बिहार के नतीजों से यूपी में रणनीति बना रहे हैं दिग्गज

उत्तर प्रदेश की सियासत इन दिनों बेहद गरमाई हुई है और इसका सबसे बड़ा कारण पड़ोसी राज्य बिहार में हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजे हैं। बिहार में एनडीए की प्रचंड जीत ने जहां सत्ताधारी गठबंधन के हौसले बुलंद कर दिए हैं, वहीं विपक्षी इंडिया गठबंधन में खींचतान की स्थिति पैदा हो गई है। 14 नवंबर को आए बिहार के नतीजों ने दिखा दिया कि एनडीए की एकजुटता के मुकाबले विपक्ष कमजोर साबित हुआ। एनडीए ने वहां 243 में से 202 सीटें जीतकर रिकॉर्ड कायम किया, जबकि महागठबंधन महज 35 सीटों पर सिमट गया। कांग्रेस को सिर्फ 6 सीटें मिलीं और राजद को भारी नुकसान हुआ, वह सिर्फ 25 सीटों पर सिमट गया। इसी जीत ने यूपी की 2027 की लड़ाई को पहले से कहीं ज्यादा रोचक बना दिया है, क्योंकि अब सभी दल अपनी-अपनी रणनीतियों को जमीन पर उतारने में जुट गए हैं। बिहार के नतीजों ने साबित किया है कि वोट ट्रांसफर की मजबूत कड़ी और विकास–सुशासन का मुद्दा जातीय समीकरणों पर भारी पड़ सकता है। यूपी में भी अब यह सवाल गूंज रहा है कि एनडीए का स्वरूप क्या रहेगा, इंडिया गठबंधन कितना एकजुट रह पाएगा और क्या कोई तीसरा मोर्चा नया खेल बिगाड़ेगा।
बिहार में एनडीए की जीत सिर्फ एक चुनावी जीत नहीं थी, बल्कि उसने कई पुराने राजनीतिक मिथकों को तोड़ दिया। भाजपा, जदयू, लोजपा रामविलास, हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा और राष्ट्रीय लोक मोर्चा ने मिलकर चुनाव लड़ा और करीब 80–90% सीटों पर जीत दर्ज की। सबसे अहम यह रहा कि सभी सहयोगी दलों के वोट एक-दूसरे को प्रभावी तरीके से ट्रांसफर हुए। बिहार में वीआईपी पार्टी एनडीए से अलग होकर महागठबंधन में शामिल हुई, लेकिन उसका खाता तक नहीं खुला यह यूपी के लिए बड़ा सबक है।यूपी में एनडीए के पुराने सहयोगी  अपना दल (सोनेलाल), निषाद पार्टी, राष्ट्रीय लोक दल और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी  बिहार के नतीजों के बाद ज्यादा सहज नजर आ रहे हैं। पहले जहां ओमप्रकाश राजभर और संजय निषाद जैसे नेता भाजपा पर हमलावर रहते थे, वहीं अब वे एकजुटता की बात कर रहे हैं। माना जा रहा है कि बिहार की तरह यूपी में भी भाजपा सहयोगियों को साथ रखकर चलेगी और सीट बंटवारे में कोई असंतोष होगा तो उसे पर्दे के पीछे ही सुलझा लेगी।2022 के यूपी चुनाव में एनडीए ने अपना दल को 17, निषाद पार्टी को 6 और सुभासपा को 6 सीटें दी थीं। अब बिहार की जीत के बाद छोटे दलों का दबाव कम और भाजपा की केंद्रीय नेतृत्व की पकड़ और मजबूत मानी जा रही है। यूपी में भी “80 बनाम 20” का फॉर्मूला दोहराया जा सकता है, जहां भाजपा विकास और कानून-व्यवस्था को मुख्य मुद्दा बनाएगी। बिहार में योगी आदित्यनाथ की रैलियों का असर भी यूपी में “बुलडोजर मॉडल” की लोकप्रियता को और बढ़ा रहा है।

