बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों ने राज्य की राजनीति के पारंपरिक समीकरणों को हिला कर रख दिया है। दशकों से जो जातीय और धार्मिक ध्रुवीकरण का ढांचा यहां की राजनीति को निर्धारित करता रहा, इस बार वह स्पष्ट रूप से टूटता दिखाई दिया। मुस्लिम और यादव बहुल क्षेत्रों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए की अप्रत्याशित सफलता ने यह संकेत दे दिया है कि बिहार के मतदाता अब केवल परंपरागत जातीय पहचान के आधार पर मतदान नहीं कर रहे हैं, बल्कि विकास, स्थिरता और नेतृत्व की दिशा में सोचने लगे हैं। एनडीए ने इस बार करीब 200 सीटों के साथ बहुमत के पार शानदार प्रदर्शन किया है, जबकि महागठबंधन की सीटें घटकर मात्र 37 तक सिमटती दिख रही हैं। यह उतना ही गंभीर संकेत है जितना राजनीतिक रूप से परिवर्तनकारी। एनडीए ने महागठबंधन के मुस्लिम(एम) और यादव(वाई)
में बुरी तरह से सेंधमारी कर ली,जो भविष्य की राजनीति के लिये बिहार की राजनीति में बड़े बदलाव का आधार बन सकती है।
चुनाव के शुरुआती रुझानों से लेकर अंतिम परिणामों तक यह देखा गया कि जिन क्षेत्रों में पहले मुस्लिम और यादव मतदाता राजद या महागठबंधन के प्रति स्थायी झुकाव रखते थे, वहां इस बार भाजपा और जनता दल यूनाइटेड ने अपने समर्थन आधार को न केवल बनाया बल्कि मजबूत किया। बिहार की लगभग 51 मुस्लिम-यादव बहुल सीटों में से एनडीए ने 35 सीटों पर जीत दर्ज कर एक बड़ा राजनीतिक संकेत दे दिया है। इनमें सीमांचल के अररिया, किशनगंज, कटिहार और पूर्णिया जैसे जिले विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। ये क्षेत्र अब तक महागठबंधन के परंपरागत गढ़ माने जाते थे, पर इस बार एनडीए के प्रत्याशी यहां बढ़त बनाते दिखे। इससे यह भी स्पष्ट हो गया है कि भाजपा और जदयू ने स्थायी जातीय समीकरणों को तोड़कर नए सामाजिक गठबंधन की नींव रखी है।
2015 और 2020 के चुनावों में मुस्लिम मतदाताओं का झुकाव जिस एकतरफा रूप से महागठबंधन के पक्ष में था, इस बार उसमें आश्चर्यजनक परिवर्तन देखने को मिला है। सीमांचल में जहां मुस्लिम आबादी का बड़ा हिस्सा है, वहां भाजपा-जदयू ने स्थानीय स्तर पर मुस्लिम प्रत्याशियों को उतारा और विकास, शिक्षा, रोजगार तथा सामाजिक शांति जैसे मुद्दों को लेकर प्रचार किया। इससे उन्हें युवाओं और मध्यमवर्गीय मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन मिला। कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुस्लिम मतदाता अब लगातार धार्मिक पहचान से अधिक विकास के प्रश्नों की ओर झुक रहे हैं। केंद्र सरकार की योजनाओं जैसे प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना, सड़क और शिक्षा ढांचे में सुधार के ठोस असर ने भी इस मनोवृत्ति में बदलाव को दिशा दी है।
यादव वोट बैंक की स्थिति भी इस बार पूरी तरह बदलती दिखी। बिहार की राजनीति में यादव समुदाय राजद का स्थायी आधार माना जाता रहा है, लेकिन 2025 के चुनाव में यह हिसाब बदल गया। सर्वेक्षणों और एजेंसी रिपोर्टों के अनुसार, लगभग 12 फीसदी यादव मत भाजपा और जदयू के पक्ष में शिफ्ट हुए हैं। यह बदलाव इसलिए अहम है क्योंकि इससे संकेत मिलता है कि युवा यादव मतदाता अब केवल एक परिवार विशेष की राजनीति से आगे बढ़कर भविष्य की संभावनाओं पर विश्वास करने लगे हैं। भाजपा और जदयू ने इस समुदाय के बीच यह संदेश प्रभावी ढंग से पहुंचाया कि अब जातीय राजनीति से हटकर विकास और प्रतिनिधित्व की व्यापक राजनीति का समय है।
