महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर हवा का रुख साफ दिख गया है। रविवार को घोषित हुए नगर परिषद और नगर पंचायत चुनावों के नतीजों ने महायुति गठबंधन को चमकदार सफलता दी है। कुल 288 शहरी निकायों के अध्यक्ष पदों पर महायुति ने 207 सीटें हासिल कर लीं, जबकि विपक्षी महाविकास आघाड़ी को महज 44 पर संतोष करना पड़ा। यह जीत न सिर्फ महायुति की ताकत को रेखांकित करती है, बल्कि आने वाले बड़े चुनावों के लिए भी एक मजबूत संकेत देती है। बीजेपी ने अकेले 117 अध्यक्ष पद जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के तमगे को और मजबूत कर लिया, वहीं एकनाथ शिंदे की शिवसेना को 53 और अजित पवार की एनसीपी को 37 सीटें मिलीं। दूसरी तरफ, कांग्रेस को 28, उद्धव ठाकरे की शिवसेना-यूबीटी को 9 और शरद पवार की एनसीपी को 7 सीटें ही नसीब हुईं। बाकी 37 सीटें अन्य दलों और निर्दलीयों के पास चली गईं।
ये चुनाव दो चरणों में हुए थे। पहले चरण में 2 दिसंबर को 264 निकायों में वोट डाले गए, जबकि दूसरे चरण में 20 दिसंबर को बाकी 24 पर वोटिंग हुई। कुल 246 नगर परिषदों और 42 नगर पंचायतों में अध्यक्ष और सदस्यों के लिए मुकाबला था। नतीजों से साफ है कि महायुति का दबदबा हर कोने में दिखा। खासकर बीजेपी ने पार्षदों की संख्या में रिकॉर्ड बनाया। पार्टी को 3300 से ज्यादा पार्षद चुने गए, जो कुल पार्षदों का करीब 48 फीसदी है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इसे ऐतिहासिक बताया। उन्होंने कहा, ‘यह हमारा सकारात्मक अभियान का नतीजा है। 2017 में हमें 1602 पार्षद मिले थे, अब यह संख्या दोगुनी से ज्यादा हो गई। पिछले 30-35 सालों में कभी इतना अच्छा प्रदर्शन नहीं हुआ।’ फडणवीस की यह बात महायुति के उत्साह को दर्शाती है, जो अब मुंबई, पुणे, ठाणे और नागपुर जैसे बड़े नगर निगम चुनावों की तैयारी में जुट चुकी है।
क्षेत्रीय नजरिए से देखें तो महायुति की जीत हर तरफ बिखरी हुई है। विदर्भ के 100 निकायों में से 73 पर महायुति का कब्जा हो गया। यहां बीजेपी ने 58, शिंदे शिवसेना ने 8 और अजित एनसीपी ने 7 सीटें जीतीं। कांग्रेस को 23 सीटें मिलीं, लेकिन बाकी विपक्ष का साफा हो गया। मराठवाड़ा के 52 निकायों में बीजेपी को 25, शिंदे शिवसेना को 8 और अजित एनसीपी को 6 सीटें मिलीं। यहां भी कांग्रेस सिर्फ 4 पर सिमट गई। उत्तरी महाराष्ट्र के 49 निकायों में महायुति ने 36 सीटें लपकीं, जिसमें बीजेपी की 18, शिंदे शिवसेना की 11 और अजित एनसीपी की 7 शामिल हैं। पश्चिमी महाराष्ट्र के 60 निकायों में तो महायुति ने कमाल कर दिया। बीजेपी को 19, शिंदे शिवसेना को 14 और अजित एनसीपी को 12 सीटें मिलीं। पुणे जिले में तो महायुति ने सभी 17 अध्यक्ष पद जीत लिए, जिसमें अजित एनसीपी को 10 मिले। बारामती में अजित पवार की एनसीपी ने जबरदस्त प्रदर्शन किया। जय पाटिल ने चौथी बार अध्यक्ष पद जीता, वो भी महज 200 वोटों से। यह शरद पवार के लिए बड़ा झटका है, क्योंकि बारामती उनकी जन्मभूमि रही है। कोंकण के 27 निकायों में शिंदे शिवसेना ने सबसे ज्यादा 10 सीटें जीतीं, बीजेपी को 9 मिलीं। यहां उद्धव शिवसेना को सिर्फ 1 सीट नसीब हुई।
