सोशल मीडिया से लेकर मतपेटी तक, जेन-ज़ी बनेगी बिहार की असली ताकत

बिहार की धरती पर चुनाव का बिगुल बज चुका है। 6 नवंबर को पहले चरण में 121 सीटों पर और 11 नवंबर को दूसरे चरण में 122 सीटों पर वोटिंग होगी। 14 नवंबर को नतीजे आएंगे, जो बताएंगे कि राज्य की सत्ता का रंग कौन सा होगा। लेकिन इस बार का चुनाव पहले से अलग है। यहां सियासत की कमान युवा हाथों में है। खासकर Gen-Z, यानी 1997 से 2012 के बीच पैदा हुए वो नौजवान, जो इंटरनेट की दुनिया में बड़े हुए हैं। इनकी संख्या इतनी है कि ये किसी भी गठबंधन की जीत-हार का फैसला कर सकते हैं। बिहार में कुल 7.43 करोड़ मतदाता हैं, जिनमें 3.92 करोड़ पुरुष, 3.50 करोड़ महिलाएं और 1725 ट्रांसजेंडर शामिल हैं। लेकिन असली खेल Gen-Z के 1.75 करोड़ वोटर्स का है, जो कुल मतदाताओं का 24 फीसदी हैं। इनमें से 14 लाख पहली बार वोट डालेंगे। राज्य की 58 फीसदी आबादी 25 साल से कम उम्र की है और बिहार देश में सबसे ज्यादा युवाओं वाला राज्य है। ऐसे में सभी पार्टियां इन युवाओं को लुभाने में लगी हैं। रोजगार, शिक्षा, पलायन जैसे मुद्दों पर बड़े-बड़े वादे हो रहे हैं। सवाल ये है कि क्या ये नौजवान पुरानी राजनीति को ठुकरा देंगे या फिर विकास के सपनों पर भरोसा करेंगे?

Gen-Z को समझना आसान नहीं। ये वो पीढ़ी है जो जन्म से ही स्मार्टफोन और सोशल मीडिया की छाया में पली-बढ़ी। मोबाइल पर गेम खेलते हुए, यूट्यूब पर दुनिया घूमते हुए और इंस्टाग्राम पर ट्रेंड्स फॉलो करते हुए इनका बचपन बीता। ये युवा पुरानी कहानियों से ऊब चुके हैं। जब नीतीश कुमार मंच पर कहते हैं कि 20 साल पहले बिहार जंगल राज में डूबा था, तो ये सुनकर सोचते हैं ‘अंकल, हमें तो वो याद भी नहीं। हम तो सिर्फ आपका ही राज देख रहे हैं।’ 2020 के चुनाव में लोकनीति-सीएसडीएस के सर्वे के मुताबिक, 21 फीसदी मतदाताओं ने बेरोजगारी और नौकरियों की कमी को सबसे बड़ा मुद्दा बताया था। इस बार ये आंकड़ा और बढ़ सकता है। Gen-Z के पास सवालों की लंबी लाइन है नौकरी क्यों नहीं मिल रही? पलायन क्यों रोक नहीं पा रहे? शिक्षा व्यवस्था क्यों लचर है? ये युवा जाति-धर्म से ऊपर उठकर मुद्दों पर वोट देते हैं। सोशल मीडिया पर #BiharYouthUnemployment जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं, जहां हजारों युवा अपनी कहानियां शेयर कर रहे हैं। एक युवा पटना से लिखता है ‘पढ़ाई पूरी की, लेकिन दिल्ली-मुंबई भागना पड़ रहा। बिहार में सपना क्यों नहीं?’ ये आवाजें सियासत की नींद उड़ा रही हैं।

बिहार के गांव-शहरों में घूमिए तो Gen-Z की ताकत साफ दिखती है। नवादा जिले में मतदाता सूची के पुनरीक्षण के बाद 30 हजार से ज्यादा नए वोटर जुड़े, जिनमें ज्यादातर युवा हैं। यहां की सड़कों पर युवा चाय की दुकानों पर बहस करते हैं मोदी जी का डिजिटल इंडिया अच्छा है, लेकिन लोकल जॉब्स कहां? तेजस्वी का वादा सुनकर उत्साहित होते हैं, लेकिन पीके की साफ राजनीति पर भरोसा नहीं कर पाते। दरभंगा में फर्स्ट टाइम वोटर्स की संख्या 20 हजार से ज्यादा है। यहां के कॉलेज स्टूडेंट्स कहते हैं ‘हम तकनीक से जुड़े हैं। पार्टियां हमें वाई-फाई और स्टार्टअप्स का वादा करें, तो वोट मिलेगा।’ कटिहार जिले की सात विधानसभा सीटों पर 20 लाख से ज्यादा मतदाता हैं, जिनमें युवाओं का बोलबाला है। ग्रामीण इलाकों में खेतों से लौटे युवा पलायन की मार झेल चुके हैं। महिलाओं में भी युवा वोटर्स बढ़ रहे हैं। 2020 से महिलाओं का वोटिंग प्रतिशत पुरुषों से ज्यादा है। इस बार 18-25 साल की एक लाख से ज्यादा युवा लड़कियां पहली बार वोट देंगी। ये ट्रेंड दिखाता है कि Gen-Z न सिर्फ संख्या में मजबूत है, बल्कि विचारों में भी।

