उससे यह साफ है कि भाजपा बिहार में अनुशासन के सवाल पर किसी भी कीमत पर समझौता करने के मूड में नहीं है।

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