लखनऊ : उत्तर प्रदेश की राजनीति एक बार फिर बसपा के इर्द-गिर्द घूमती दिख रही है। चार साल बाद पार्टी सुप्रीमो मायावती 9 अक्टूबर को लखनऊ के कांशीराम स्मारक स्थल पर एक बड़ी रैली करने जा रही हैं। यह रैली उनके संस्थापक कांशीराम की पुण्यतिथि पर आयोजित की जा रही है, लेकिन महज़ श्रद्धांजलि भर नहीं है। दरअसल, बसपा इस आयोजन को अपनी राजनीतिक ज़मीन वापस हासिल करने का सबसे बड़ा मंच मान रही है। यही कारण है कि जैसे-जैसे तारीख नजदीक आ रही है, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों की चिंता बढ़ती जा रही है।पार्टी की तैयारी को देखकर साफ लग रहा है कि बसपा इसे किसी साधारण रैली की तरह नहीं देख रही। अमर उजाला की रिपोर्ट के मुताबिक, पार्टी का लक्ष्य दस लाख से अधिक लोगों की भीड़ जुटाने का है। इसके लिए कार्यकर्ता गाँव-गाँव घूमकर लोगों को आमंत्रित कर रहे हैं। जगह-जगह बैठकों का दौर चल रहा है, पर्चे बांटे जा रहे हैं और सोशल मीडिया पर #9अक्टूबरचलोलखनऊ ट्रेंड कराया जा रहा है।
मेरठ, हाथरस, सहारनपुर, सिद्धार्थनगर और अंबेडकरनगर जैसे जिलों से लगातार खबरें आ रही हैं कि कार्यकर्ता बैठकें कर रहे हैं और भीड़ जुटाने के लिए रणनीति बना रहे हैं। हाथरस में बहरदोई इलाके में बसपा नेताओं ने बैठक कर लोगों से लखनऊ पहुँचने की अपील की। मेरठ में कार्यकर्ताओं ने गांव-गांव जाकर जनसंपर्क किया और कहा कि यह रैली पार्टी की ताक़त का प्रतीक होगी।सिद्धार्थनगर में इस रैली को “सत्ता परिवर्तन रैली” नाम दिया गया है। स्थानीय नेताओं का कहना है कि प्रदेश की जनता मौजूदा सरकार से त्रस्त है और अब बदलाव चाहती है। वहीं अंबेडकरनगर में प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल ने कहा कि “प्रदेश में जंगलराज कायम है, जनता को राहत दिलाने के लिए बसपा की सरकार जरूरी है। सहारनपुर से भी खास रिपोर्ट आई है कि वहां मुस्लिम-दलित समीकरण पर खास जोर दिया जा रहा है। बसपा की स्थानीय इकाई ने खासतौर से मुस्लिम समुदाय के लोगों से अपील की है कि वे इस रैली में शामिल होकर एकजुटता का संदेश दें। साफ है कि पार्टी अपने पुराने कोर वोट बैंक के साथ-साथ नए वर्गों को भी साधने की पूरी कोशिश कर रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मायावती इस रैली के ज़रिये अपनी पार्टी को 2027 विधानसभा चुनाव के लिए नए सिरे से खड़ा करना चाहती हैं। यही नहीं, यह आयोजन उनके भतीजे आकाश आनंद की दोबारा एंट्री के लिए भी मंच साबित हो सकता है। जगरण की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि पार्टी उन्हें युवाओं का चेहरा बनाकर फिर से लॉन्च करने की योजना बना रही है।पिछले कुछ साल बसपा के लिए बेहद कठिन रहे। 2022 विधानसभा चुनाव में बसपा महज़ एक सीट पर सिमट गई थी और 2024 लोकसभा चुनाव में तो खाता तक नहीं खोल सकी। एक दौर में सत्ता पर काबिज़ रही पार्टी के लिए यह अस्तित्व का संकट है। ऐसे में मायावती इस रैली को एक लिटमस टेस्ट की तरह देख रही हैं।
इस रैली ने समाजवादी पार्टी और कांग्रेस दोनों को असहज कर दिया है। समाजवादी पार्टी को सबसे बड़ा खतरा इस बात का है कि अगर बसपा दलित वोटों को वापस अपने पाले में खींचने में सफल रही तो अखिलेश यादव का PDA (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) फॉर्मूला कमजोर पड़ जाएगा। पश्चिमी यूपी में जहां मुस्लिम-दलित गठजोड़ की अहमियत है, वहां सपा का वोट शेयर प्रभावित हो सकता है।कांग्रेस के लिए भी यह रैली सिरदर्द बन गई है। कांग्रेस लगातार दलित वोटरों को वापस पाने की कोशिश कर रही है, लेकिन बसपा का यह प्रदर्शन उसकी कोशिशों में सेंध लगा सकता है। कांग्रेस के दलित नेता उदित राज ने मायावती पर निशाना साधते हुए कहा था कि “मायावती अंबेडकर का नाम लेती हैं, लेकिन दिल में कमल रखती हैं। यह बयान कांग्रेस की बेचैनी को उजागर करता है।इतना ही नहीं, आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) भी इस दिन अपने कार्यक्रम आयोजित कर रही है। चंद्रशेखर आज़ाद की पार्टी ने कार्यकर्ताओं से कहा है कि वे हर जिले में कांशीराम की पुण्यतिथि मनाएँ और समुदायों को जोड़ने का काम करें। यह रणनीति भी इस रैली की काट के तौर पर देखी जा रही है।
मायावती की यह रैली कई स्तरों पर अहम है। पहला, यह बसपा के लिए अस्तित्व की लड़ाई है। पार्टी को 2027 चुनाव से पहले कार्यकर्ताओं में जोश भरना है और यह दिखाना है कि वह अभी भी मैदान में है। दूसरा, यह विपक्षी दलों के समीकरण को हिला सकती है। अगर बसपा का कोर वोट बैंक वापस लौटता है तो सपा और कांग्रेस दोनों को नुकसान होगा तीसरा, भाजपा के लिए भी यह रैली मायने रखती है। पिछले कुछ सालों में दलित वोटरों का बड़ा हिस्सा भाजपा के पाले में गया है। अगर बसपा उनमें सेंध लगाने में सफल होती है तो भाजपा के लिए भी चुनौती बढ़ सकती है।
विश्लेषकों का मानना है कि अगर यह रैली सफल रहती है तो यूपी की राजनीति में नया मोड़ आएगा। बसपा फिर से सशक्त होकर उभरेगी और 2027 का चुनाव त्रिकोणीय मुकाबले में बदल सकता है। यह स्थिति भाजपा के लिए तो फायदेमंद हो सकती है क्योंकि वोटों का बिखराव होगा, लेकिन विपक्षी दलों के लिए यह बड़ी परेशानी बनेगी। फिलहाल तो सभी की निगाहें 9 अक्टूबर पर टिकी हैं। कांशीराम स्मारक स्थल पर होने वाली यह रैली कितनी भीड़ जुटा पाती है और मायावती किस तरह का संदेश देती हैं, यही तय करेगा कि बसपा का भविष्य किस दिशा में जाएगा।
