भारत, एक ऐसा देश जो अपनी सांस्कृतिक विरासत, विविधता और प्रगति के लिए दुनिया भर में जाना जाता है, आज कुछ अंतरराष्ट्रीय संगठनों के निशाने पर है। इनमें से एक है ह्यूमन राइट्स वॉच (एचआरडब्ल्यू), जो मानवाधिकारों की रक्षा के नाम पर भारत के खिलाफ एक सुनियोजित एजेंडा चलाने का आरोप झेल रहा है। यह संगठन, जो अमेरिका से संचालित होता है, अक्सर भारत की नीतियों और कार्रवाइयों पर सवाल उठाता है, लेकिन उसकी अपनी कार्यशैली और मंशा पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। क्या वाकई ह्यूमन राइट्स वॉच मानवाधिकारों का सच्चा पैरोकार है, या इसका उद्देश्य भारत की छवि को वैश्विक मंच पर धूमिल करना है? आइए, गूगल न्यूज और उपलब्ध जानकारी के आधार पर इस संगठन की गतिविधियों का गहरा विश्लेषण करें और सच्चाई को सामने लाएं।
ह्यूमन राइट्स वॉच की स्थापना 1978 में हेलसिंकी वॉच के रूप में हुई थी, जिसका मकसद सोवियत संघ के मानवाधिकार उल्लंघनों पर नजर रखना था। 1988 में यह संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच के रूप में विस्तारित हुआ और आज यह 100 से ज्यादा देशों में मानवाधिकारों पर शोध और वकालत का दावा करता है। लेकिन भारत के संदर्भ में इसकी रिपोर्ट्स और बयान अक्सर एकतरफा और पक्षपातपूर्ण नजर आते हैं। उदाहरण के लिए, ह्यूमन राइट्स वॉच ने भारत में अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ की जा रही कार्रवाई पर तीखी आलोचना की है। संगठन का कहना है कि इन घुसपैठियों को निकालने की प्रक्रिया में उचित प्रक्रिया का पालन नहीं हो रहा और मजहब के आधार पर भेदभाव किया जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या ह्यूमन राइट्स वॉच ने कभी यह पूछा कि ये घुसपैठिए किस “उचित प्रक्रिया” के तहत भारत में अवैध रूप से दाखिल हुए थे?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत में करीब 2 करोड़ से ज्यादा अवैध बांग्लादेशी घुसपैठिए मौजूद हैं। ये घुसपैठिए न केवल देश की सुरक्षा के लिए खतरा हैं, बल्कि देश के संसाधनों पर भी भारी बोझ डाल रहे हैं। इससे आम भारतीयों को मिलने वाली सुविधाएं, जैसे राशन, स्वास्थ्य सेवाएं और रोजगार के अवसर, प्रभावित हो रहे हैं। लेकिन ह्यूमन राइट्स वॉच को भारत की इन चिंताओं से कोई सरोकार नहीं है। इसके बजाय, यह संगठन भारत की कार्रवाइयों को मानवाधिकारों का उल्लंघन बताने में जुट जाता है। यह दोहरा मापदंड भारत के खिलाफ इसके एजेंडे को उजागर करता है।
ह्यूमन राइट्स वॉच की फंडिंग भी इसके भारत विरोधी रवैये को समझने में अहम भूमिका निभाती है। जॉर्ज सोरोस, जो अपने ओपन सोसाइटी फाउंडेशंस के जरिए इस संगठन को आर्थिक मदद देते हैं, लंबे समय से भारत के खिलाफ विवादास्पद गतिविधियों से जुड़े रहे हैं। सोरोस का नाम उन लोगों में शुमार है, जो भारत की प्रगति और स्वतंत्र नीतियों को पसंद नहीं करते। उनकी फंडिंग से संचालित ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट्स में भारत की नीतियों, खासकर अल्पसंख्यकों और नागरिक समाज के खिलाफ कथित भेदभाव पर जोर दिया जाता है। उदाहरण के लिए, 2025 की इसकी एक रिपोर्ट में कहा गया कि भारत सरकार ने नागरिक समाज और मीडिया पर दमनकारी कार्रवाइयां तेज कर दी हैं, और इंटरनेट शटडाउन, कार्यकर्ताओं और पत्रकारों पर झूठे आतंकवाद के आरोप, और अल्पसंख्यकों के खिलाफ भेदभाव को बढ़ावा दिया है।
लेकिन इस संगठन की सलेक्टिव सोच तब सामने आती है, जब बात आतंकवाद और सुरक्षा बलों पर हमलों की आती है। ह्यूमन राइट्स वॉच ने 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए आतंकी हमले की निंदा में कोई बयान जारी नहीं किया। 2016 के उरी हमले और 2019 के पुलवामा हमले, जिनमें भारत ने अपने कई वीर जवानों को खोया, पर भी इस संगठन ने खुलकर निंदा नहीं की। इसके विपरीत, जब सुरक्षाबल पत्थरबाजों या आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई करते हैं, तो ह्यूमन राइट्स वॉच तुरंत मानवाधिकार उल्लंघन की बात उठाने लगता है। यह दोहरा रवैया साफ दिखाता है कि संगठन का मकसद भारत की छवि को वैश्विक मंच पर कमजोर करना है।
