न्यूज चैनल विवादित मुद्दों को बढ़ावा देेकर साधते हैं अपने हित

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने आधुनिक समाज में सूचना और मनोरंजन के सबसे प्रभावी साधन के रूप में अपना स्थान बना लिया है। परंतु पिछले कुछ वर्षों में यह देखा गया है कि विवादित नेता, अभिनेता और ऐसे विवादास्पद बयान देने वाले लोग जिनके बयान कभी-कभी देश विरोधी या सामाजिक विवाद खड़ा करने वाले होते हैं, उन्हें बड़े पैमाने पर कार्यक्रमों और खबरों में जगह दी जा रही है। यह प्रश्न उठता है कि आखिर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ऐसा क्यों करता है और इससे समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है।

सबसे पहली वजह है टीआरपी यानी टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट्स। मीडिया कंपनियां अपने व्यावसायिक हितों को ध्यान में रखते हुए ऐसे श्रोताओं को आकर्षित करना चाहती हैं जो अधिक रुझान, विवाद और सनसनी की खबरों को पसंद करते हैं। विवादित व्यक्तियों के बयानों में अक्सर तकरार, नज़रिया टकराव और अतिवाद देखने को मिलता है, जो दर्शकों की जिज्ञासा बढ़ाता है। इसलिए चौनल उन्हें प्रमुख कार्यक्रमों में बुलाते हैं ताकि कार्यक्रम का व्यूअरशिप बढ़े और विज्ञापन से आर्थिक लाभ हो। दूसरी वजह है सूचना और विचारों की विविधता का बहाना। एक लोकतांत्रिक समाज में विभिन्न विचारों और आवाजों को मंच मिलना आवश्यक है। मीडिया यह दावा करता है कि वह सभी पक्षों की खबरें और विचार प्रस्तुत करता है ताकि जनता तक विभिन्न दृष्टिकोण पहुंच सके। हालांकि, अक्सर यह विवेचना, बहस या समझदारी में तब्दील नहीं होती, बल्कि व्यक्तिगत विवाद, उत्तेजना और कटुता में बदल जाती है। जब यह धुंधली लाइन पार हो जाती है, तब विवादित बयान देने वाले लोग अनावश्यक चर्चाएँ और विवादित मुद्दे हवा में उड़ा देते हैं।

तीसरी वजह है मीडिया की प्रतिस्पर्धा और तेजी। डिजिटल युग में सोशल मीडिया, यू-ट्यूब, वेब चौनल्स जैसे अनेक विकल्प हैं, जहां खबरें तुरंत और व्यापक स्तर पर प्रसारित होती हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए तेज, सनसनीखेज और विवादास्पद कार्यक्रम पेश करना पड़ता है। जिससे वह इतिहास के ताजा विवाद, वायरल बयान और अजीबोगरीब बहसें प्रमुखता से दिखाता है। इससे दर्शकों में चर्चा और लाइक्स बढ़ते हैं जिससे उसको फायदा मिलता है।चौथी वजह हो सकती है कि कभी-कभी मीडिया संस्थानों की स्वयं की राजनीतिक या किसी विशेष विचारधारा की प्राथमिकताएं होती हैं। वे विवादित नेताओं या अभिनेताओं का मंचन इसलिए करते हैं ताकि वे अपनी एजेंडा सेट कर सकें, किसी विशेष समूह की राय को प्रभावी बना सकें या विपक्षी विचारधाराओं को परस्पर टकराने दें। आम जनता को बहस के बहाने भटकाया जाता है, जबकि वास्तविक उद्देश्य छुपा रहता है।

