बीजेपी का मिशन 2027, कौन होगा संगठन का सिपहसालार?

उत्तर प्रदेश की सियासत में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर अपनी रणनीति को और धार दे रही है। इस रणनीति का केंद्र बिंदु है नए प्रदेश अध्यक्ष का चयन, जो न केवल संगठन को नई दिशा देगा, बल्कि जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों को साधकर पार्टी को सत्ता की हैट्रिक दिलाने में अहम भूमिका निभाएगा। मौजूदा अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी का कार्यकाल जल्द खत्म होने वाला है, और पार्टी ने छह नामों की सूची तैयार की है, जिसमें पूर्व उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा, बस्ती के पूर्व सांसद हरीश द्विवेदी, वर्तमान मंत्री धर्मपाल सिंह, केंद्रीय राज्य मंत्री बीएल वर्मा, पूर्व केंद्रीय मंत्री रामशंकर कठेरिया, और वर्तमान एमएलसी विद्या सागर सोनकर शामिल हैं। यह सूची जातीय संतुलन (दो ब्राह्मण, दो ओबीसी, दो दलित) और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व (पूर्वांचल और पश्चिमी यूपी) को ध्यान में रखकर बनाई गई है। लेकिन इस चयन के पीछे की रणनीति, चुनौतियां, और बीजेपी की दीर्घकालिक योजना का गहरा विश्लेषण जरूरी है।

2024 का सबक: बीजेपी की रणनीति में बदलाव की जरूरत

2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को यूपी में करारा झटका लगा। 2019 में 62 सीटें जीतने वाली पार्टी 2024 में केवल 33 सीटों पर सिमट गई, और उसका वोट शेयर 50% से घटकर 41.37% रह गया। खासकर पूर्वांचल और अवध क्षेत्र में सवर्ण और ओबीसी वोटरों का एक हिस्सा समाजवादी पार्टी (सपा)-कांग्रेस गठबंधन की ओर खिसक गया। पश्चिमी यूपी में राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) के साथ गठबंधन के बावजूद जाट वोटरों को पूरी तरह लामबंद नहीं किया जा सका। यह हार बीजेपी के लिए खतरे की घंटी थी, क्योंकि यूपी न केवल 80 लोकसभा सीटों के साथ राष्ट्रीय राजनीति का केंद्र है, बल्कि 403 विधानसभा सीटों के साथ राज्य की सियासत में भी निर्णायक भूमिका निभाता है।

इस हार ने बीजेपी को अपनी कमजोरियों का गहरा विश्लेषण करने पर मजबूर किया। संगठन में नई जान फूंकने और बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने की जरूरत महसूस हुई। भूपेंद्र चौधरी, जो जाट समुदाय से हैं, को 2022 में अध्यक्ष बनाया गया था ताकि पश्चिमी यूपी में पार्टी की पकड़ मजबूत हो। लेकिन 2024 के नतीजों ने साबित किया कि केवल क्षेत्रीय समीकरणों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। अब बीजेपी एक ऐसे अध्यक्ष की तलाश में है जो सामाजिक इंजीनियरिंग, संगठनात्मक कौशल, और वैचारिक प्रतिबद्धता का सही मिश्रण हो।

सामाजिक इंजीनियरिंग: जातीय समीकरणों का खेल

बीजेपी की छह नामों की सूची सामाजिक इंजीनियरिंग की दिशा में एक सोचा-समझा कदम है। सूची में दो ब्राह्मण (दिनेश शर्मा, हरीश द्विवेदी), दो ओबीसी (धर्मपाल सिंह, बीएल वर्मा), और दो दलित (रामशंकर कठेरिया, विद्या सागर सोनकर) नेताओं का शामिल होना पार्टी की रणनीति को स्पष्ट करता है। यूपी की सियासत में जातीय समीकरण हमेशा से निर्णायक रहे हैं। 2024 में सपा के पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले ने बीजेपी के वोट बैंक में सेंध लगाई। खासकर दलित वोटर, जो पहले बीजेपी की ओर झुके थे, 2024 में सपा-कांग्रेस की ओर गए। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की कमजोर उपस्थिति ने भी सपा को फायदा पहुंचाया।

