मायावती की बड़ी रैली में दिखी ताकत, योगी की तारीफ और सपा-कांग्रेस को खुली चुनौती

उत्तर प्रदेश की सियासत में कभी-कभी ऐसे पल आते हैं, जब एक रैली या एक बयान पूरे राजनीतिक माहौल को बदल देता है। 9 अक्टूबर 2025 को लखनऊ के कांशीराम स्मारक स्थल पर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की महारैली कुछ ऐसी ही थी। बसपा सुप्रीमो मायावती ने यहां न सिर्फ अपनी पार्टी की ताकत दिखाई, बल्कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार की सराहना करके सबको चौंका दिया। वहीं, समाजवादी पार्टी (सपा) और उसके अध्यक्ष अखिलेश यादव पर जमकर निशाना साधा। यह रैली कांशीराम की 19वीं पुण्यतिथि पर आयोजित हुई थी, लेकिन इसका असर 2027 के विधानसभा चुनाव तक महसूस किया जाएगा। लाखों की भीड़ देखकर लगता है कि मायावती अभी भी दलित राजनीति की धुरी हैं, और उनकी यह चाल सपा के पीडीए फॉर्मूले को तोड़ने की कोशिश है।

सुबह से ही लखनऊ की सड़कें नीले झंडों और बसपा के पोस्टरों से पट गई थीं। कांशीराम स्मारक स्थल पर सुबह 4 बजे से ही लोग जुटने लगे थे। पार्टी का दावा है कि 5 लाख से ज्यादा कार्यकर्ता और समर्थक पहुंचे। मायावती मंच पर 3 घंटे से ज्यादा समय तक रुकीं और 66 मिनट तक भाषण दिया। यह रैली 9 साल बाद हो रही थी, आखिरी बार 2016 में ऐसी रैली हुई थी, जब 2017 के चुनाव से पहले मायावती ने ताकत दिखाई थी। इस बार भी 2027 के चुनाव से पहले यह शक्ति प्रदर्शन था। मायावती ने कांशीराम को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि उन्होंने दलितों और पिछड़ों के उत्थान के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। लेकिन असली धमाका उनके राजनीतिक बयानों में था।

मायावती ने सबसे पहले योगी सरकार की तारीफ की। उन्होंने कहा, हम मौजूदा सरकार के आभारी हैं, क्योंकि उन्होंने हमारे बनवाए स्मारक स्थलों के रखरखाव के लिए टिकट से मिली राशि का सही उपयोग किया। भाजपा सरकार ने पैसा दबाया नहीं, सपा जैसी नहीं है यह पार्टी। यह सुनकर हर कोई हैरान रह गया। आमतौर पर विपक्षी रैलियों में सत्ता पक्ष पर हमला होता है, लेकिन यहां उलटा हुआ। मायावती ने बताया कि सपा सरकार में स्मारकों की हालत खराब हो गई थी, एक रुपया भी रखरखाव पर नहीं खर्च किया गया। लेकिन योगी सरकार ने उनके आग्रह पर मरम्मत कराई। यह तारीफ यूं ही नहीं थी। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मायावती समझ चुकी हैं कि भाजपा उनके दलित वोटबैंक के लिए सीधा खतरा नहीं है। भाजपा का फोकस दूसरे वोटरों पर है, जबकि सपा का पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूला बसपा की जमीन खिसका रहा है।

सपा पर मायावती का हमला और भी तीखा था। उन्होंने अखिलेश यादव को नाम लेकर निशाने पर लिया और सपा को दोगला तक कह दिया। मायावती बोलीं, जब सत्ता में रहते हैं तो उन्हें न कांशीराम याद आते हैं, न पीडीए। सत्ता से बाहर होते ही याद आ जाती है। अगर कांशीराम के प्रति सम्मान होता तो कासगंज जिले का नाम कांशीराम नगर से क्यों बदल दिया? उन्होंने सपा पर आरोप लगाया कि वह सत्ता में PDA भूल जाती है, लेकिन विपक्ष में इसका ढोंग करती है। यह बयान दलित समुदाय को साफ संदेश था अपने दोस्त और दुश्मन को पहचानो। मायावती जानती हैं कि 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने PDA फॉर्मूले से 37 सीटें जीतीं, जिसमें दलित-मुस्लिम-OBC गठजोड़ ने बड़ी भूमिका निभाई। बसपा का वोट शेयर 2022 में 12.9% था, जो 2024 में 6% तक गिर गया। कोई लोकसभा सीट नहीं जीती। सपा का यह फॉर्मूला बसपा के कोर वोटबैंक जाटव दलितों को तोड़ रहा है। इसलिए मायावती ने सपा को दलित विरोधी करार दिया।

कांग्रेस पर भी मायावती ने निशाना साधा। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने बाबा साहब अंबेडकर को भारत रत्न नहीं दिया, उनके निधन पर राष्ट्रीय शोक तक घोषित नहीं किया। कांशीराम के देहांत पर भी यही हुआ। मायावती ने जातिगत जनगणना की मांग को राजनीतिक स्वार्थ बताया। उनका कहना था कि इससे सपा को OBC और गैर-जाटव दलितों का समर्थन मिलेगा, जो बसपा को कमजोर करेगा। रैली में मायावती ने CBI और इनकम टैक्स केसों को साजिश बताया, जो भाजपा और कांग्रेस ने उनके खिलाफ चलाए। लेकिन दिलचस्प बात यह कि उन्होंने भाजपा पर सीधा हमला नहीं किया, सिर्फ नरम आलोचना की। जैसे, अपराध और जातिवाद चरम पर है, लेकिन योगी की तारीफ करके उन्होंने संकेत दिया कि भाजपा से कोई सीधा टकराव नहीं।

