अब डीएमके ने सीट बंटवारे पर कांग्रेस को दिखाया आईना

तमिलनाडु की राजनीति को अगर सिर्फ चुनावी नतीजों से समझा जाए तो यह एक अधूरी तस्वीर होगी. यहां सत्ता का संघर्ष विचारधारा, भाषा, केंद्र-राज्य संबंध और ऐतिहासिक स्मृतियों से संचालित होता है. 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस और डीएमके के बीच उभरता टकराव इसी गहरी राजनीति का परिणाम है. कांग्रेस की मांग सिर्फ ज्यादा सीटों की नहीं, बल्कि सत्ता में हिस्सेदारी की है. यह मांग अचानक पैदा नहीं हुई, बल्कि इसके पीछे छह दशकों की राजनीतिक उपेक्षा, संगठनात्मक क्षरण और बदलते राष्ट्रीय हालात हैं.आज़ादी के बाद तमिलनाडु कांग्रेस का मजबूत गढ़ था. 1952, 1957 और 1962 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने सत्ता बनाई. कामराज नाडार जैसे नेता न सिर्फ राज्य, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के भी केंद्र में थे. 1963 में कामराज योजना के तहत मुख्यमंत्री पद छोड़कर दिल्ली जाना कांग्रेस की रणनीतिक भूल साबित हुई. इसके बाद पार्टी का जमीनी संगठन कमजोर पड़ने लगा. 1965 का हिंदी विरोधी आंदोलन इस कमजोर होती पकड़ पर अंतिम प्रहार था. भाषा का सवाल सिर्फ संवाद का नहीं, बल्कि सांस्कृतिक प्रभुत्व का प्रतीक बन गया.

1967 का विधानसभा चुनाव तमिलनाडु की राजनीति में निर्णायक मोड़ था. डीएमके ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया. कांग्रेस की सीटें 234 सदस्यीय विधानसभा में सिमटकर 50 के आसपास रह गईं. यह हार सिर्फ एक सरकार की हार नहीं थी, बल्कि कांग्रेस के राजनीतिक प्रभुत्व का अंत था. इसके बाद पिछले 57 वर्षों में कांग्रेस कभी राज्य की सत्ता में नहीं लौट सकी. यह आंकड़ा अपने आप में द्रविड़ राजनीति की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जाता है.इसके बाद कांग्रेस और द्रविड़ दलों का रिश्ता विरोध से मजबूरी तक पहुंचा. 1971 में इंदिरा गांधी और करुणानिधि के बीच सहयोग हुआ, लेकिन यह बराबरी का रिश्ता नहीं था. 1976 में आपातकाल के दौरान करुणानिधि सरकार की बर्खास्तगी ने डीएमके को यह सिखा दिया कि दिल्ली की सत्ता कितनी कठोर हो सकती है. इसी अनुभव ने द्रविड़ दलों को एक स्पष्ट रणनीति की ओर मोड़ा केंद्र में राष्ट्रीय दलों से गठबंधन, लेकिन राज्य की सत्ता पूरी तरह अपने नियंत्रण में.

यह रणनीति आंकड़ों में साफ दिखती है. 1991 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस एआईएडीएमके के साथ गठबंधन में थी. कांग्रेस ने 65 में से 60 सीटें जीतीं, यानी जीत का प्रतिशत 92 से ज्यादा रहा. इसके बावजूद मंत्रिमंडल में कांग्रेस को एक भी पद नहीं मिला. यही स्थिति डीएमके के साथ गठबंधन में भी बनी रही. 2006 में कांग्रेस को 48 सीटें मिलीं, 2011 में 63 सीटें दी गईं, लेकिन सत्ता में हिस्सेदारी शून्य रही.2021 का चुनाव कांग्रेस के लिए निर्णायक साबित हुआ. पार्टी को 25 सीटें दी गईं और उसने 18 सीटें जीत लीं. यह 72 प्रतिशत की जीत दर थी, जो किसी भी सहयोगी दल के लिए असाधारण मानी जाती है. इसके बावजूद स्टालिन सरकार के मंत्रिमंडल में कांग्रेस का नाम नहीं आया. इसी बिंदु पर कांग्रेस के भीतर यह भावना मजबूत हुई कि पार्टी को सिर्फ वोट ट्रांसफर के साधन के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है.

