बीजेपी के सबसे युवा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के सामने संगठन और सत्ता की निर्णायक परीक्षा

भारतीय जनता पार्टी में राष्ट्रीय अध्यक्ष पद को लेकर होने जा रहा बदलाव सिर्फ एक औपचारिक संगठनात्मक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसे पार्टी के भविष्य, उसकी वैचारिक दिशा और चुनावी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। बिहार के वरिष्ठ नेता और मौजूदा राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन 19 जनवरी को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए नामांकन दाखिल करेंगे और 20 जनवरी को उनका निर्विरोध चुना जाना लगभग तय माना जा रहा है। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक यह फैसला पहले ही शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर तय हो चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और निवर्तमान अध्यक्ष जेपी नड्डा का प्रस्तावक बनना इस बात का संकेत है कि संगठन ने नबीन के नाम पर सर्वसम्मति बना ली है। दिल्ली में होने वाले इस कार्यक्रम में बीजेपी शासित राज्यों के सभी मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, प्रदेश अध्यक्ष और राष्ट्रीय पदाधिकारी मौजूद रहेंगे, जिससे यह चुनाव एक शक्ति प्रदर्शन की तरह भी देखा जा रहा है।

45 साल की उम्र में नितिन नबीन बीजेपी के इतिहास में सबसे युवा राष्ट्रीय अध्यक्ष होंगे। अब तक पार्टी की कमान अपेक्षाकृत वरिष्ठ और लंबे राजनीतिक अनुभव वाले नेताओं के हाथ में रही है। ऐसे में नबीन का चयन अपने आप में यह संकेत देता है कि बीजेपी अब संगठन के भीतर पीढ़ीगत बदलाव को खुलकर स्वीकार करने के चरण में प्रवेश कर चुकी है। प्रधानमंत्री मोदी कई बार कह चुके हैं कि पार्टी को ऐसे नेतृत्व की जरूरत है जो आने वाले 20–25 वर्षों की राजनीति को ध्यान में रखकर फैसले ले सके। नबीन का कार्यकाल जनवरी 2026 से जनवरी 2029 तक रहेगा, यानी 2029 के लोकसभा चुनाव की पूरी तैयारी उन्हीं के नेतृत्व में होगी। यही कारण है कि उनके सामने चुनौतियां लंबी नहीं, बल्कि तुरंत और बहुस्तरीय हैं।

दिसंबर 2025 में कार्यकारी अध्यक्ष बनने के बाद से नितिन नबीन ने संगठनात्मक अनुशासन और बूथ स्तर की मजबूती पर खास जोर दिया है। बीजेपी के अपने आंतरिक आंकड़ों के मुताबिक देश में पार्टी के सक्रिय बूथों की संख्या करीब 9 लाख है। 2014 और 2019 की जीत में बूथ मैनेजमेंट को पार्टी ने निर्णायक फैक्टर माना था। 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 240 सीटों पर सिमटना पड़ा, जो 2019 के 303 के आंकड़े से काफी कम था। पार्टी के भीतर यह निष्कर्ष निकाला गया कि कई राज्यों में संगठन की जमीनी पकड़ कमजोर हुई है। नबीन को इसी कमजोरी को दूर करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। पूर्णकालिक अध्यक्ष बनने के बाद उनसे उम्मीद होगी कि वे संगठन की हर परत को सक्रिय और जवाबदेह बनाएं।

2026 में होने वाले विधानसभा चुनाव नितिन नबीन की पहली बड़ी राजनीतिक परीक्षा होंगे। पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी जैसे राज्यों में चुनाव होने हैं। असम में बीजेपी लगातार दो बार सत्ता में रह चुकी है, लेकिन सत्ता विरोधी लहर, बेरोजगारी और स्थानीय असंतोष जैसे मुद्दे पार्टी के लिए चुनौती बन सकते हैं। पश्चिम बंगाल में टीएमसी के खिलाफ बीजेपी ने 2021 में 77 सीटें जीतकर खुद को मुख्य विपक्ष के रूप में स्थापित किया था, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में टीएमसी ने फिर बढ़त बना ली। वहां बीजेपी के लिए सिर्फ चुनाव जीतना नहीं, बल्कि संगठन को टूट-फूट से बचाना भी बड़ी चुनौती है। दक्षिण भारत में स्थिति और कठिन है। तमिलनाडु और केरल में बीजेपी का वोट शेयर अब भी दहाई अंक में पहुंचने के लिए संघर्ष कर रहा है। तमिलनाडु में नबीन द्वारा शुरू किया गया 90 दिनों का बूथ अभियान इस बात का संकेत है कि पार्टी अब प्रतीकात्मक राजनीति से आगे बढ़कर जमीनी संपर्क पर जोर देना चाहती है।

