बिहार विधानसभा चुनावों में कवायद करने वाली कथित लोकगायिका नेहा सिंह राठौर की सस्ती लोकप्रियता पर इस बार लोकसंगीत की युवा और प्रतिभाशाली कलाकार मैथिली ठाकुर की धाक भारी पड़ी। लंबे समय से नेहा सिंह राठौर महागठबंधन की किसी भी पार्टी से टिकट की आस लगाए बैठी थीं। वह लगातार कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) को निशाने पर लेती रहीं, साथ ही भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर हमलावर भी दिखाई दीं। इन हमलों का उद्देश्य स्पष्ट थाकृविधानसभा चुनाव में किसी बड़े राजनीतिक मंच से टिकट पाना। लेकिन सत्ता के राजनीतिक खेल में उल्टा नतीजा ही निकला, जिससे नेहा को करारी हार के साथ बदनामी भी मिली।
हालांकि नेहा सिंह राठौर ने पिछले वर्षों में अपनी लोकगीति से एक सीमित प्रसिद्धि जरूर हासिल की थी, लेकिन वह राजनीतिक स्तर पर अपने लिए बड़ा मंच तक नहीं पहुंच सकीं। खासकर बिहार जैसे क्षेत्रीय समीकरणों से जुड़े हिस्सों में उनकी लोकप्रियता उतनी प्रभावशाली साबित नहीं हुई, जितनी वह उम्मीद करती थीं। इसके विपरीत, मैथिली ठाकुर, जिनका नाम और आवाज़ युवा वर्ग से लेकर पारंपरिक संगीत प्रेमियों तक में काफ़ी लोकप्रिय है, बीजेपी ने उन्हें विधानसभा चुनाव का टिकट दिया। मैथिली का कद युवा और सांस्कृतिक जनसमूह में बहुत बड़ा था, जिसने बीजेपी को चुनावी ताकत में मजबूती दी। मैथिली ठाकुर की लोकप्रियता का ज़मीनी आधार केवल लोकसंगीत में उनकी कला ही नहीं, बल्कि उनकी शैक्षिक योग्यता, सामाजिक छवि और लोकोक्तियों को आधुनिक संदर्भ में प्रस्तुत करने की क्षमता है। वह सिर्फ एक कलाकार नहीं, बल्कि युवा वर्ग के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुकी हैं। यही वजह रही कि बीजेपी ने उन्हें टिकट देकर इस चुनावी मौके का भरपूर लाभ उठाया। उनका यह कदम बिहार के मतदाताओं में उत्साह भरने वाला साबित हुआ और मैथिली ठाकुर ने चुनाव जीत कर विधायक बनकर अपनी राजनीतिक पकड़ भी मजबूत कर लीं।
वहीं, नेहा सिंह राठौर के संघर्ष और आलोचनाओं का क्या हुआ? कांग्रेस और राजद की तरफ से उन्हें टिकट नहीं मिलने से शुरुआत हुई उनकी राजनीतिक हार। इसके बाद जब बीजेपी की रणनैतिक चूक के चलते उन्हें नजरअंदाज किया गया, तो नेहा ने राजनीतिक मंच पर निराशा और आलोचना के बीच खुद को घिरा पाया। लगातार विपक्ष के खिलाफ बयानबाजी करने के बावजूद उन्होंने सामाजिक और राजनीतिक समरसता बनाने की कोशिश नहीं की, जिससे उनकी छवि विवादास्पद बनी। उनकी लोकप्रियता पर सवाल उठे, और उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा रोडब्लॉक खड़ी हो गई।नेहा की लोकप्रियता जो कभी लोकगुरु के रूप में देखी जाती थी, इस चुनावी दौर में व्यापक आलोचना का सामना करने लगी। सोशल मीडिया पर भी उनकी छवि को लेकर मतभेद हुए, जहां कई लोग उन्हें केवल राजनीति में अपनापन पालने की कोशिश करने वाला सितारा कहते थे, न कि सच्चा लोकगायक। उनके आलोचनात्मक रवैये ने भी बिहार के मतदाताओं को उनसे दूरी बनाने पर मजबूर किया। वहीं, मैथिली ठाकुर की छवि सद्भावना, कला और राजनीति को सहज तरीके से जोड़ने वाली महिला के रूप में गढ़ी गई, जिसका परिणाम आज विधानसभा में उनका स्थान है।
यह चुनाव न केवल लोकगायिका नेहा सिंह राठौर की राजनीतिक हार का प्रतीक बना, बल्कि यह बिहार के राजनीतिक परिवेश में भी बदलाव की एक झलक था। युवा, प्रतिभाशाली जनप्रतिनिधियों का उदय और पुराने दावेदारों के संघर्ष की कहानी इस चुनाव ने उजागर की। बिहार में राजनीति अब केवल संस्थागत लोक समर्थन और पारंपरिक जातीय समीकरण का खेल नहीं रहा, बल्कि युवा आवाजों और कला के माध्यम से सामाजिक जुड़ाव को भी आधार बनाया जा रहा है।नेहा की स्थिति से यह सिखने वाली बात यह है कि जनता केवल सस्ती लोकप्रियता या राजनीति में बयानबाजी से प्रभावित नहीं होती, बल्कि असली कला, जनसंपर्क और सकारात्मक छवि अधिक मायने रखती है। राजनीतिक मंच पर टिके रहने के लिए न केवल सामाजिक संवेदनशीलता चाहिए, बल्कि लगातार संवाद और जनसेवा का भाव भी जरूरी है।आगे का रास्ता नेहा सिंह राठौर के लिए चुनौतिपूर्ण है। उन्हें यह समझना होगा कि बिना मजबूत जमीन पर राजनीतिक पकड़ बनाना मुश्किल होता है, खासकर जब उन जैसे क्षेत्रीय कलाकारों का मुकाबला एक नई पीढ़ी की सशक्त और लोकप्रिय आवाज़ से हो रहा हो। मैथिली ठाकुर की सफलता बिहार में राजनीति में नए युग की शुरुआत भी हैकृजहाँ लोकसंगीत, युवा ऊर्जा, और राजनीतिक सक्रियता का संयोजन अनुभवी पार्टी नेतृत्व के साथ सकारात्मक बदलाव ला सकता है।
इस मामले में यह भी देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले विधानसभा चुनावों में क्या नेहा सिंह राठौर अपने नजरिए को बदलकर फिर से राजनीतिक परिदृश्य में अपनी जगह बना पाएंगी, या फिर यह उनका आखिरी प्रयास साबित होगा। वहीं, मैथिली ठाकुर जैसे युवा नेताओं की बढ़ती लोकप्रियता बिहार की राजनीति को एक नया रंग और दिशा दे रही है, जो सामाजिक व सांस्कृतिक विकास के साथ-साथ राजनीतिक स्थिरता का रास्ता प्रशस्त कर सकती है। बिहार विधानसभा चुनाव में लोकगायिका नेहा सिंह राठौर की सस्ती लोकप्रियता पर मैथिली ठाकुर की जीत ने स्पष्ट कर दिया है कि असली सफलता के लिए सिर्फ नारेबाजी या राजनीतिक हमले नहीं बल्कि जमीनी स्तर पर जनता के दिल में जगह बनाना और सच्चाई के साथ जुड़ना ज़रूरी है।
