बॉलीवुड से सियासत तक सितारों का आना-जाना

संजय सक्सेना, वरिष्ठ पत्रकार

बॉलीवुड और राजनीति, दोनों ही दुनिया अपनी चमक-दमक और ग्लैमर के लिए जानी जाती हैं। फिल्मी दुनिया में जहां स्टारडम, कैमरा और लाइमलाइट का जादू है, वहीं राजनीति में जनता की उम्मीदें, जिम्मेदारियां और सतत संघर्ष का सामना करना पड़ता है। हाल के वर्षों में कई फिल्मी सितारों ने राजनीति का रास्ता अपनाया, लेकिन उनमें से कई अब इस क्षेत्र से मोहभंग की बात कर रहे हैं। केंद्रीय मंत्री और अभिनेता सुरेश गोपी ने हाल ही में कहा कि वे मंत्री पद छोड़कर फिल्मों में लौटना चाहते हैं। वहीं, हिमाचल प्रदेश की सांसद कंगना रनौत ने राजनीति को “बहुत कठिन पेशा और महंगा शौक” बताया है।कंगना ने स्पष्ट किया कि सांसद के रूप में मिलने वाली सैलरी में से अधिकांश खर्च हो जाता है और उनके पास केवल 50-60 हजार रुपये ही बचे हैं। इसके अलावा, जनता की छोटी-छोटी समस्याओं का समाधान करना जैसे टूटी नाली, खराब सड़क, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार जैसी शिकायतों का निवारण करना उनके लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि कलाकार अपने पेशे को भी समय दें तो उनकी आलोचना की जाती है। उनका मानना है कि जनता की सेवा के साथ-साथ अपने पेशे में काम करना संभव होना चाहिए।



इसी तरह केरल के सांसद और अभिनेता सुरेश गोपी ने भी राजनीति में रहने की कठिनाई जाहिर की है। उन्होंने कहा कि उनका असली सपना फिल्मों में काम करना है और मंत्री पद के कारण उन्हें आर्थिक और व्यक्तिगत चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। गोपी ने यह भी कहा कि अगर उन्हें मंत्री पद से मुक्त कर दिया जाए और किसी अन्य को यह जिम्मेदारी दी जाए तो यह केरल की राजनीति में एक नया अध्याय होगा।ये अनुभव यह साफ दिखाते हैं कि बॉलीवुड के सितारों को राजनीति का वास्तविक अनुभव फिल्मों से कहीं ज्यादा कठिन लगता है। फिल्मी दुनिया की चमक-दमक के विपरीत राजनीति में जनता की अपेक्षाएं, उनके मुद्दे और जिम्मेदारियां हर कदम पर चुनौती पेश करती हैं।बॉलीवुड से राजनीति में कदम रखने वाले सितारे हमेशा चर्चा में रहते हैं। कुछ ने अपनी राजनीतिक छवि को लंबे समय तक बनाए रखा और जनता के बीच स्थिर बने रहे। उदाहरण के लिए, सुनील दत्त, स्मृति ईरानी, हेमा मालिनी, जया बच्चन और विनोद खन्ना राजनीति में सफल रहे। वहीं, अमिताभ बच्चन ने महज तीन साल में इस्तीफा देकर राजनीति से संन्यास ले लिया। इसके अलावा, गोविंदा, जया प्रदा, उर्मिला मातोंडकर, रेखा, और शेखर सुमन भी राजनीति में सक्रिय रहे, लेकिन लंबे समय तक टिक नहीं पाए।

लोकसभा में उनके अटेंडेंस डेटा भी इसे स्पष्ट करता है। 17वीं लोकसभा में बंगाली अभिनेता देव अधिकारी का अटेंडेंस केवल 12% था, जबकि मिमी चक्रवर्ती का 18% और भोजपुरी अभिनेता दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ का 25% रहा। इसके विपरीत, रवि किशन, गौतम गंभीर, और मनोज तिवारी जैसे नेता 80% से ज्यादा अटेंडेंस के साथ सक्रिय रहे। कुल मिलाकर, 17वीं लोकसभा में बॉलीवुड से आए सांसदों का औसत अटेंडेंस 56.7% रहा, जबकि पूरे लोकसभा का औसत 80% था। यह आंकड़ा यह दिखाता है कि कुछ सितारे अपने राजनीतिक कर्तव्यों में पूरी तरह सक्रिय नहीं रह पाए।कंगना और सुरेश गोपी दोनों ने यह साफ किया कि राजनीति उनके लिए आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण है। बॉलीवुड में एक घंटे की कमाई लगभग 70 हजार रुपये होती है, जबकि सांसद के रूप में उनके समय की कमाई केवल 1,700 रुपये के आसपास है। इस अंतर के कारण सितारे इसे महंगा शौक मानते हैं।सिर्फ आर्थिक कारण ही नहीं, बल्कि समय और व्यक्तिगत जीवन की प्राथमिकताओं में भी अंतर है। फिल्मी शूटिंग के दौरान कलाकार अपने समय का प्रबंधन कर सकते हैं, जबकि राजनीति में संसद सत्र, चुनावी दौरे और जनता की समस्याओं का निरंतर समाधान करना पड़ता है। यह काम किसी भी अभिनेता के लिए सहज नहीं है।