महिला आरक्षण कानून का लागू होना भी नितिन नबीन के कार्यकाल की सबसे जटिल चुनौतियों में से एक होगा। 2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम के तहत लोकसभा और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी, जो 2027 की जनगणना और परिसीमन के बाद लागू होंगी। भारत में फिलहाल लोकसभा में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 15 प्रतिशत है। इस कानून के लागू होने से टिकट वितरण का पूरा ढांचा बदल जाएगा। पार्टी के भीतर यह चिंता भी है कि अगर नए महिला चेहरों को तैयार नहीं किया गया, तो टिकट वितरण के समय भारी असंतोष पैदा हो सकता है। नितिन नबीन के सामने चुनौती सिर्फ महिलाओं को टिकट देना नहीं, बल्कि उन्हें संगठन और सत्ता दोनों में प्रभावी भूमिका के लिए तैयार करना होगा।

‘वन नेशन वन इलेक्शन’ भी बीजेपी की दीर्घकालिक रणनीति का अहम हिस्सा है। दिसंबर 2024 में पेश संविधान संशोधन विधेयक अगर लागू होता है, तो लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होंगे। इससे चुनावी खर्च में कमी और प्रशासनिक स्थिरता की बात कही जा रही है, लेकिन राजनीतिक स्तर पर इसका असर गहरा होगा। अब तक बीजेपी अलग-अलग चुनावों के जरिए अपनी रणनीति को लगातार सुधारती रही है। एक साथ चुनाव होने पर यह मौका नहीं मिलेगा। नितिन नबीन को पार्टी को ऐसे चुनावी मॉडल के लिए तैयार करना होगा, जहां एक गलती पूरे देश में नुकसान पहुंचा सकती है।

2027 की जनगणना में जाति गणना शामिल होने से राजनीतिक समीकरण और भी जटिल हो जाएंगे। बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में जाति आधारित राजनीति पहले से ही प्रभावी है। बीजेपी ने पिछले एक दशक में ओबीसी और दलित वोट बैंक में अच्छी पैठ बनाई है, लेकिन जाति जनगणना के बाद प्रतिनिधित्व को लेकर दबाव बढ़ेगा। पार्टी के अंदर यह सवाल उठेगा कि टिकट और संगठन में किस वर्ग को कितनी हिस्सेदारी दी जाए। नितिन नबीन का बिहार से आना यहां उनके लिए फायदेमंद माना जा रहा है, क्योंकि बिहार की राजनीति जाति संतुलन के बिना संभव नहीं है।

प्रधानमंत्री मोदी का एक बड़ा एजेंडा गैर-राजनीतिक परिवारों से एक लाख युवाओं को राजनीति में लाने का है। बीजेपी के पास फिलहाल करीब 18 करोड़ प्राथमिक सदस्य होने का दावा है। इस विशाल संगठन में नए और गैर-परंपरागत चेहरों को आगे लाना आसान नहीं होगा। इससे पुराने नेताओं और स्थापित गुटों में असंतोष पैदा हो सकता है। नितिन नबीन को संगठन में संतुलन बनाते हुए यह बदलाव लागू करना होगा, जो उनकी नेतृत्व क्षमता की असली परीक्षा होगी।

वैश्विक स्तर पर भी बीजेपी को कई मोर्चों पर जवाब देना होगा। अमेरिका की टैरिफ नीतियों, वैश्विक मंदी की आशंकाओं और चीन के साथ सीमा विवाद का असर देश की अर्थव्यवस्था और रोजगार पर पड़ सकता है। जब भी आर्थिक दबाव बढ़ता है, उसका राजनीतिक असर सत्ताधारी पार्टी पर ही पड़ता है। ऐसे में नितिन नबीन को संगठन को न केवल चुनावी मुद्दों पर, बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी एकजुट संदेश देने के लिए तैयार करना होगा।

पार्टी की अंदरूनी राजनीति भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। नितिन नबीन को एक गैर-विवादित और कार्यकुशल नेता माना जाता है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर कई वरिष्ठ नेता उनसे उम्र और अनुभव में बड़े हैं। शिवराज सिंह चौहान, मनोहर लाल खट्टर और धर्मेंद्र प्रधान जैसे नेताओं के समर्थक संगठन में मजबूत हैं। युवा अध्यक्ष के तौर पर नबीन को वरिष्ठों को सम्मान देते हुए युवाओं को आगे बढ़ाने का संतुलन साधना होगा।

कुल मिलाकर नितिन नबीन का कार्यकाल बीजेपी के लिए संक्रमण काल साबित हो सकता है। यह सिर्फ नेतृत्व परिवर्तन नहीं, बल्कि पार्टी की कार्यशैली, सामाजिक संतुलन और चुनावी रणनीति के पुनर्निर्माण का दौर होगा। 2029 के लोकसभा चुनाव का रास्ता इन्हीं तीन वर्षों में तय होगा और यही समय बताएगा कि बीजेपी का यह पीढ़ीगत प्रयोग कितना सफल साबित होता है।

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