इस बार बीजेपी दलित वोटरों को वापस लाने के लिए गंभीर है। रामशंकर कठेरिया और विद्या सागर सोनकर जैसे नेताओं का नाम सूची में होना इस बात का संकेत है। कठेरिया, जो पश्चिमी यूपी से हैं और राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के पूर्व अध्यक्ष रह चुके हैं, दलित समुदाय में अच्छी पकड़ रखते हैं। उनकी नियुक्ति पश्चिमी यूपी में क्षेत्रीय संतुलन साधने के साथ-साथ दलित वोटरों को लुभाने का काम कर सकती है। वहीं, विद्या सागर सोनकर पूर्वांचल से हैं, जो क्षेत्रीय और सामाजिक संतुलन का एक और पहलू है।

ओबीसी वोटर, जो यूपी की आबादी का करीब 40% हैं, बीजेपी के लिए रीढ़ की हड्डी हैं। धर्मपाल सिंह और बीएल वर्मा, दोनों लोध समुदाय से, इस वर्ग को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। खासकर बीएल वर्मा, जो केंद्रीय राज्य मंत्री हैं, अपनी सादगी और आरएसएस से गहरे रिश्तों के लिए जाने जाते हैं। लेकिन 2024 में ओबीसी वोटों का एक हिस्सा सपा की ओर गया, जिसके लिए बीजेपी को अपनी रणनीति में बदलाव करना होगा।

ब्राह्मण वोटर, जो सवर्ण वोटों का एक बड़ा हिस्सा हैं, भी बीजेपी के लिए महत्वपूर्ण हैं। दिनेश शर्मा, जो पूर्व उपमुख्यमंत्री और शिक्षाविद् हैं, ब्राह्मण समुदाय में मजबूत पकड़ रखते हैं। उनकी स्वच्छ छवि और आरएसएस से नजदीकी उन्हें मजबूत दावेदार बनाती है। हरीश द्विवेदी, जो युवा और ऊर्जावान हैं, संगठन में अपनी सक्रियता के लिए जाने जाते हैं। लेकिन ब्राह्मण नेतृत्व को लेकर पार्टी में एक धड़ा यह तर्क देता है कि 2019 में महेंद्र नाथ पांडे के नेतृत्व में ब्राह्मण अध्यक्ष रहते हुए भी सीटें कम हुई थीं।

क्षेत्रीय संतुलन: पूर्वांचल बनाम पश्चिमी यूपी

यूपी की सियासत में क्षेत्रीय संतुलन उतना ही महत्वपूर्ण है जितना जातीय समीकरण। बीजेपी ने इस बार सूची में पूर्वांचल और पश्चिमी यूपी के नेताओं को शामिल कर इस संतुलन को साधने की कोशिश की है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, जो पूर्वांचल से हैं, के नेतृत्व में पार्टी को इस क्षेत्र में मजबूती मिली है। लेकिन 2024 में पूर्वांचल में हार ने बीजेपी को इस क्षेत्र में अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया। हरीश द्विवेदी और विद्या सागर सोनकर जैसे नेताओं का नाम इस क्षेत्र में पार्टी की पकड़ को मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
पश्चिमी यूपी, जहां जाट, मुस्लिम, और दलित वोटरों की अच्छी-खासी तादाद है, बीजेपी के लिए चुनौती बना हुआ है। आरएलडी के साथ गठबंधन के बावजूद 2024 में इस क्षेत्र में पार्टी को नुकसान हुआ। रामशंकर कठेरिया और बीएल वर्मा जैसे नेताओं का नाम इस क्षेत्र में संतुलन साधने का प्रयास है। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये नेता जाट और मुस्लिम वोटरों को प्रभावित कर पाएंगे, जो सपा और कांग्रेस की ओर झुके हैं?