तमिलनाडु में कांग्रेस का वोट बैंक छोटा लेकिन रणनीतिक है. विभिन्न चुनावी अध्ययनों के मुताबिक कांग्रेस के पास 8 से 10 प्रतिशत तक का स्थायी वोट आधार है. इसमें अल्पसंख्यक समुदाय का बड़ा हिस्सा, शहरी मध्यम वर्ग और पारंपरिक कांग्रेस समर्थक शामिल हैं. डीएमके इस वोट को अपने साथ जोड़कर भाजपा विरोधी ध्रुवीकरण को मजबूत करती है. 2019 के लोकसभा चुनाव में डीएमके-कांग्रेस गठबंधन ने 39 में से 38 सीटें जीतीं, जिनमें कांग्रेस को 9 सीटें मिलीं. 2024 में भी कांग्रेस की सभी प्रमुख जीतें गठबंधन की बदौलत ही आईं.लेकिन विधानसभा स्तर पर तस्वीर अलग है. कांग्रेस के कार्यकर्ता पिछले छह दशकों से सत्ता से बाहर हैं. संगठनात्मक अध्ययनों के मुताबिक सत्ता में भागीदारी न होने से पार्टी का कैडर कमजोर पड़ा है. स्थानीय नेतृत्व उभर नहीं पा रहा और पार्टी की पहचान धीरे-धीरे गठबंधन तक सीमित होती जा रही है. यही वजह है कि 2026 से पहले कांग्रेस ने स्पष्ट कर दिया है कि वह केवल समर्थन की भूमिका में नहीं रहेगी.

सीटों के आंकड़े इस बार ज्यादा आक्रामक मांग दिखाते हैं. कांग्रेस 38 से 40 सीटों की मांग कर रही है, जबकि डीएमके 30 से 32 सीटों के दायरे में बात करना चाहती है. यह अंतर केवल 6-8 सीटों का नहीं, बल्कि राजनीतिक हैसियत का सवाल है. कांग्रेस का तर्क है कि 2021 में सीमित सीटों पर बेहतर प्रदर्शन उसके संगठनात्मक पुनरुत्थान का संकेत है.कांग्रेस ने इस बहस में राज्य की वित्तीय स्थिति को भी सामने रखा है. भारतीय रिजर्व बैंक और राज्य बजट के आंकड़ों के अनुसार तमिलनाडु पर कुल सार्वजनिक कर्ज 8 लाख करोड़ रुपये के आसपास पहुंच चुका है. यह राज्य के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 27 प्रतिशत है. वित्तीय घाटा लगातार 3 प्रतिशत की सीमा के आसपास बना हुआ है. कांग्रेस नेताओं का कहना है कि अगर पार्टी सरकार को समर्थन दे रही है, तो इन आर्थिक फैसलों की जिम्मेदारी में भी उसकी भागीदारी होनी चाहिए.

डीएमके के लिए यह मांग वैचारिक चुनौती है. द्रविड़ राजनीति की आत्मा ही यह रही है कि राज्य की सत्ता पर तमिल नेतृत्व का पूर्ण नियंत्रण हो. पार्टी को डर है कि कांग्रेस को सत्ता में शामिल करने से यह संदेश जाएगा कि राष्ट्रीय दलों के लिए दरवाजा फिर से खुल गया है. यही वजह है कि एआईएडीएमके भी भाजपा के साथ गठबंधन के बावजूद यह साफ कहती है कि जीत की स्थिति में भाजपा सरकार में शामिल नहीं होगी.कांग्रेस की मजबूरी भी उतनी ही गहरी है. भाजपा के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत मोर्चा बनाने के लिए उसे डीएमके जैसे क्षेत्रीय दलों की जरूरत है. तमिलनाडु में अकेले चुनाव लड़कर कांग्रेस के लिए 10 प्रतिशत से ऊपर वोट हासिल करना फिलहाल मुश्किल दिखता है. इसलिए यह रिश्ता टूट नहीं सकता, लेकिन मौजूदा स्वरूप में चलना भी कठिन हो गया है.

2026 का चुनाव इसलिए ऐतिहासिक होगा क्योंकि यह तय करेगा कि क्या द्रविड़ राजनीति अपनी 1967 से चली आ रही लक्ष्मण रेखा में बदलाव करेगी. अगर डीएमके कांग्रेस को सत्ता में हिस्सेदारी देती है, तो यह तमिलनाडु की राजनीति में सबसे बड़ा बदलाव होगा. और अगर कांग्रेस एक बार फिर बिना हिस्सेदारी के समझौता करती है, तो यह साफ हो जाएगा कि राज्य की राजनीति में राष्ट्रीय दलों की भूमिका अब भी सीमित ही रहेगी.तमिलनाडु की राजनीति में सत्ता से ज्यादा महत्वपूर्ण अस्मिता रही है. कांग्रेस की मौजूदा मांग उसी अस्मिता को चुनौती दे रही है. अब देखना यह है कि 2026 का जनादेश इतिहास को बदलता है या इतिहास एक बार फिर खुद को दोहराता है.

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