उत्तर प्रदेश में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया के बाद करीब तीन करोड़ वोटरों के नाम कटने की उम्मीद जताई जा रही है, मुख्य रूप से समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव के बयानों के आधार पर, जो इसे भाजपा की साजिश बता रहे हैं। यह आंकड़ा वास्तविक अनुमान से ज्यादा लगता है, क्योंकि SIR का उद्देश्य फर्जी, मृत या दोहरी जगह दर्ज वोटरों को हटाना है, जिससे वोटर लिस्ट साफ-सुथरी बने। गैर-भाजपा दलों की बयानबाजी से उनके PDA (पिछड़े-दलित-अल्पसंख्यक) वोट बैंक को एकजुट करने में फायदा हो सकता है, लेकिन अगर नाम कटने की आशंका बढ़ी तो उनके समर्थकों को नुकसान भी उठाना पड़ सकता है।यह विवाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में तेजी से उभर रहा है, जहां 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले वोटर लिस्ट की सफाई को लेकर सियासी आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल पड़ा है। अखिलेश यादव ने सहारनपुर में पत्रकारों से कहा कि दो से तीन करोड़ वोट कट सकते हैं, खासकर मुस्लिम, दलित और पिछड़े इलाकों में, जहां BLO फॉर्म वितरित ही नहीं कर रहे। उन्होंने इसे नोटबंदी और कोविड जैसी परेशानी से जोड़ा, दावा किया कि भाजपा PDA की एकता से डर रही है और वोट का अधिकार छीनना चाहती है। चुनाव आयोग का कहना है कि SIR फर्जी वोटिंग रोकने के लिए जरूरी है, मृत या स्थानांतरित वोटरों को हटाने से लिस्ट पारदर्शी बनेगी, और अपील की अंतिम तारीख जैसे 11 दिसंबर तक लोग नाम जोड़ सकते हैं।
सपा प्रमुख ने मांग की है कि SIR के आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं और प्रक्रिया के लिए तीन माह का अतिरिक्त समय दिया जाए, ताकि लोग दस्तावेज जमा कर सकें। उत्तर प्रदेश में BLOs पर भारी दबाव की खबरें आ रही हैं, कुछ की मौतें तक ब्रेन हेमरेज से हो गईं, जिससे शिक्षक समुदाय में गुस्सा भड़क गया है। विपक्ष का आरोप है कि BLO मुस्लिम बहुल इलाकों में कम जा रहे, जबकि भाजपा इसे घुसपैठियों और फर्जीवाड़े पर अंकुश बताती है, जैसा बिहार में 43 लाख या 69 लाख नाम कटने के बाद हुआ। आयोग ने OTP ठगी का अलर्ट भी जारी किया है, ताकि लोग सावधान रहें।गैर-भाजपा दलों को इससे फायदा इसलिए हो सकता है, क्योंकि यह मुद्दा PDA वोटों को गोलबंद कर सकता है, जैसा बिहार या तमिलनाडु में विरोध ने दलित-मुस्लिम एकता बढ़ाई। लेकिन नुकसान भी उतना ही बड़ा है, अगर उनके समर्थकों के नाम वाकई कटे—जैसे बिहार में महागठबंधन सीटों पर 8-10 हजार वोटर कम होने से हार हुई। अखिलेश की बयानबाजी से सपा का आधार मजबूत लग रहा है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में अगर विपक्ष डेटा मांगता है तो आयोग के पक्ष में फैसला आ सकता है। कुल मिलाकर, यह सियासत ज्यादा लगती है, क्योंकि ठोस तीन करोड़ का आंकड़ा अखिलेश के दावे पर टिका है, आयोग ने इतना बड़ा अनुमान नहीं लगाया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि SIR से वोटर लिस्ट में सुधार होगा, लेकिन समय की कमी और BLO दबाव से ग्रामीण-शहरी असमानता बढ़ सकती है। तमिलनाडु में 40-50 लाख नाम कटने की बात हो रही, जहां स्टालिन सरकार विरोध कर रही। उत्तर प्रदेश में अगर नाम न कटने का डर कम हुआ तो भाजपा को फायदा, लेकिन विपक्ष की बयानबाजी से चुनावी माहौल गर्म हो गया है। अंततः, वोटरों को फॉर्म भरना या ऑनलाइन अपील करना चाहिए, क्योंकि दो जगह फॉर्म भरना गैरकानूनी है। यह प्रक्रिया लोकतंत्र की मजबूती के लिए है, लेकिन सियासी रंग ने इसे विवादास्पद बना दिया।
