नेपाल की राजनीति एक बार फिर बड़े मोड़ पर आ गई है। प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली ने अचानक अपने पद से इस्तीफा देकर पूरे देश को राजनीतिक अस्थिरता के बीच धकेल दिया है। उनके इस्तीफे के फैसले ने जहां सत्ता के गलियारों में हलचल मचा दी है, वहीं आम नागरिक भी अब यह सोचने पर मजबूर हो गए हैं कि आगे नेपाल की राजनीतिक दिशा किस ओर जाएगी। लंबे समय से चल रही खींचतान, आरोप-प्रत्यारोप और पार्टी के भीतर बढ़ती असहमति ने इस इस्तीफे की राह तैयार की। ओली, जिन्होंने खुद को स्थिरता और विकास का चेहरा बताकर जनता से समर्थन हासिल किया था, आज उन्हीं समर्थकों के बीच निराशा का कारण बन गए हैं।
प्रधानमंत्री ओली ने पद छोड़ने की घोषणा करते हुए कहा कि उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान के सम्मान में यह निर्णय लिया है। हालांकि, सियासत के जानकार इसे केवल आदर्शवादी बयान नहीं मानते बल्कि इसके पीछे गहरी राजनीतिक रणनीति देखते हैं। कहा जा रहा है कि ओली अपनी पार्टी के अंदर लंबे समय से जारी दबाव को और अधिक समय तक सहन नहीं कर पा रहे थे। साथ ही, विपक्ष लगातार उनके नेतृत्व पर सवाल खड़े करता रहा। इस बीच अदालत के फैसलों और राष्ट्रपति भवन के रुख ने भी उनके लिए हालात को कठिन बना दिया। आखिरकार, इस्तीफा उनके लिए एकमात्र विकल्प रह गया।ओली के इस्तीफे के बाद नेपाल की सत्ता में असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है। सवाल यह है कि अब अगला प्रधानमंत्री कौन होगा और क्या नई सरकार देश को स्थिरता की ओर ले जा पाएगी। राजनीतिक गलियारों में पहले से ही चर्चाएं शुरू हो गई हैं। कुछ नाम सामने आने लगे हैं, लेकिन इस पर अभी कोई अंतिम सहमति नहीं बन सकी है। नेपाली कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इस मौके को हाथ से जाने देना नहीं चाहेंगे। वहीं, ओली की पार्टी के कुछ गुट भी अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में जुट गए हैं।
नेपाल की जनता लंबे समय से स्थिर सरकार की उम्मीद करती रही है। लेकिन जिस तरह से बार-बार सत्ता परिवर्तन होता रहा है, उसके कारण देश में विकास की गति बाधित रही है। हर नई सरकार पिछले कामों को अधूरा छोड़कर अपनी दिशा तय करने लगती है। परिणामस्वरूप आमजन को वे मूलभूत सुविधाएं नहीं मिल पातीं, जिनकी उन्हें सबसे अधिक जरूरत है। ओली के समय में भी बड़े वादे किए गए थे। उन्होंने बुनियादी ढांचे के विकास, रोजगार सृजन और राजनीतिक स्थिरता पर जोर देने की बात कही थी, लेकिन हकीकत में इन मोर्चों पर कोई बड़ी उपलब्धि सामने नहीं आई।ओली के इस्तीफे को केवल एक व्यक्तिगत हार के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह नेपाल की उस राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा है जिसमें अंतर्कलह और सत्ता के लिए संघर्ष हावी रहता है। संविधान लागू होने के बाद लोगों को यह उम्मीद थी कि देश अब एक मजबूत लोकतांत्रिक ढांचे की ओर बढ़ेगा, लेकिन हालात बार-बार अस्थिरता की ओर मुड़ जाते हैं। इस अस्थिरता का असर नेपाल की अर्थव्यवस्था और सामाजिक ढांचे पर भी पड़ रहा है। विदेशी निवेशक असमंजस में रहते हैं और आम नागरिक अपने भविष्य को लेकर चिंतित हो जाते हैं।
प्रधानमंत्री ओली की कार्यशैली पर भी लगातार सवाल उठते रहे। उन पर यह आरोप भी लगा कि उन्होंने कई मामलों में निरंकुश रवैया अपनाया और सहयोगियों से संवाद की जगह टकराव का रास्ता चुना। अदालत और राष्ट्रपति के साथ उनके संबंध लगातार तनावपूर्ण बने रहे। यह सब वजहें धीरे-धीरे उनके लिए घातक साबित हुईं। पार्टी के भीतर भी उनके विरोधी गुट सक्रिय होते गए और अंततः उन्होंने दबाव बनाने में सफलता पाई।अब आगे की राह बेहद जटिल है। नेपाल नए राजनीतिक समीकरणों के दौर से गुजरेगा जिसमें गठबंधनों की भूमिका अहम होगी। नेपाल के इतिहास को देखते हुए यह कहना कठिन है कि नई सरकार कितने दिन स्थिर रह पाएगी। हालांकि, जनता की उम्मीदें हमेशा नई सरकार से जुड़ जाती हैं। लोग यह मानते हैं कि अगर नई सत्ता सच्चाई और दूरदर्शिता के साथ काम करे तो देश को संकट से बाहर निकाला जा सकता है।ओली का इस्तीफा भले ही व्यक्तिगत और राजनीतिक परिस्थितियों का परिणाम हो, लेकिन इसका सबसे बड़ा असर आम जनता पर पड़ेगा। लोग सवाल कर रहे हैं कि क्या लोकतंत्र का मतलब केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित रह गया है? क्या नेताओं की जिम्मेदारी सिर्फ कुर्सी तक पहुंचना है या जनता के सपनों को साकार करना भी उनका कर्तव्य है? यह इस्तीफा इन गहरे सवालों को भी सामने लाता है।
नेपाल की राजनीति जिस मोड़ पर पहुंच गई है, वहां हर कदम सोच-समझकर उठाने की जरूरत है। इस्तीफों, आरोपों और टकराव की राजनीति ने देश को बार-बार असमंजस में धकेला है। ओली के जाने के बाद सत्ता बदल जाएगी, लेकिन असली चुनौती यह होगी कि क्या नई राजनीति देश की दशकों पुरानी समस्याओं को हल करने में सक्षम होगी। जनता अब निर्णायक और सकारात्मक बदलाव चाहती है। अगर नेतृत्व इस संदेश को समझ ले तो नेपाल के लिए यह संकट एक अवसर साबित हो सकता है।