इसके अलावा, विवादित बयान देने वाले लोग अपनी लोकप्रियता बनाए रखने या बढ़ाने के लिए खुद मीडिया का सहारा लेते हैं। वह जानबूझकर ऐसी बातें करते हैं जो चर्चा में आ जाएं। मीडिया उनका प्रचार करती है, और ऐसे लोगों को एक बार फिर से विशेष दर्जा मिल जाता है। इससे वे और भी अधिक विवादित बयान देते जाते हैं, और यह सिलसिला चलता रहता है।यह व्यवहार समाज के लिए खतरनाक हो सकता है क्योंकि विवादित बयान कभी-कभी समाज में वैमनस्यता, विभाजन और कट्टरता को बढ़ावा देते हैं। इससे सामाजिक समरसता कमजोर होती है और राष्ट्रीय एकता पर भी संकट मंडराने लगता है। युवा वर्ग पर इसका प्रभाव अधिक होता है क्योंकि वे अक्सर मीडिया की बातों को सच्चाई मान लेते हैं और उनके विचारों पर इसका गहरा असर पड़ता है।

फिर सवाल उठता है कि क्या मीडिया को अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए और ऐसे लोगों को अपनी छवि चमकाने का मौका देना बंद कर देना चाहिए? जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि मीडिया कितनी नैतिकता और जिम्मेदारी के साथ काम करती है। एक संतुलित मीडिया जनता को सूचित करने के साथ-साथ सही और विवेकपूर्ण विचार मंच पर लाने की कोशिश करता है। लेकिन जब आर्थिक लाभ, व्यूअरशिप और एजेंडा प्रबल हो जाता है, तब ये नैतिक सीमाएं धुंधली हो जाती हैं। अंत में, यह जरूरी है कि मीडिया उपभोक्ता भी जागरूक बने। हमें समझना होगा कि सभी सवालों के जवाब मीडिया नहीं देता, और सभी बयान सच नहीं होते। विवाद से बढ़कर तथ्य और तर्क को महत्व देना चाहिए। साथ ही, मीडिया को भी चाहिए कि वह अपनी प्रतिक्रियात्मकता और प्रतिस्पर्धा के दबाव में जबरन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने आधुनिक समाज में सूचना और मनोरंजन के सबसे प्रभावी साधन के रूप में अपना स्थान बना लिया है। परंतु पिछले कुछ वर्षों में यह देखा गया है कि विवादित नेताए अभिनेता और ऐसे विवादास्पद बयान देने वाले लोग जिनके बयान कभी.कभी देश विरोधी या सामाजिक विवाद खड़ा करने वाले होते हैंए उन्हें बड़े पैमाने पर कार्यक्रमों और खबरों में जगह दी जा रही है। यह प्रश्न उठता है कि आखिर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ऐसा क्यों करता है और इससे समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है।

सबसे पहली वजह है ज्त्च् यानी टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट्स। मीडिया कंपनियां अपने व्यावसायिक हितों को ध्यान में रखते हुए ऐसे श्रोताओं को आकर्षित करना चाहती हैं जो अधिक रुझानए विवाद और सनसनी की खबरों को पसंद करते हैं। विवादित व्यक्तियों के बयानों में अक्सर तकरारए नज़रिया टकराव और अतिवाद देखने को मिलता हैए जो दर्शकों की जिज्ञासा बढ़ाता है। इसलिए चौनल उन्हें प्रमुख कार्यक्रमों में बुलाते हैं ताकि कार्यक्रम का व्यूअरशिप बढ़े और विज्ञापन से आर्थिक लाभ हो।
दूसरी वजह है सूचना और विचारों की विविधता का बहाना। एक लोकतांत्रिक समाज में विभिन्न विचारों और आवाजों को मंच मिलना आवश्यक है। मीडिया यह दावा करता है कि वह सभी पक्षों की खबरें और विचार प्रस्तुत करता है ताकि जनता तक विभिन्न दृष्टिकोण पहुंच सके। हालांकिए अक्सर यह विवेचनाए बहस या समझदारी में तब्दील नहीं होतीए बल्कि व्यक्तिगत विवादए उत्तेजना और कटुता में बदल जाती है। जब यह धुंधली लाइन पार हो जाती हैए तब विवादित बयान देने वाले लोग अनावश्यक चर्चाएँ और विवादित मुद्दे हवा में उड़ा देते हैं।