इस जीत का एक दिलचस्प पहलू यह है कि महायुति के दलों ने कहीं साथ मिलकर लड़े, तो कहीं एक-दूसरे से टक्कर ली। लोकसभा और विधानसभा चुनावों में एकजुट दिखे ये दल स्थानीय स्तर पर अपनी-अपनी जमीन बचाने के चक्कर में भिड़ गए। फिर भी, कुल मिलाकर उनका पलड़ा भारी रहा। उदाहरण के तौर पर, पालघर में शिंदे शिवसेना ने जीत हासिल की, जबकि जव्हार और वाडा में बीजेपी आगे रही। दहाणू में शिंदे शिवसेना के राजेंद्र माची जीते, तो उरण में एनसीपी-एसपी की भावना दंडेकर। लेकिन कुल गिनती में महायुति का स्कोर 207 पर पहुंच गया। विपक्ष की एकता यहां फेल साबित हुई। महाविकास आघाड़ी के दलों ने कहीं शिंदे शिवसेना का, तो कहीं अजित एनसीपी का समर्थन किया, लेकिन यह रणनीति उल्टी पड़ी। संजय राउत ने नतीजों पर सवाल उठाते हुए कहा, ‘पैसे की ताकत और चुनाव आयोग की निष्क्रियता ने खेल बिगाड़ दिया।’ वहीं, कांग्रेस के हर्षवर्धन सपकल ने व्यंग्य भरा बयान दिया, ‘विजेताओं को बधाई, लेकिन चुनाव आयोग को भी।’
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महायुति की जीत पर ट्वीट कर कहा, ‘महाराष्ट्र विकास के साथ खड़ा है। महायुति को बधाई।’ गृह मंत्री अमित शाह ने कार्यकर्ताओं का धन्यवाद किया और इसे विकास की जीत बताया। एकनाथ शिंदे ने इसे ‘ट्रेलर’ करार दिया। उन्होंने कहा, ‘लोगों ने असली शिवसेना को चुना। लाडकी बहनों का आभार। यह नगर निगम चुनावों का संकेत है।’ शिंदे की यह बात सही लगती है, क्योंकि उनकी पार्टी ने कोंकण और पश्चिमी महाराष्ट्र में अच्छा प्रदर्शन किया। अजित पवार की एनसीपी ने पुणे में दबदबा कायम रखा। करीब 10 महापौर पद उनकी पार्टी से चुने गए। रामदास आठवले ने इसे शानदार सफलता बताते हुए कहा, ‘बीएमसी में 14-15 सीटें जीतेंगे।’ दूसरी तरफ, बीजेपी के चंद्रशेखर बावनकुले ने कहा, ‘लोगों ने एमवीए को ठुकरा दिया। हम 135 से ज्यादा सीटें जीतेंगे।’
ये नतीजे महायुति के लिए ट्रिपल इंजन सरकार का मजबूत आधार हैं। केंद्र, राज्य और अब स्थानीय स्तर पर उनका कंट्रोल है। 2017 के मुकाबले बीजेपी की पार्षद संख्या दोगुनी हो गई। फडणवीस ने इसे रिकॉर्ड तोड़ बताया। लेकिन कुछ जगहों पर विवाद भी हुआ। नागपुर के कांप्टी में बीजेपी की 116 वोटों से जीत पर कांग्रेस ने पुनर्गणना की मांग की। पुणे के जेजुरी में जश्न के दौरान आग लगने से 16 लोग घायल हो गए। चंद्रपुर के ब्रह्मपुरी में कांग्रेस ने 23 में से 21 सीटें जीतकर एकमात्र बड़ी सफलता पाई। सांगली के उरुन-इश्वरपुर में शरद पवार की एनसीपी ने 23 सीटें ले लीं। लेकिन कुल मिलाकर विपक्ष का सफाया हो गया। राज ठाकरे की मनसे को एक भी सीट नहीं मिली।
यह जीत महायुति को आने वाले नगर निगम चुनावों में मजबूती देगी। मुंबई में बीएमसी, पुणे में पीएमसी जैसे बड़े मुकाबले हैं। इन्हें मिनी विधानसभा कहा जाता है, और महायुति ने साबित कर दिया कि उनकी पकड़ कमजोर नहीं पड़ी। विधानसभा चुनावों में पूर्ण बहुमत से बनी सरकार अब स्थानीय स्तर पर भी मजबूत हो गई। विकास के नाम पर वोटरों ने साथ दिया। शिना एनसी ने कहा, ‘लोगों ने उपनामों से ऊपर उठकर विकास चुना। शिंदे की अगुवाई में शिवसेना ने 60 से ज्यादा सीटें जीतीं।’ धनंजय मुंडे ने बीड में कहा, ‘विपक्ष का बदनाम करने का प्लान लोगों ने तोड़ दिया।’
कुल मिलाकर, ये नतीजे महाराष्ट्र की सियासत को नया मोड़ दे रहे हैं। महायुति की दुश्मनी का दांव काम आया, जहां दोस्ती की बजाय अपने-अपने हितों ने जीत दिलाई। विपक्ष को अब आत्ममंथन करना होगा। सांना अखबार ने चुनाव आयोग पर सवाल उठाए, लेकिन हकीकत यही है कि वोटर ने फैसला सुना दिया। आने वाले दिनों में यह जीत कैसे असर दिखाएगी, यह देखना दिलचस्प होगा। महाराष्ट्र अब विकास की राह पर तेजी से बढ़ने को तैयार लगता है, और महायुति इसके इंजन बनेगी।
