फ्रांस की राजधानी पेरिस और कई बड़े शहरों में बीते कुछ दिनों से सत्ता विरोधी प्रदर्शनों ने जोर पकड़ लिया है। हजारों नागरिक महंगाई, बेरोजगारी, और सरकार पर ‘जनता से दूरी’ का आरोप लगाते हुए सड़कों पर उतर आए हैं। प्रदर्शनकारियों के हाथों में बैनर और पोस्टर हैं जिन पर सरकार विरोधी नारे लिखे हैं। “हमारे अधिकार लौटाओ”, “अब और नहीं”, और “सत्ता जनता की है”—जैसे संदेश सड़क पर गूंज रहे हैं। कई महीनों से फ्रांस में समाज के भीतर simmering unrest जारी था, लेकिन अब वह उबल पड़ने की स्थिति में पहुंच चुका है। युवाओं और नौकरीपेशा तबके की सबसे बड़ी शिकायत लगातार बढ़ती महंगाई और अवसरों की कमी है। दूसरी ओर, मजदूर वर्ग पेंशन और सामाजिक सुरक्षा में कटौती के प्रस्तावों को सत्ता की बेरुखी मानकर विरोध कर रहा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि फ्रांस में उठे यह आंदोलन किसी एक देश की अलग-थलग घटना नहीं, बल्कि एक वैश्विक प्रवृत्ति का हिस्सा हैं। एशिया से अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल तक पहले ही जनता का असंतोष सड़कों पर दिख चुका है। अफगानिस्तान में सत्ता परिवर्तन के बाद वहां आम लोगों पर बढ़ते सामाजिक-आर्थिक दबाव ने जनता को बेचैन किया। पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता और रोज़मर्रा की ज़रूरतों को पूरा न कर पाने की समस्या ने सड़कों पर आक्राशित नागरिक उतारे। बांग्लादेश और श्रीलंका में गहराते आर्थिक संकट और महंगाई ने दोनों देशों में जनता को विद्रोह के मुहाने पर ला खड़ा किया। नेपाल में लगातार राजनीतिक खींचतान ने आम लोगों की उम्मीदें तोड़ीं और वक्त-वक्त पर राजधानी से लेकर गांवों तक विरोध प्रदर्शन भड़के।
यही श्रंखला अब यूरोप तक फैल चुकी है। ऐसा लगता है कि चाहे एशियाई राष्ट्र हों या यूरोप का विकसित लोकतंत्र, सत्ता और जनता के बीच जब खाई गहरी होती है तो प्रतिक्रिया का तरीका लगभग एक जैसा होता है—सड़क ही न्याय का सबसे बड़ा मंच बन जाती है। फ्रांस में प्रदर्शन शांतिपूर्ण शुरू हुए लेकिन कई जगह हालात बेकाबू भी हुए। पुलिस ने पानी की बौछार और आंसू गैस से भीड़ को काबू करने की कोशिश की, जबकि कई जगह प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच टकराव की तस्वीरें आईं। पेरिस में कई अहम इलाकों में बैरिकेड्स लगाए गए हैं और अतिरिक्त बल तैनात किए गए हैं। फिर भी भीड़ का आकार और उसकी ऊर्जा यह बता दे रही है कि जनता की आवाज़ को केवल बल प्रयोग करके दबाना आसान नहीं।
फ्रांस में असंतोष की जड़ें गहरी हैं। लगातार महंगाई ने आम नागरिक का बजट बिगाड़ रखा है। युवा बेरोजगारी अभी भी यूरोप की बड़ी चुनौती है और फ्रांस इसमें अछूता नहीं। सरकार की नीतियों पर पारदर्शिता की कमी और जनता से संवाद टूटता सा लग रहा है। सामाजिक असमानताएं और पेंशन सुधार जैसे फैसलों ने आम लोगों का विश्वास और घटाया है। इन वजहों से जनता सिर्फ नाराज नहीं, बल्कि यह मानने लगी है कि उसकी आवाज़ को अनसुना किया जा रहा है। यही भावना आंदोलन की आग को और भड़का रही है। दुनिया के राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि फ्रांस का यह आंदोलन “वैश्विक प्रदर्शन-लहर” का हिस्सा है। राजनीतिक व्यवस्था से असंतोष, आर्थिक दबाव और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की मांग—ये तीन पहलू अब हर देश में आंदोलनों को आकार दे रहे हैं। आज का नागरिक पहले से अधिक जागरूक है। डिजिटल माध्यम और सोशल मीडिया ने उसकी चेतना को और तेज किया है। अब जनता न सिर्फ स्थानीय सरकार के खिलाफ बल्कि वैश्विक स्तर पर भी दूसरों के अनुभवों से सीखकर खुद को संगठित कर रही है। यही वजह है कि पेरिस का प्रदर्शन सिर्फ फ्रांस की बात नहीं रह जाता, बल्कि यह कोलंबो, काठमांडू या इस्लामाबाद की गूंज से जुड़ जाता है।
फ्रांस में यह आंदोलन बताते हैं कि जब जनता सड़क पर उतर आती है तो सत्ता की मजबूती का असली इमतेहान शुरू होता है। ऐसे मौकों पर न सिर्फ सत्ता की नीति बल्कि उसकी लोकतांत्रिक समझ भी परखी जाती है। सरकार को अब यह चुनौती है कि वह इस गुस्से को केवल कानून-व्यवस्था का मामला न माने, बल्कि जनता के प्रति संवाद और सुधार की राह खोले। अन्यथा हालात और बिगड़ सकते हैं और यह लहर पूरे यूरोप तक फैल सकती है। फ्रांस की सड़कों पर उभरती यह आवाज़ साबित करती है कि जनता का धैर्य सीमित है। जब सत्ता उसकी उम्मीदों का जवाब नहीं देती, तो वह सड़कों पर उतरकर जवाब देने पर मजबूर होती है। चाहे एशिया का संकटग्रस्त देश हो या यूरोप का लोकतांत्रिक और विकसित राष्ट्र—लोगों का हौसला और अधिकारों की रक्षा की चेतना अब वैश्विक रूप ले चुकी है।
