अमेरिका और भारत के बीच व्यापारिक तनाव बढ़ रहा है, जहां राष्ट्रपति ट्रंप ने पीएम मोदी पर रूसी तेल खरीद को लेकर टैरिफ थोपे हैं। ट्रंप ने स्वीकार किया कि मोदी उनसे नाराज हैं, लेकिन भारत ने चुपचाप रूसी तेल आयात कम कर दिया है। इस स्थिति पर विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप की नीति अमेरिकी हितों के विपरीत है। ट्रंप ने हाल ही में हाउस जीओपी रिट्रीट में कहा कि पीएम मोदी उनसे नाखुश हैं क्योंकि भारत को ऊंचे टैरिफ चुकाने पड़ रहे हैं, खासकर रूसी तेल खरीद के कारण। उन्होंने 25 फीसदी टैरिफ लगाए जो अब 50 फीसदी तक पहुंच चुके हैं, और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प,भारत का रूस से व्यापार पर 500 फीसदी टैरिफ की धमकी दी है। भारत ने व्यापार घाटे और रक्षा सौदों के बावजूद चुपचाप अपनी नीति जारी रखी है।
उधर, मोदी ने ट्रंप के आरोपों पर सार्वजनिक चुप्पी साधी है, लेकिन रूसी तेल आयात को काफी कम कर दिया, जो 38 फीसदी से न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया। विशेषज्ञों के अनुसार, यह भारत फर्स्ट की रणनीति का हिस्सा है, जो आत्मनिर्भरता पर जोर देती है। ट्रंप की धमकियों के बावजूद, मोदी ने अमेरिकी ऊर्जा आयात बढ़ाकर संतुलन बनाया। अमेरिकी विशेषज्ञ जॉन मीयरशाइमर ने ट्रंप की भारत नीति को ब्लैंडर कहा, जो रूसी तेल पर टैरिफ से भारत को झुकाने में विफल रहेगी। कार्नेगी एंडोमेंट के विश्लेषकों ने चेतावनी दी कि ये टैरिफ 25 वर्षों के अमेरिका-भारत संबंधों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। विपक्ष नेता राहुल गांधी ने इसे ष्आर्थिक ब्लैकमेलष् करार दिया, जबकि मनीष तिवारी ने मोदी से सीधे खड़े होकर जवाब देने को कहा। कुल मिलाकर ट्रंप मोदी को झुका नहीं पा रहे; भारत की चुप्पी और रणनीतिक कदमों ने तनाव को संभाला है। अधिक टैरिफ की धमकी के बावजूद, विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका ही अधिक नुकसान झेलेगा। यह द्विपक्षीय संबंधों में नया संतुलन स्थापित कर सकता है।