ह्यूमन राइट्स वॉच की आलोचना सिर्फ घुसपैठियों के मुद्दे तक सीमित नहीं है। यह संगठन भारत में नागरिक समाज, पत्रकारों और कार्यकर्ताओं के खिलाफ कथित दमन पर भी लगातार सवाल उठाता रहा है। 2021 में इसने दावा किया कि भारत सरकार ने कर चोरी और वित्तीय अनियमितताओं के बहाने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और सरकार के आलोचकों को निशाना बनाया। 2023 में भी इसने कहा कि भारत में कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को आतंकवाद के झूठे आरोपों में गिरफ्तार किया जा रहा है। लेकिन इन दावों में कितनी सच्चाई है? भारत का संविधान दुनिया के सबसे प्रगतिशील संविधानों में से एक है, जो धर्म, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, और स्वतंत्र न्यायपालिका जैसे मौलिक अधिकारों की गारंटी देता है। इसके बावजूद, ह्यूमन राइट्स वॉच भारत को बार-बार निशाना बनाता है, जबकि आतंकवाद और हिंसा के मुद्दों पर उसकी चुप्पी रहस्यमयी है।
यहां यह समझना जरूरी है कि ह्यूमन राइट्स वॉच जैसे संगठन वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती ताकत और प्रभाव से असहज हैं। भारत, जो आज आर्थिक और सामरिक दृष्टि से दुनिया का एक प्रमुख देश बन चुका है, अपनी नीतियों और हितों को लेकर किसी बाहरी दबाव में नहीं झुकता। यही बात कुछ ताकतों को खटकती है। ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट्स में अक्सर भारत की नीतियों को अल्पसंख्यक विरोधी और दमनकारी बताया जाता है, लेकिन ये दावे एकतरफा होते हैं और भारत की जटिल सामाजिक-राजनीतिक स्थिति को नजरअंदाज करते हैं। उदाहरण के लिए, जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई को यह संगठन मानवाधिकार उल्लंघन के रूप में पेश करता है, लेकिन आतंकियों द्वारा आम नागरिकों और सुरक्षाबलों पर हमलों पर यह चुप रहता है।
भारत के खिलाफ इस संगठन की साजिश को समझने के लिए हमें इसके वैश्विक एजेंडे को भी देखना होगा। ह्यूमन राइट्स वॉच उन मुद्दों को चुनता है, जिनसे भारत की छवि को नुकसान पहुंचाया जा सके। चाहे वह कश्मीर का मुद्दा हो, नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) हो, या फिर अवैध घुसपैठ के खिलाफ कार्रवाई, इस संगठन की नजर में भारत हमेशा गलत होता है। लेकिन सच्चाई यह है कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहां कानून का शासन है और सरकार अपनी जनता की सुरक्षा और हितों को सर्वोपरि मानती है। ह्यूमन राइट्स वॉच जैसे संगठनों को यह समझना होगा कि भारत अपनी संप्रभुता और सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा।
हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि भारत में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) जैसे स्वतंत्र निकाय मौजूद हैं, जो मानवाधिकारों की रक्षा के लिए काम करते हैं। एनएचआरसी ने समय-समय पर मानवाधिकारों से जुड़े मामलों में सक्रियता दिखाई है, जैसे कि भुवनेश्वर में कैंप सिटिंग और डेहरादून में प्रशिक्षण कार्यक्रम। लेकिन ह्यूमन राइट्स वॉच जैसे संगठन इन प्रयासों को नजरअंदाज करते हैं और भारत को बदनाम करने में जुटे रहते हैं।
अंत में, यह कहना गलत नहीं होगा कि ह्यूमन राइट्स वॉच जैसे संगठन मानवाधिकारों के नाम पर भारत के खिलाफ एक सुनियोजित एजेंडा चला रहे हैं। इनका मकसद भारत की प्रगति और वैश्विक मंच पर उसकी बढ़ती साख को कमजोर करना है। लेकिन भारत के लोग अब इनके बहकावे में आने वाले नहीं हैं। हमारा देश अपनी एकता, संप्रभुता और प्रगति के रास्ते पर मजबूती से आगे बढ़ रहा है। ह्यूमन राइट्स वॉच जैसे संगठनों को यह समझना होगा कि भारत न तो उनके दबाव में झुकेगा, न ही अपनी नीतियों को उनके इशारे पर बदलेगा। भारत अपनी सुरक्षा, अपने हितों और अपने नागरिकों की भलाई के लिए हर जरूरी कदम उठाता रहेगा, और इस रास्ते पर कोई भी संगठन उसे रोक नहीं सकता।