तीसरी वजह है मीडिया की प्रतिस्पर्धा और तेजी। डिजिटल युग में सोशल मीडियाए यू.ट्यूबए वेब चौनल्स जैसे अनेक विकल्प हैंए जहां खबरें तुरंत और व्यापक स्तर पर प्रसारित होती हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए तेजए सनसनीखेज और विवादास्पद कार्यक्रम पेश करना पड़ता है। जिससे वह इतिहास के ताजा विवादए वायरल बयान और अजीबोगरीब बहसें प्रमुखता से दिखाता है। इससे दर्शकों में चर्चा और लाइक्स बढ़ते हैं जिससे उसको फायदा मिलता है। चौथी वजह हो सकती है कि कभी.कभी मीडिया संस्थानों की स्वयं की राजनीतिक या किसी विशेष विचारधारा की प्राथमिकताएं होती हैं। वे विवादित नेताओं या अभिनेताओं का मंचन इसलिए करते हैं ताकि वे अपनी एजेंडा सेट कर सकेंए किसी विशेष समूह की राय को प्रभावी बना सकें या विपक्षी विचारधाराओं को परस्पर टकराने दें। आम जनता को बहस के बहाने भटकाया जाता हैए जबकि वास्तविक उद्देश्य छुपा रहता है।

इसके अलावा विवादित बयान देने वाले लोग अपनी लोकप्रियता बनाए रखने या बढ़ाने के लिए खुद मीडिया का सहारा लेते हैं। वह जानबूझकर ऐसी बातें करते हैं जो चर्चा में आ जाएं। मीडिया उनका प्रचार करती हैए और ऐसे लोगों को एक बार फिर से विशेष दर्जा मिल जाता है। इससे वे और भी अधिक विवादित बयान देते जाते हैंए और यह सिलसिला चलता रहता है।यह व्यवहार समाज के लिए खतरनाक हो सकता है क्योंकि विवादित बयान कभी.कभी समाज में वैमनस्यताए विभाजन और कट्टरता को बढ़ावा देते हैं। इससे सामाजिक समरसता कमजोर होती है और राष्ट्रीय एकता पर भी संकट मंडराने लगता है। युवा वर्ग पर इसका प्रभाव अधिक होता है क्योंकि वे अक्सर मीडिया की बातों को सच्चाई मान लेते हैं और उनके विचारों पर इसका गहरा असर पड़ता है।

फिर सवाल उठता है कि क्या मीडिया को अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए और ऐसे लोगों को अपनी छवि चमकाने का मौका देना बंद कर देना चाहिए इसका जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि मीडिया कितनी नैतिकता और जिम्मेदारी के साथ काम करती है। एक संतुलित मीडिया जनता को सूचित करने के साथ.साथ सही और विवेकपूर्ण विचार मंच पर लाने की कोशिश करता है। लेकिन जब आर्थिक लाभए व्यूअरशिप और एजेंडा प्रबल हो जाता हैए तब ये नैतिक सीमाएं धुंधली हो जाती हैं।अंत में यह जरूरी है कि मीडिया उपभोक्ता भी जागरूक बने। हमें समझना होगा कि सभी सवालों के जवाब मीडिया नहीं देताए और सभी बयान सच नहीं होते। विवाद से बढ़कर तथ्य और तर्क को महत्व देना चाहिए। साथ हीए मीडिया को भी चाहिए कि वह अपनी प्रतिक्रियात्मकता और प्रतिस्पर्धा के दबाव में जबरन विवादों को हवा देने की बजाय जिम्मेदार संवाद बनाए। तभी लोकतंत्र के संवेदनशील मुद्दे पर सही दिशा मिल सकती है और देशहित की बात हो सकती है।कुल मिलाकर यह एक जटिल विषय है जिसमें आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक कई तत्व जुड़े हैं। पर साफ यह है कि विवादित नेताओं और अभिनेताओं को माहौल बनाने के लिए मंच देना केवल टीवी रेटिंग या राजनीतिक मकसद से ही नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और राष्ट्रविरोधी प्रवृत्तियों से भी सावधानी के साथ होना चाहिए ताकि सामाजिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता को नुकसान न पहुंचे।

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