2012 में स्वामी की शिकायत पर दिल्ली की मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट ने 2014 में ईओडब्ल्यू (इकोनॉमिक ऑफेंस विंग) को केस सौंपा। ईओडब्ल्यू ने 2015 में सोनिया, राहुल, सैम पितरोदा समेत कई पर धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश के आरोप में चार्जशीट दाखिल की। गांधी परिवार ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताया, दावा किया कि कर्ज से एजेएल को उबारने का प्रयास था, न कि संपत्ति हड़पने का। मामला हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जहां 2018-19 में यंग इंडियन को एजेएल शेयर वापस करने का आदेश मिला, लेकिन अपीलें लंबी चलीं। इसी बीच 2018 में ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग का कोण जोड़ दिया कि 700 करोड़ से अधिक की संपत्तियां अपराध की आय हैं। ईडी ने सोनिया-राहुल से कई बार पूछताछ की, रॉबर्ट वाड्रा का नाम भी आया।
2024-25 में केस ने नया मोड़ लिया। नवंबर 2025 में दिल्ली पुलिस की ईओडब्ल्यू ने नई एफआईआर दर्ज की, जिसमें गांधी परिवार पर सार्वजनिक संपत्तियों को व्यक्तिगत लाभ के लिए हड़पने का आरोप लगाया। ईडी ने इसी आधार पर दिसंबर में मनी लॉन्ड्रिंग की चार्जशीट दाखिल की। सुनवाई 16 दिसंबर को हुई, जहां जज विशाल गोगने ने ईडी की शिकायत खारिज करते हुए कहा कि निजी शिकायत पर मनी लॉन्ड्रिंग की कार्रवाई नहीं चलाई जा सकती। कोर्ट ने ईओडब्ल्यू की शिकायत से जुड़े रिवीजन पर भी फैसला सुनाया, जिसमें एफआईआर कॉपी देने से इनकार किया। गांधी पक्ष ने दलील दी कि कोई संपत्ति का उपयोग या प्रदर्शन नहीं हुआ, सिर्फ कर्ज चुकाया गया।
यह राहत अस्थायी लगती है, क्योंकि ईडी अपील कर सकती है। कांग्रेस ने इसे राजनीतिक साजिश का अंत बताया, जबकि भाजपा ने प्रक्रिया जारी कहा। केस ने 13 साल में गांधी परिवार की छवि को नुकसान पहुंचाया, लेकिन आज का फैसला उनके लिए कानूनी जीत है। मूल मुकदमे में ईओडब्ल्यू की चार्जशीट पर सुनवाई बरकरार है। कुल मिलाकर, नेशनल हेराल्ड का यह सफर नेहरू युग की विरासत से लेकर आज की राजनीतिक जंग तक फैला है, जहां संपत्ति, कर्ज और सत्ता का टकराव केंद्र में रहा।