हालांकि बॉलीवुड से राजनीति में आने वाले अधिकांश सितारे कुछ समय के बाद मोहभंग महसूस करते हैं, दक्षिण भारत में इसके कुछ अपवाद रहे हैं। पवन कल्याण अभी भी आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री हैं। इससे पहले एनटीआर, एमजीआर, और जयललिता जैसी हस्तियों ने फिल्म और राजनीति दोनों में सफलता हासिल की। उन्होंने जनता के मुद्दों को समझा और अपने राजनीतिक करियर को मजबूती दी।जब अभिनेता और नेता के बीच में झूलते हैं, तो जनता के पैसे और विश्वास का नुकसान भी होता है। चुनावी प्रचार, संसदीय खर्च और अन्य राजनीतिक गतिविधियों पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। यदि सांसद महज कुछ सालों के बाद राजनीति छोड़ देते हैं, तो यह निवेश व्यर्थ साबित होता है।राजनीति केवल नाम और शोहरत का खेल नहीं है। इसमें जनता की सेवा, उनके मुद्दों को समझना और समय-समय पर कठिन निर्णय लेना जरूरी है। फिल्मी दुनिया में स्टारडम, ग्लैमर और पैसा महत्वपूर्ण है, जबकि राजनीति में ईमानदारी, धैर्य और जनता की भलाई की भावना आवश्यक है। कंगना और सुरेश गोपी के अनुभव इसे प्रमाणित करते हैं।अधिकारियों और सांसदों के आंकड़े यह भी बताते हैं कि फिल्मी सितारे राजनीति में आने के बाद अपने अटेंडेंस को अक्सर अपने फिल्मी काम के अनुसार समायोजित करते हैं। इसका असर संसदीय कार्यों और लोकहित से जुड़े फैसलों पर पड़ता है। जनता की अपेक्षाएं और उनके सवाल ऐसे होते हैं, जिन्हें हर सांसद को गंभीरता से लेना चाहिए।बॉलीवुड से राजनीति में कदम रखने वाले सितारों के अनुभव यह स्पष्ट करते हैं कि दोनों क्षेत्रों की अपनी-अपनी चुनौतियां हैं। फिल्म इंडस्ट्री में चमक-दमक और आर्थिक सुरक्षा है, जबकि राजनीति में जनता की सेवा, जिम्मेदारियां और सतत संघर्ष है।



सुरेश गोपी और कंगना रनौत का अनुभव दर्शाता है कि राजनीति में टिकना आसान नहीं है। इसके लिए समर्पण, ईमानदारी और जनता की वास्तविक समस्याओं को समझने की क्षमता चाहिए। यदि ये गुण नहीं हैं, तो सितारे जल्दी ही मोहभंग महसूस करते हैं और फिल्मों की ओर लौट जाते हैं फिल्मी चमक से राजनीति के कठिन रास्ते तक का सफर आसान नहीं है। जनता की उम्मीदों और उनकी समस्याओं के बीच संतुलन बनाए रखना किसी भी अभिनेता के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। यही वजह है कि बॉलीवुड के सितारे अक्सर यह कहते हैं कि राजनीति एक महंगा और चुनौतीपूर्ण पेशा है।राजनीति केवल सत्ता का खेल नहीं, बल्कि जनता के विश्वास का संरक्षण भी है। जो सितारे इसे समझ पाते हैं, वही लंबे समय तक इस क्षेत्र में टिकते हैं। जिन्होंने केवल शोहरत और लोकप्रियता के लिए राजनीति में कदम रखा, वे अक्सर जल्दी ही अपने असली पेशे की ओर लौट जाते हैं।इससे यह भी स्पष्ट होता है कि राजनीति में सफलता का मापदंड केवल लोकप्रियता या स्टारडम नहीं, बल्कि जनता की सेवा और उनके विश्वास को बनाए रखना है। बॉलीवुड से राजनीति तक का सफर चमकदार हो सकता है, लेकिन यह कठिन और चुनौतीपूर्ण भी है।



Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *