बीजेपी ने अपने ओबीसी नेताओं को बिहार चुनाव में उतारा

पटना। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की सरगर्मी तेज हो चुकी है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने एक बड़ा दांव खेलते हुए उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को बिहार चुनाव का सह-प्रभारी नियुक्त किया है। केंद्रीय चुनाव समिति ने यह फैसला लिया, जिसमें केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को मुख्य प्रभारी और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल को भी सह-प्रभारी बनाया गया। यह नियुक्ति तत्काल प्रभाव से लागू हो गई है। अक्टूबर-नवंबर में होने वाले इस चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) और महागठबंधन के बीच कांटे की टक्कर तय है। मौर्य की एंट्री से साफ है कि भाजपा ने बिहार के जटिल जातिगत समीकरणों को साधने की पूरी तैयारी कर ली है।

बिहार की सियासत में जाति का गणित हमेशा से अहम रहा है। यहां कुर्मी, कोइरी, यादव जैसी अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) जातियों की आबादी 50 फीसदी से ज्यादा है। यादव वोट तो महागठबंधन, खासकर राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के पास मजबूती से हैं। लेकिन गैर-यादव ओबीसी जैसे कुशवाहा, कोइरी और कुर्मी को अपनी ओर खींचना भाजपा और उसके सहयोगी जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के लिए बड़ी चुनौती है। नीतीश कुमार की जेडीयू इन जातियों का परंपरागत आधार रही है, लेकिन हाल के वर्षों में एनडीए ने इन्हें एकजुट करने की कोशिश तेज की है। केशव प्रसाद मौर्य की नियुक्ति इसी रणनीति का हिस्सा है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि मौर्य जैसे ओबीसी चेहरे से गैर-यादव वोटों को एकजुट करना आसान होगा। हाल के उपचुनावों में बिहार की चार सीटों पर एनडीए की जीत इस रणनीति की कामयाबी का सबूत देती है। मौर्य ने हाल ही में दावा किया, “बिहार में एनडीए की जीत एकतरफा होगी।”

केशव प्रसाद मौर्य उत्तर प्रदेश की सियासत का बड़ा नाम हैं। ओबीसी समुदाय से आने वाले मौर्य ने 2017 और 2022 के यूपी विधानसभा चुनावों में भाजपा को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई। वे गैर-यादव ओबीसी वोटों को एनडीए की ओर खींचने में माहिर हैं। योगी आदित्यनाथ सरकार में उपमुख्यमंत्री के तौर पर वे संगठन और सत्ता के बीच शानदार तालमेल बनाए हुए हैं। उनकी सादगी और कार्यकर्ताओं से सीधा जुड़ाव उन्हें खास बनाता है। यूपी में गैर-यादव वोटों को साधने का उनका अनुभव अब बिहार में काम आएगा। मौर्य पहले यूपी भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं और बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं को जोड़ने में उनकी महारत जगजाहिर है। बिहार में भी उनकी यह काबिलियत एनडीए को फायदा पहुंचाएगी। पार्टी ने हाल ही में बिहार में 10,000 से ज्यादा बूथ-स्तरीय कार्यकर्ताओं की ट्रेनिंग शुरू की है, जिसमें मौर्य की भूमिका अहम होगी।

विपक्ष की सबसे बड़ी ताकत उसका जातिगत जनगणना का मुद्दा है। तेजस्वी यादव और कांग्रेस इस मुद्दे को भुनाकर ओबीसी और दलित वोटों को ध्रुवीकृत करने की कोशिश में हैं। ‘जाति आधारित न्याय’ का नारा देकर महागठबंधन ने वोटबैंक को बांटने का दांव खेला है। लेकिन भाजपा इसे ‘सबका साथ, सबका विकास’ के मंत्र से काटने की तैयारी में है। मौर्य इस रणनीति के केंद्र में होंगे। वे गैर-यादव और यादव वोटों के बीच की खाई को पाटने की कोशिश करेंगे। एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “मौर्य की नियुक्ति हिंदुत्व और विकास के फॉर्मूले को मजबूत करने का कदम है। नीतीश के साथ गठबंधन को जातिगत आधार पर और ठोस करना जरूरी है।” मौर्य ने भी जातिगत जनगणना पर विपक्ष को ललकारा है। मई 2025 में उन्होंने कहा, “इंडी गठबंधन समाज को बांटने की साजिश रच रहा है, लेकिन हम सबको समान हक देंगे।”

