वहीं दूसरी तरफ विपक्षी इंडिया गठबंधन में दरारें और गहरी हो रही हैं। बिहार में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद खराब रहा सिर्फ 6 सीटें मिलीं और कई जगहों पर फ्रेंडली फाइट देखने को मिली। इसका असर यूपी में भी दिख सकता है।2024 के लोकसभा चुनाव में सपा–कांग्रेस गठबंधन ने यूपी में 43 सीटें जीती थीं, जिनमें सपा को 37 और कांग्रेस को 6 सीटें मिली थीं। उस चुनाव में सपा ने कांग्रेस को 17 सीटें दी थीं, लेकिन अब सपा कांग्रेस को 30–35 सीटों से ज्यादा देने के पक्ष में नहीं दिखती। सपा का तर्क है कि 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद कमजोर था और कई सीटों पर जमानत तक जब्त हो गई थी। बिहार की हार के बाद सपा में यह आवाज तेज हो गई है कि अखिलेश यादव को ही इंडिया गठबंधन का चेहरा बनाया जाए। सपा प्रवक्ताओं का दावा है कि कांग्रेस की बारगेनिंग पावर कम हो गई है। कांग्रेस की ओर से भी सीटों का दावा बढ़ा हुआ है और उनका कहना है कि लोकसभा चुनाव में दलित और अन्य वोट उनके कारण ट्रांसफर हुए थे। ऐसे में 2027 में सीट बंटवारे को लेकर बड़ा विवाद होना तय माना जा रहा है। कांग्रेस यदि सपा से कम सीटों पर सहमत नहीं हुई, तो वह अलग लड़ने का विकल्प चुन सकती है, जिससे पीडीए पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक रणनीति कमजोर हो सकती है।
उधर तीसरे मोर्चे की सुगबुगाहट भी तेज है। बिहार में एआईएमआईएम ने 5 सीटें जीतकर मुस्लिम वोटों में सेंध लगाई और राजद के एमवाई समीकरण को तोड़ दिया। यूपी में भी असदुद्दीन ओवैसी की नजर बसपा पर है। बिहार में बसपा ने एक सीट जीती थी और वहां जीते बसपा विधायक के पोस्टर में ओवैसी की तस्वीर सामने आने के बाद चर्चा तेज है कि 2027 में बसपा और एआईएमआईएम साथ आ सकते हैं।मायावती मुस्लिम चेहरे के साथ मैदान में उतरती हैं तो दलित–मुस्लिम (DM) समीकरण दोबारा मजबूत हो सकता है। 2007 में मायावती इसी रणनीति से बहुमत की सरकार बना चुकी हैं। बिहार के नतीजों ने बसपा को नई उम्मीद दी है। ऐसा गठबंधन बनता है तो सपा के पीडीए फार्मूले को बड़ा नुकसान हो सकता है, क्योंकि यूपी में 19% मुस्लिम वोट कई क्षेत्रों में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। एआईएमआईएम पहले ही यूपी में पंचायत स्तर तक तैयारी में जुटा है और बसपा 1600 टीमों के साथ मैदान में उतरी हुई है।
बहरहाल, बिहार के ताज़ा नतीजों ने यूपी की सियासत को नया रंग दे दिया है। एनडीए एकजुट और मजबूत दिख रहा है, जबकि इंडिया गठबंधन में सीटों की रस्साकशी शुरू हो चुकी है। तीसरा मोर्चा उभरा तो चुनाव और दिलचस्प हो जाएगा। 2027 अभी दूर है, लेकिन जमीन पर हलचल तेजी से बढ़ चुकी है। जातीय समीकरण, विकास का मुद्दा और गठबंधन की मजबूती ही तय करेगा कि सत्ता की चाबी किसके हाथ लगेगी। आने वाला समय बताएगा कि बिहार की तरह यूपी में भी एकतरफा जनादेश मिलेगा या विपक्ष कोई नया दांव चला पाएगा। फिलहाल तो सभी दल बिहार से मिले संकेतों को पढ़कर अपनी-अपनी नैया पार लगाने में जुटे हैं।