वहीं दूसरी तरफ विपक्षी इंडिया गठबंधन में दरारें और गहरी हो रही हैं। बिहार में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद खराब रहा सिर्फ 6 सीटें मिलीं और कई जगहों पर फ्रेंडली फाइट देखने को मिली। इसका असर यूपी में भी दिख सकता है।2024 के लोकसभा चुनाव में सपा–कांग्रेस गठबंधन ने यूपी में 43 सीटें जीती थीं, जिनमें सपा को 37 और कांग्रेस को 6 सीटें मिली थीं। उस चुनाव में सपा ने कांग्रेस को 17 सीटें दी थीं, लेकिन अब सपा कांग्रेस को 30–35 सीटों से ज्यादा देने के पक्ष में नहीं दिखती। सपा का तर्क है कि 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद कमजोर था और कई सीटों पर जमानत तक जब्त हो गई थी। बिहार की हार के बाद सपा में यह आवाज तेज हो गई है कि अखिलेश यादव को ही इंडिया गठबंधन का चेहरा बनाया जाए। सपा प्रवक्ताओं का दावा है कि कांग्रेस की बारगेनिंग पावर कम हो गई है। कांग्रेस की ओर से भी सीटों का दावा बढ़ा हुआ है और उनका कहना है कि लोकसभा चुनाव में दलित और अन्य वोट उनके कारण ट्रांसफर हुए थे। ऐसे में 2027 में सीट बंटवारे को लेकर बड़ा विवाद होना तय माना जा रहा है। कांग्रेस यदि सपा से कम सीटों पर सहमत नहीं हुई, तो वह अलग लड़ने का विकल्प चुन सकती है, जिससे पीडीए पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक रणनीति कमजोर हो सकती है।

उधर तीसरे मोर्चे की सुगबुगाहट भी तेज है। बिहार में एआईएमआईएम ने 5 सीटें जीतकर मुस्लिम वोटों में सेंध लगाई और राजद के एमवाई समीकरण को तोड़ दिया। यूपी में भी असदुद्दीन ओवैसी की नजर बसपा पर है। बिहार में बसपा ने एक सीट जीती थी और वहां जीते बसपा विधायक के पोस्टर में ओवैसी की तस्वीर सामने आने के बाद चर्चा तेज है कि 2027 में बसपा और एआईएमआईएम साथ आ सकते हैं।मायावती मुस्लिम चेहरे के साथ मैदान में उतरती हैं तो दलित–मुस्लिम (DM) समीकरण दोबारा मजबूत हो सकता है। 2007 में मायावती इसी रणनीति से बहुमत की सरकार बना चुकी हैं। बिहार के नतीजों ने बसपा को नई उम्मीद दी है। ऐसा गठबंधन बनता है तो सपा के पीडीए फार्मूले को बड़ा नुकसान हो सकता है, क्योंकि यूपी में 19% मुस्लिम वोट कई क्षेत्रों में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। एआईएमआईएम पहले ही यूपी में पंचायत स्तर तक तैयारी में जुटा है और बसपा 1600 टीमों के साथ मैदान में उतरी हुई है।

बहरहाल, बिहार के ताज़ा नतीजों ने यूपी की सियासत को नया रंग दे दिया है। एनडीए एकजुट और मजबूत दिख रहा है, जबकि इंडिया गठबंधन में सीटों की रस्साकशी शुरू हो चुकी है। तीसरा मोर्चा उभरा तो चुनाव और दिलचस्प हो जाएगा। 2027 अभी दूर है, लेकिन जमीन पर हलचल तेजी से बढ़ चुकी है। जातीय समीकरण, विकास का मुद्दा और गठबंधन की मजबूती ही तय करेगा कि सत्ता की चाबी किसके हाथ लगेगी। आने वाला समय बताएगा कि बिहार की तरह यूपी में भी एकतरफा जनादेश मिलेगा या विपक्ष कोई नया दांव चला पाएगा। फिलहाल तो सभी दल बिहार से मिले संकेतों को पढ़कर अपनी-अपनी नैया पार लगाने में जुटे हैं।

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