अब बात करते हैं पार्टियों की। सबसे पहले एनडीए। नीतीश कुमार की सरकार ने बेरोजगारी रोकने के लिए कई स्कीम्स चलाई हैं। चुनाव से ठीक पहले 1000 रुपये मासिक भत्ता देने का ऐलान किया, जो स्नातक और 12वीं पास बेरोजगार युवाओं को दो साल तक मिलेगा। साथ ही एक करोड़ नौकरियां देने का वादा। पीएम मोदी की छवि युवाओं को भाती है। उनकी ‘मुद्रा योजना’ से लाखों युवा उद्यमी बने। डिजिटल इंडिया ने बैंक खातों में सीधे पैसे पहुंचाए। चिराग पासवान ‘बिहार फर्स्ट’ का नारा देकर युवाओं को जोड़ रहे हैं। लेकिन सवाल ये कि क्या ये वादे कागजों से आगे बढ़ेंगे? 2020 में भी नौकरियों के वादे हुए थे, लेकिन ग्राउंड पर पलायन रुका नहीं। फिर भी, मोदी का राष्ट्रीय विजन राष्ट्रवाद, हिंदुत्व और विकास Gen-Z को आकर्षित करता है। एक सर्वे में 30 फीसदी युवा कहते हैं कि मोदी जी की मजबूत इमेज पर भरोसा है।

दूसरी तरफ महागठबंधन, जहां तेजस्वी यादव सीएम का चेहरा हैं। तेजस्वी ने अपना लुक ही चेंज कर लिया। कुर्ता-पायजामा की जगह टी-शर्ट में नजर आते हैं, जो युवाओं को करीब लगता है। उनका सबसे बड़ा वादा हर परिवार को एक सरकारी नौकरी। 2020 में 10 लाख नौकरियों का वादा किया था, जिसने युवाओं को खींचा। अब हर जिले में मेडिकल, इंजीनियरिंग, पैरामेडिकल और पॉलिटेक्निक कॉलेज खोलने का ऐलान। पलायन रोकने के लिए कांग्रेस ने बिहार यात्रा निकाली। तेजस्वी कहते हैं ‘युवाओं का भविष्य हमारा एजेंडा है।’ लेकिन विपक्ष याद दिलाता है कि लालू राज में जंगल राज था। Gen-Z को ये पुरानी बातें बोरिंग लगती हैं। वे पूछते हैं ‘अभी क्या हो रहा है?’ तेजस्वी की युवा केंद्रित राजनीति Gen-Z को पसंद है, खासकर जो बेरोजगारी से त्रस्त हैं। न्यूज18 की एक रिपोर्ट में कहा गया कि 14 लाख फर्स्ट टाइम वोटर्स तेजस्वी के वादों से प्रभावित हैं।

फिर आते हैं जन सुराज के प्रशांत किशोर। चुनावी रणनीतिकार से सियासत में उतरे पीके बिहार को नई दिशा देना चाहते हैं। उनकी पार्टी एनडीए और महागठबंधन का विकल्प है। भ्रष्टाचार, लचर शिक्षा, नौकरी की कमी पर नीतीश को घेरते हैं। 10 अक्टूबर को 51 सीटों पर पहली उम्मीदवार लिस्ट जारी की, जिसमें 40 फीसदी महिलाएं हैं। सभी 243 सीटों पर लड़ेंगे। पीके कहते हैं ‘बदलाव का समय आ गया।’ युवाओं में नई उम्मीद जगाते हैं, लेकिन चुनौती बड़ी है। न तो संगठन मजबूत, न सियासी समीकरण फिट। फिर भी, आउटलुक इंडिया की रिपोर्ट में कहा गया कि Gen-Z की फ्रस्ट्रेशन से पीके को फायदा हो सकता है। एक युवा पूछता है ‘पीके भाई, आपका विजन अच्छा है, लेकिन ग्राउंड पर कैसे लागू होगा?’

इस चुनाव में छोटी पार्टियां भी खेल बिगाड़ सकती हैं। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी मुस्लिम वोट बांट सकती है। लेकिन असली निर्णायक Gen-Z ही है। जागरण की रिपोर्ट में दरभंगा के युवा कहते हैं‘हम मुद्दों पर वोट देंगे, न कि जाति पर।’ हिंदुस्तान के अनुसार कटिहार में युवा महिलाओं की भागीदारी बराबर है। एनडीटीवी की वोटर लिस्ट से साफ है कि 14 लाख युवा जुड़े, लेकिन 48 लाख नाम कटे ये बदलाव की निशानी है।अंत में, बिहार का भविष्य Gen-Z के हाथों में है। ये युवा पुरानी स्टाइल छोड़कर नई राजनीति ला सकते हैं। रोजगार अगर मिला तो विकास होगा, वरना पलायन जारी रहेगा। पार्टियां वादे कर रही हैं, लेकिन अमल पर नजर रखनी होगी। बिहार के नौजवान, तुम्हारा पहला वोट इतिहास रचेगा। क्या चुनोगे स्थिरता, बदलाव या नया सपना? वक्त बताएगा, लेकिन एक बात पक्की ये तूफान सत्ता की दिशा जरूर बदलेगा।

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