जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय एक बार फिर सुर्खियों में है। सोमवार रात कैंपस के साबरमती हॉस्टल के बाहर हुए छात्र प्रदर्शन ने न केवल विश्वविद्यालय का माहौल गरमा दिया, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी नई बहस छेड़ दी। 2020 के दिल्ली दंगा साजिश मामले में पूर्व जेएनयू छात्र उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज होने के कुछ ही घंटों बाद छात्रों के एक समूह ने विरोध प्रदर्शन किया। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और कुछ बड़े उद्योगपतियों के खिलाफ तीखे और विवादित नारे लगाए गए, जिनके वीडियो सामने आने के बाद विवाद और गहरा गया।
प्रत्यक्षदर्शियों और रिपोर्टों के मुताबिक, रात करीब 9 बजे से 10:30 बजे के बीच साबरमती हॉस्टल के बाहर लगभग 30 से 40 छात्र एकत्र हुए। हाथों में तख्तियां, पोस्टर और ढपली लिए छात्रों ने सरकार, न्यायिक फैसलों और मौजूदा नीतियों के खिलाफ नारेबाजी की। नारे इतने आक्रामक थे कि कैंपस में मौजूद कई छात्रों और शिक्षकों ने इसे मर्यादा की सीमा लांघने वाला बताया। कुछ देर के लिए हॉस्टल के आसपास का माहौल तनावपूर्ण हो गया, हालांकि किसी तरह की हिंसा की सूचना नहीं है।
इस प्रदर्शन के पीछे दो मुख्य कारण बताए जा रहे हैं। पहला कारण 5 जनवरी 2020 को जेएनयू कैंपस में हुई हिंसा की बरसी है। उस दिन नकाबपोश हमलावरों ने छात्रों और शिक्षकों पर लाठियों, पत्थरों और लोहे की छड़ों से हमला किया था। उस हिंसा में कम से कम 28 लोग घायल हुए थे, जिनमें छात्र संघ की तत्कालीन अध्यक्ष भी शामिल थीं। छात्रों और शिक्षकों का एक वर्ग आज भी यह सवाल उठाता है कि इतने साल बीत जाने के बावजूद उस हमले के जिम्मेदार लोगों की पहचान और गिरफ्तारी क्यों नहीं हो पाई।
दूसरा और ताजा कारण सुप्रीम कोर्ट का फैसला है। अदालत ने 2020 के दिल्ली दंगा साजिश मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया। अदालत की टिप्पणी के अनुसार, जांच एजेंसियों द्वारा पेश किए गए दस्तावेज, गवाहों के बयान और अन्य साक्ष्य इस ओर इशारा करते हैं कि दोनों आरोपियों की भूमिका कथित साजिश में महत्वपूर्ण रही है। इसी आधार पर अदालत ने कहा कि इस स्तर पर जमानत देना उचित नहीं होगा।
बताया जा रहा है कि इसी फैसले से नाराज छात्रों ने इसे न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल उठाने और असहमति जताने का माध्यम बनाया। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि वे किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि व्यवस्था और फैसलों के खिलाफ अपनी आवाज उठा रहे हैं। छात्र संघ से जुड़े कुछ नेताओं ने दावा किया कि नारे प्रतीकात्मक थे और उनका उद्देश्य किसी को धमकाना नहीं था। हालांकि, नारे की भाषा और शब्दों को लेकर विश्वविद्यालय के भीतर और बाहर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली।
प्रदर्शन के वीडियो सामने आने के बाद सियासी बयानबाज़ी तेज हो गई। सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इसे राष्ट्रविरोधी सोच और अभिव्यक्ति की आज़ादी का दुरुपयोग बताया। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के खिलाफ इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल न केवल आपत्तिजनक है, बल्कि कानून-व्यवस्था के लिए भी खतरा बन सकता है। कुछ नेताओं ने यह भी कहा कि जेएनयू लंबे समय से उग्र राजनीति का केंद्र बनता जा रहा है, जिससे इसकी शैक्षणिक छवि को नुकसान हो रहा है।
वहीं दूसरी ओर, विपक्षी दलों और वामपंथी संगठनों ने छात्रों के विरोध का बचाव किया। उनका कहना है कि लोकतंत्र में असहमति जताना हर नागरिक का अधिकार है और विश्वविद्यालय हमेशा से विचारों की बहस का मंच रहे हैं। उनके अनुसार, जब छात्रों को लगता है कि उनके साथ अन्याय हो रहा है, तो विरोध स्वाभाविक है। हालांकि, कुछ नेताओं ने यह भी माना कि भाषा संयमित होनी चाहिए थी।
दिल्ली पुलिस ने इस मामले में फिलहाल सतर्क रुख अपनाया है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि उन्हें घटना की जानकारी है और सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो की जांच की जा रही है। अभी तक किसी पक्ष की ओर से औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं कराई गई है, लेकिन स्थिति को देखते हुए पुलिस अपने स्तर पर भी तथ्य जुटा रही है। यदि किसी कानून का उल्लंघन पाया जाता है, तो आगे की कार्रवाई की जा सकती है।
कैंपस का माहौल पहले से ही तनावपूर्ण बताया जा रहा है। पिछले कुछ दिनों से लाइब्रेरी में फेसियल रिकॉग्निशन सिस्टम और मैग्नेटिक गेट लगाए जाने को लेकर भी छात्र विरोध कर रहे हैं। छात्रों का आरोप है कि इस तरह की व्यवस्थाएं निगरानी बढ़ाने और निजता पर हमला करने जैसी हैं। इसी मुद्दे पर हाल ही में छात्र संघ के कुछ पदाधिकारियों को पूछताछ के लिए बुलाए जाने से नाराजगी और बढ़ गई थी। ऐसे में ताजा नारेबाजी ने स्थिति को और संवेदनशील बना दिया।
जेएनयू का नाम देश के प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों में लिया जाता है। यहां से बड़ी संख्या में नौकरशाह, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता निकले हैं। लेकिन बीते कुछ वर्षों में यह विश्वविद्यालय बार-बार राजनीतिक विवादों के कारण चर्चा में रहा है। समर्थकों का कहना है कि जेएनयू विचारों की आज़ादी और बहस की परंपरा के लिए जाना जाता है, जबकि आलोचक इसे अराजकता और उग्र राजनीति का गढ़ बताते हैं।
ताजा घटनाक्रम ने एक बार फिर यही सवाल खड़ा कर दिया है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी और जिम्मेदारी के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। क्या विरोध के नाम पर किसी भी तरह की भाषा का इस्तेमाल सही है, या फिर लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन जरूरी है? इस सवाल का जवाब फिलहाल साफ नहीं है, लेकिन इतना तय है कि जेएनयू में हुई इस नारेबाजी ने देशभर में एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
अब सबकी नजरें पुलिस जांच और विश्वविद्यालय प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हैं। यह देखना अहम होगा कि आने वाले दिनों में इस मामले में कोई कानूनी कार्रवाई होती है या नहीं, और क्या कैंपस का माहौल सामान्य हो पाता है। फिलहाल, जमानत खारिज होने के बाद शुरू हुआ यह विरोध प्रदर्शन जेएनयू को एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ले आया है।