बिहार और यूपी की सांस्कृतिक समानताएं मौर्य के लिए फायदेमंद हैं। दोनों राज्यों में भाषा, खान-पान और सामाजिक मुद्दे एक-दूसरे से मिलते-जुलते हैं। मौर्य की स्थानीय मुद्दों की समझ और भाषा पर पकड़ बिहार में उनके काम को आसान बनाएगी। धर्मेंद्र प्रधान के साथ उनकी जोड़ी को अजेय माना जा रहा है। प्रधान की संगठनात्मक क्षमता और मौर्य का जनता से जुड़ाव मिलकर एनडीए को मजबूती देगा। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, मौर्य की नियुक्ति में योगी मॉडल का विस्तार भी छिपा है। यूपी में मौर्य योगी आदित्यनाथ के डिप्टी हैं, और उनकी यह नियुक्ति योगी कैंप को बिहार में फैलाने का मौका देगी। राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा की रणनीति साफ है- हिंदुत्व, विकास और जातिगत संतुलन का त्रिकोण।

बिहार में ‘मोदी-नीतीश’ का डबल इंजन मॉडल पहले भी सफल रहा है, लेकिन जातिगत जनगणना जैसे मुद्दों पर विपक्ष ने सेंध लगाने की कोशिश की है। मौर्य इस चुनौती को तोड़ने के लिए मैदान में हैं। वे बूथों पर जाकर कार्यकर्ताओं को प्रेरित करेंगे और गैर-यादव ओबीसी को एकजुट करेंगे। हाल ही में एक सभा में मौर्य ने नारा दिया, “सौ में साठ हमारा, बाकी में बंटवारा।” उनका दावा है कि एनडीए 60 फीसदी वोट हासिल कर लेगा। विपक्ष पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा, “इंडिया गठबंधन बिखर चुका है और नक्सलवाद को बढ़ावा दे रहा है।” यह बयान विपक्ष के ध्रुवीकरण को तोड़ने का हथियार है।

एनडीए की रणनीति बेहद व्यापक है। नीतीश कुमार, चिराग पासवान, जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा जैसे सहयोगियों के साथ सीट बंटवारे पर काम शुरू हो चुका है। मौर्य की मौजूदगी से गैर-यादव ओबीसी को साधना आसान होगा। बिहार में कुशवाहा और कोइरी वोटों को लुभाने के लिए मौर्य जैसे चेहरे की जरूरत लंबे समय से थी। अमित शाह के हाल के बिहार दौरे से पहले इस नियुक्ति का ऐलान हुआ, जो भाजपा की गंभीरता को दर्शाता है।

महागठबंधन की मुश्किलें बढ़ गई हैं। तेजस्वी यादव और कांग्रेस युवा वोटों पर भरोसा कर रहे हैं, लेकिन ओबीसी कार्ड उनके लिए मुसीबत बन सकता है। बिहार में जाति का गणित धर्म से पहले आता है। मौर्य जैसे नेता इस गणित को हल करने में माहिर हैं। उनकी नियुक्ति से ‘मोदी-नीतीश’ मॉडल को नया आयाम मिलेगा। बिहार की 243 सीटों पर जंग अब और रोमांचक हो गई है। मौर्य क्या यूपी का जादू बिहार में दोहरा पाएंगे? यह सवाल हर किसी के मन में है। लेकिन इतना तय है कि उनकी एंट्री ने सियासी समीकरण बदल दिए हैं। आने वाले महीने इस जंग का फैसला करेंगे।

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