यह रणनीति पुरानी है। मायावती और भाजपा का इतिहास गठबंधन का रहा है। 1995, 1997 और 2002-03 में दोनों ने साथ सरकार बनाई। गेस्ट हाउस कांड में भाजपा ने मायावती की मदद की थी। ब्रह्मदत्त द्विवेदी जैसे नेता आगे आए। मायावती जानती हैं कि भाजपा उनके खिलाफ कभी तीखी बयानबाजी नहीं करती, जबकि सपा और कांग्रेस दलित वोट छीन रही हैं। योगी की तारीफ से मायावती दलितों को बता रही हैं कि भाजपा कम से कम उनके प्रतीकों का सम्मान करती है। इससे सपा का विपक्षी कद कमजोर होता है। राजनीतिक पंडित कहते हैं कि यह बीजेपी की बी-टीम का टैग लगने का जोखिम है, लेकिन मायावती के लिए मुख्य मुकाबला सपा से है। अगर गठबंधन की नौबत आई तो यह उनके फायदे में बदल सकता है।

रैली में मायावती ने 2027 चुनाव अकेले लड़ने का ऐलान किया। उन्होंने कहा, पुराने अनुभवों से अब किसी से गठबंधन नहीं करेंगे। जब-जब गठबंधन किया, नुकसान हुआ। 2007 में अकेले लड़कर पूर्ण बहुमत पाया। उन्होंने उदाहरण दिए 1993 में सपा से गठबंधन में 67 सीटें मिलीं, 1996 में कांग्रेस से भी 67। लेकिन 2002 में अकेले 100 से ज्यादा, और 2007 में 200 से अधिक। हालांकि, उन्होंने 2012, 2017 और 2022 के चुनावों का जिक्र नहीं किया, जहां अकेले लड़कर बसपा का प्रदर्शन खराब रहा। 2019 में सपा से गठबंधन का भी नुकसान हुआ, दलित वोट बंटे। मायावती ने ईवीएम पर सवाल उठाया और बैलेट पेपर की मांग की। उनका कहना था कि विरोधी ईवीएम धांधली से बसपा को हराते हैं।

रैली में परिवारवाद का भी जिक्र हुआ। मायावती ने भतीजे आकाश आनंद को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया। आकाश अब पार्टी मजबूत कर रहे हैं। भाई आनंद दिल्ली में लेखा-जोखा संभालते हैं, सतीश चंद्र मिश्रा ब्राह्मणों को जोड़ते हैं। यह संगठनात्मक एकता दिखाने की कोशिश थी। मायावती ने आजम खान से मुलाकात की अफवाहों को खारिज किया, कहा मैं कभी छिपकर नहीं मिलती। बिना नाम लिए चंद्रशेखर आजाद जैसे युवा दलित नेताओं पर निशाना साधा, कहा स्वार्थी और बिकाऊ लोग छोटे संगठन बनाकर वोट काटते हैं। यह संदेश था कि बसपा ही दलितों की सच्ची हितैषी है।

राष्ट्रीय मुद्दों पर भी मायावती बोलीं। कश्मीर के पहलगाम हमले पर सरकार की आलोचना की, कहा सुरक्षा होती तो हमला रोका जा सकता था। ट्रंप के टैरिफ पर भारत को सावधान रहने की सलाह दी। आई लव जैसी राजनीति की आलोचना की, सभी धर्मों का सम्मान करने को कहा। यह उनकी राष्ट्रीय छवि मजबूत करने की कोशिश थी। 2007 की सरकार को मिसाल बताया, कहा हमने भयमुक्त शासन दिया, लोगों को आत्मनिर्भर बनाया, मुफ्त राशन से गुलाम नहीं।

यह रैली बसपा के अस्तित्व की जंग थी। पार्टी का वोटबैंक खिसक रहा है, लेकिन लाखों की भीड़ से जोश आया। मायावती ने दलितों को जागरूक रहने की नसीहत दी, कहा जातिवादी पार्टियां बहुजन नायकों को सत्ता से बाहर रहकर याद करती हैं। सपा नंबर-1 जातिवादी है, गुंडों-माफियाओं को बढ़ावा देती है। भाजपा सरकार में भी यही हाल है, लेकिन तारीफ करके उन्होंने संतुलन बनाया।

बहरहाल, यह रैली बताती है कि उत्तर प्रदेश की सियासत में मायावती अभी भी एक ताकत हैं। 2027 में बसपा अकेले लड़ेगी, लेकिन योगी की तारीफ से गठबंधन के दरवाजे खुले हैं। सपा को PDA बचाने की चुनौती मिली है। दलित वोटबैंक पर जंग तेज होगी। आम आदमी के लिए सवाल यह है कि क्या यह चालें जनता के हित में हैं या सिर्फ सत्ता की कुर्सी के लिए? समय बताएगा, लेकिन इतना तय है कि यूपी की राजनीति रोचक हो गई है।

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