महागठबंधन के लिए यह परिणाम न केवल राजनीतिक हार बल्कि रणनीतिक पराजय भी मानी जा रही है। लालू प्रसाद यादव के सामाजिक न्याय के मॉडल ने वर्षों तक बिहार की राजनीति पर वर्चस्व कायम रखा था, परंतु इस बार जनता ने उस मॉडल के एकरूप और सीमित स्वरूप को ठुकराते हुए नए राजनीतिक मिश्रण को अपनाया। युवाओं, महिलाओं और अल्पसंख्यकों ने जिस तरह एनडीए को समर्थन दिया, वह यह दर्शाता है कि जमीनी स्तर पर जनता अब बदलाव चाहती है। साथ ही, नीतीश कुमार और भाजपा नेतृत्व ने संयुक्त रूप से ऐसा संतुलन दिखाया जिससे मतदाता में यह विश्वास बना कि शासन स्थिर रहेगा और विकास योजनाएं गति पकड़ेंगी।
सीमांचल की राजनीतिक परिस्थिति को यदि अलग से देखा जाए, तो यह इलाका लंबे समय तक उपेक्षा का शिकार रहा है। वहां की सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा की स्थिति अन्य इलाकों की तुलना में कमजोर रही है। इस बार एनडीए ने इन्हीं मुद्दों को अपने मुख्य एजेंडे के रूप में उठाया और स्थानीय स्तर पर विकास कार्यों का हवाला देते हुए मतदाताओं को जोड़ा। भाजपा ने अपने संगठनात्मक ढांचे को सीमांचल में पहले से कहीं अधिक मजबूत किया और जदयू के सहयोग से वहां बूथ स्तर पर गठबंधन की पकड़ को सघन बनाया। इसका सीधा लाभ चुनाव परिणामों में दिखाई दिया।
यह भी महत्वपूर्ण है कि एनडीए की रणनीति में केवल जातीय समीकरण नहीं बल्कि धर्मनिरपेक्ष विकास की भाषा को तरजीह दी गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की साझा छवि ने मतदाताओं में यह विश्वास पैदा किया कि गठबंधन न केवल स्थिर सरकार देगा, बल्कि जनकल्याण पर केंद्रित नीतियाँ भी लागू करेगा। यही कारण है कि जहां एक ओर महागठबंधन का प्रचार अधिकतर सामाजिक न्याय और जातीय पहचान तक सीमित रहा, वहीं एनडीए का अभियान आधुनिक बिहार के निर्माण पर केंद्रित था।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि इस परिणाम का असर बिहार की सीमाओं से बाहर भी देखने को मिलेगा। उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और झारखंड जैसे राज्यों में जहां आने वाले महीनों में चुनावी हलचल बढ़ेगी, बिहार का यह रुझान वहां के राजनीतिक दलों की रणनीति को प्रभावित करेगा। विशेष रूप से मुस्लिम और अन्य पिछड़ा वर्ग के वोटों में जो नई दिशा देखने को मिली है, वह राष्ट्रीय राजनीति को भी नई दिशा दे सकती है। भाजपा के लिए यह नतीजे एक बड़े सामाजिक पुनर्संतुलन का संकेत हैं जो उसे 2029 के आम चुनावों तक मजबूती दे सकते हैं।
महागठबंधन की ओर से अभी आत्ममंथन की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है, लेकिन प्रारंभिक प्रतिक्रियाओं में यह साफ झलकता है कि उसके नेतृत्व को जातीय समीकरण के पुराने ढांचे से बाहर निकलकर नई रणनीति बनानी होगी। युवा मतदाता अब केवल सामाजिक पहचान से संतुष्ट नहीं हैं, वे अवसर, शिक्षा और रोजगार की मांग को लेकर अधिक संवेदनशील हैं। एनडीए ने इस भावना को समझा और उसे अपने राजनीतिक संदेश में शामिल किया। इन नतीजों ने यह भी साबित कर दिया है कि बिहार की राजनीति में अब पहचान-आधारित राजनीति के बजाय विषय-आधारित राजनीति की नींव रखी जा चुकी है। मुस्लिम और यादव जैसे बड़े समुदायों का एनडीए की ओर झुकाव केवल एक चुनावी परिणाम नहीं बल्कि भारतीय लोकतंत्र के बदलते चरित्र का संकेत है। बिहार का मतदाता अब उस दौर से बाहर आ चुका है जब चुनाव केवल जाति या धर्म पर तय होते थे। अब वह सोच रहा है कि कौन उसकी जिंदगी को बेहतर बना सकता है, कौन व्यवहारिक नेतृत्व दे सकता है।
कुल मिलाकर 2025 के चुनावों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बिहार जैसे राज्य में भी राष्ट्रीय राजनीति के प्रभाव अब गहराई से उतर चुके हैं। सीमांचल और यादव बाहुल्य क्षेत्रों में एनडीए की जीत केवल गणितीय आंकड़ों की बाजी नहीं बल्कि जनविचारों के बदलाव की कहानी है। इस परिवर्तन का असर निश्चय ही आने वाले वर्षों में राष्ट्रीय राजनीति के स्वरूप और राजनीतिक दलों की रणनीति दोनों पर पड़ेगा।
