भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक रिश्तों का उतार-चढ़ाव नया नहीं है। कभी तकनीकी निवेश और रक्षा समझौतों के जरिए यह साझेदारी गहराई तक मजबूत होती है, तो कभी आयात-निर्यात पर विवादों की वजह से खटास भी सामने आती है। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी दी, जिसने दोनों देशों के बीच तनाव का संकेत दिया। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सख्त तेवर और स्पष्ट रुख के बाद अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या अमेरिका सचमुच इतने बड़े टैरिफ पर अड़ा रहेगा या फिर रणनीतिक और आर्थिक दबाव के चलते ट्रंप को यूटर्न लेना पड़ेगा।पिछले एक दशक में भारत सिर्फ एशिया का ही नहीं बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था का अहम चेहरा बनकर सामने आया है। 3.5 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा की अर्थव्यवस्था और तेजी से बढ़ते उपभोक्ता बाजार ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों को यहां निवेश करने के लिए आकर्षित किया है। अमेरिका जैसे देशों के लिए भारत केवल एक व्यापारिक साझेदार नहीं, बल्कि भविष्य का सबसे बड़ा उपभोक्ता और रणनीतिक सहयोगी भी बन चुका है। ऐसे में ट्रंप के टैरिफ बढ़ाने के कदम से दोनों देशों के रिश्तों में दरार आना अमेरिका के लिए भी घाटे का सौदा होगा। भारत का एक और मजबूत पहलू यह है कि वह अब “विकल्पों” की रणनीति पर चल रहा है। चीन, यूरोपीय संघ, जापान, दक्षिण कोरिया और खाड़ी देशों के साथ भारत के गहरे व्यापारिक रिश्ते हैं। अमेरिका चाहे जितना दबाव बनाए, भारत किसी एक अर्थव्यवस्था पर निर्भर नहीं है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले कुछ वर्षों में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी सीधी बात और दृढ़ता के लिए जाने जाते हैं। चाहे वह पेरिस जलवायु समझौते की चर्चा रही हो या फिर G-20 शिखर सम्मेलन में अपनी शर्तों पर बातचीत, मोदी ने हमेशा यह संदेश दिया है कि भारत को हल्के में नहीं लिया जा सकता। ट्रंप की टैरिफ धमकी के बाद मोदी सरकार की ओर से जो प्रतिक्रिया सामने आई, उसने पूरी दुनिया को यह संकेत दिया है कि भारत अब व्यापार में ष्बराबरी के साझेदारष् की तरह बातचीत करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि मोदी के इस तेवर ने ही वाशिंगटन को सोचने पर मजबूर किया है कि भारत के खिलाफ इतने बड़े टैरिफ का कदम कहीं अमेरिका के लिए उल्टा न पड़ जाए।ट्रंप प्रशासन के लिए यह स्थिति आसान नहीं है। एक ओर वे घरेलू राजनीति में ष्अमेरिका फर्स्टष् एजेंडे के तहत अपने उद्योगपतियों को संतुष्ट करना चाहते हैं, दूसरी ओर भारत के साथ रिश्ते बनाए रखना भी उनके लिए जरूरी है। खासकर टेक्नोलॉजी, ऊर्जा, फार्मा और रक्षा जैसे क्षेत्रों में अमेरिकी कंपनियों के अरबों डॉलर भारत में निवेशित हैं। अगर टैरिफ बढ़ता है, तो इन कंपनियों को सीधा नुकसान होगा। भारत ने अब खुद को एक मजबूत ’’बाजार’’ के रूप में स्थापित कर लिया है। 140 करोड़ की आबादी वाला भारत अमेरिकी कृषि उत्पादों, ऊर्जा और उच्च तकनीक उपकरणों के लिए विशाल अवसर प्रस्तुत करता है। अमेरिका इतनी बड़ी मांग को आसानी से खोना नहीं चाहेगा।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि भारत टकराव की स्थिति में हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठता। बीते वर्षों में जब अमेरिकी प्रशासन ने इंपोर्ट ड्यूटी में बढ़ोतरी की थी, तब भारत ने भी अमेरिकी उत्पादों पर टैरिफ बढ़ाने का संकेत दिया और उस पर आंशिक रूप से अमल भी किया। इससे अमेरिकी निर्यातकों पर दबाव बना। भारत की नीति साफ हैकृ“यदि आप हमारे साथ संतुलन नहीं बनाएंगे, तो हम भी अपने हितों की रक्षा करेंगे।” यही रवैया आज भारत की कूटनीतिक मजबूती का प्रतीक बन चुका है। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की बढ़ती ताकत ने अमेरिका को भारत की अहमियत और बढ़ाकर बता दी है। अमेरिका के लिए भारत केवल व्यापारिक साझेदार नहीं, बल्कि चीन को वज़नदार जवाब देने वाला सामरिक सहयोगी भी है। इस लिहाज से भी ट्रंप प्रशासन भारत के खिलाफ कोई कठोर आर्थिक कदम लंबे समय तक नहीं चला पाएगा।
भारत का एक और बड़ा हथियार उसका विशाल इंजीनियरिंग और आईटी सेक्टर है। अमेरिका की तमाम कंपनियां भारतीय इंजीनियरों और सॉफ्टवेयर सेवाओं पर निर्भर हैं। अगर टैरिफ विवाद बढ़ता है, तो यह सहयोग भी प्रभावित हो सकता है। यह स्थिति ट्रंप प्रशासन के लिए बड़ी विरोधाभासी चुनौती खड़ी करती है। सभी संकेत यही बताते हैं कि मोदी के सख्त रुख और भारत की रणनीतिक मजबूती के कारण ट्रंप को भारीभरकम टैरिफ नीति पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है। अमेरिका के अंदर भी इंडस्ट्री ग्रुप और व्यापारिक लॉबी इस बात का दबाव बना रही है कि भारत विरोधी नीतियों से उनके मुनाफे को नुकसान होगा। संभव है कि ट्रंप कुछ टैरिफ बनाए रखें ताकि घरेलू राजनीति में ष्मजबूतष् दिख सकें, लेकिन पूरी तरह 50 प्रतिशत टैरिफ को लागू करना मुश्किल है। आखिरकार भारत अब कोई ऐसा बाजार नहीं रहा जिसे धमकाकर झुकाया जा सके। उसके पास विकल्प भी हैं और क्षमता भी।भारत और अमेरिका की साझेदारी आज एक निर्णायक मोड़ पर है। मोदी के सख्त तेवरों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत समझौते करेगा, लेकिन अपनी शर्तों पर। रणनीतिक, आर्थिक और राजनीतिक तीनों मोर्चों पर भारत इतना मजबूत हो चुका है कि अमेरिका जैसे देश को भी दो बार सोचना पड़ रहा है। आने वाले दिनों में टैरिफ विवाद किस दिशा में जाएगा, यह देखने वाली बात होगी, लेकिन इतना तय है कि 21वीं सदी का नया भारत अब दबाव में आने वाला नहीं है।