आरएसएस की भूमिका: वैचारिक और रणनीतिक दिशा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) बीजेपी के लिए हमेशा से वैचारिक और रणनीतिक मार्गदर्शक रहा है। इस बार भी नए अध्यक्ष के चयन में आरएसएस की भूमिका अहम है। दिल्ली में हुई उच्चस्तरीय बैठकों में गृह मंत्री अमित शाह और बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने आरएसएस के साथ गहन विचार-विमर्श किया। आरएसएस ने सुझाव दिया कि नया अध्यक्ष ऐसा हो जो संगठन को वैचारिक रूप से मजबूत करे और सपा के पीडीए फॉर्मूले का जवाब दे सके। 2024 के बाद आरएसएस ने यह भी चिंता जताई थी कि बीजेपी में बाहरी नेताओं को ज्यादा तरजीह दी गई, जिससे पुराने कार्यकर्ताओं में असंतोष बढ़ा। नए अध्यक्ष के चयन में आरएसएस इस बात पर जोर दे रहा है कि वह लंबे समय से संगठन से जुड़ा हो और वैचारिक प्रतिबद्धता रखता हो।

विपक्ष की चुनौती: सपा-कांग्रेस और बसपा का जवाब

सपा के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पीडीए फॉर्मूले के जरिए पिछड़े, दलित, और अल्पसंख्यक वोटरों को एकजुट करने की रणनीति बनाई है। 2024 में इस फॉर्मूले ने बीजेपी को कड़ी टक्कर दी। सपा-कांग्रेस गठबंधन 2027 में भी मजबूत रहने की संभावना है। दूसरी ओर, बसपा भी दलित वोटों को वापस लाने की कोशिश में है। बीजेपी को इन दोनों चुनौतियों का जवाब देना होगा। नए अध्यक्ष की भूमिका इन समीकरणों को तोड़ने और बीजेपी के वोट बैंक को मजबूत करने में होगी।

संगठनात्मक रणनीति: बूथ से लेकर शीर्ष तक

बीजेपी ने बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए हैं। पश्चिमी यूपी के 330 मंडलों में 61 सदस्यों की कार्यकारिणी बनाई जा रही है, और 2700 से अधिक शक्ति केंद्रों पर प्रभारियों की नियुक्ति होगी। इसका मकसद हर बूथ तक पहुंच सुनिश्चित करना है। लेकिन संगठन में आंतरिक कलह भी एक चुनौती है। 28 जिलों में जिला अध्यक्षों की नियुक्ति में देरी और स्थानीय नेताओं के बीच खींचतान ने बीजेपी की मुश्किलें बढ़ाई हैं। नया अध्यक्ष ऐसा होना चाहिए जो इन आंतरिक विवादों को सुलझाए और कार्यकर्ताओं में जोश भरे।

सहयोगी दलों का समीकरण
बीजेपी को अपने सहयोगी दलों आरएलडी और निषाद पार्टी के साथ तालमेल बनाए रखना होगा। निषाद पार्टी के नेता संजय निषाद ने 200 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारने की बात कहकर बीजेपी को दबाव में डाला है। नए अध्यक्ष को इन सहयोगियों को साथ लेकर चलने की कला में माहिर होना होगा।

 2027 की राह का पहला कदम

2027 का विधानसभा चुनाव बीजेपी के लिए सत्ता की हैट्रिक का मौका है, लेकिन इसके लिए संगठन और नेतृत्व में बदलाव जरूरी है। नए अध्यक्ष का चयन अगले कुछ दिनों में हो सकता है, और यह फैसला राष्ट्रीय नेतृत्व व आरएसएस की सहमति से होगा। यह साफ है कि बीजेपी कोई जोखिम नहीं लेना चाहती। नया अध्यक्ष न केवल संगठन को नई दिशा देगा, बल्कि 2027 की जंग में पार्टी को जीत की राह पर ले जाएगा। सवाल यह है कि इन छह दिग्गजों में से कौन होगा वह चेहरा, जो यूपी बीजेपी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाएगा? इसका जवाब जल्द ही सामने होगा।

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