आखिरी सत्र में तेजस्वी का हल्लाबोल, मतदाता सूची से लेकर अपराध तक नीतीश सरकार घिरी

बिहार विधानसभा का मॉनसून सत्र 21 जुलाई 2025 को शुरू हुआ, और पहले ही दिन से सियासी हंगामा अपने चरम पर पहुंच गया। राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के नेता और बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने इस सत्र को “लोकतंत्र की आवाज दबाने” की साजिश करार दिया। सत्र के पहले दिन की कार्यवाही में विपक्षी विधायकों ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और प्रदेश में बढ़ते अपराध के मुद्दों को लेकर जमकर हंगामा किया। तेजस्वी यादव ने सदन में और बाहर दोनों जगह अपनी तीखी प्रतिक्रिया से सत्ताधारी गठबंधन को कठघरे में खड़ा किया। उन्होंने कहा, “ये हमारा आखिरी सत्र है, और बिहार में लोकतंत्र की जननी होने के बावजूद, यहाँ लोकतंत्र को खत्म करने की कोशिश हो रही है।”बिहार में विधानसभा चुनाव अक्टूबर-नवंबर 2025 में होने वाले हैं, और इस सत्र को मौजूदा विधानसभा का अंतिम सत्र माना जा रहा है। इस सत्र में तेजस्वी यादव ने मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर सवाल उठाए, जिसे वे गरीबों और वंचित वर्गों के वोटिंग अधिकारों को छीनने की साजिश बता रहे हैं। तेजस्वी ने कहा कि निर्वाचन आयोग की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है, और यह विशेष रूप से दलितों, गरीबों और यादव बहुल इलाकों को निशाना बना रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग के दावे, जिसमें कहा गया कि 80 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं ने गणना फॉर्म जमा कर दिए हैं, पूरी तरह से कागजी और भ्रामक हैं। तेजस्वी ने इसे “लोकतंत्र पर हमला” करार देते हुए कहा कि बिहार की जनता इस साजिश को कामयाब नहीं होने देगी।सदन में हंगामे की शुरुआत तब हुई, जब माले के विधायक सत्यदेव राम ने मतदाता पुनरीक्षण के मुद्दे को उठाया। इसके बाद आरजेडी और अन्य विपक्षी विधायकों ने भी इस मुद्दे पर सरकार पर हमला बोला। विपक्षी विधायकों ने न केवल मतदाता सूची के पुनरीक्षण पर सवाल उठाए, बल्कि प्रदेश में बढ़ते अपराध को लेकर भी नीतीश सरकार को घेरने की कोशिश की। तेजस्वी ने सदन में नीतीश कुमार से हाल की आपराधिक घटनाओं पर जवाब मांगा, लेकिन हंगामे के कारण कार्यवाही बार-बार स्थगित करनी पड़ी। सदन की कार्यवाही में अव्यवस्था इतनी बढ़ गई कि विधानसभा अध्यक्ष को कई बार हस्तक्षेप करना पड़ा, लेकिन विपक्षी विधायक अपनी मांगों पर अड़े रहे।

तेजस्वी ने सत्र के बाद स्पीकर के चैंबर के बाहर भी विरोध प्रदर्शन किया। विपक्षी विधायकों ने “नीतीश कुमार गद्दी छोड़ो” के नारे लगाए, जिससे सियासी माहौल और गर्म हो गया। तेजस्वी ने कहा कि कार्यमंत्रणा समिति की बैठक बुलाई जानी चाहिए ताकि मतदाता पुनरीक्षण पर विस्तार से चर्चा हो सके। उन्होंने निर्वाचन आयोग पर आरोप लगाया कि वह बीजेपी और नीतीश सरकार के इशारे पर काम कर रहा है। तेजस्वी ने दावा किया कि बिहार में 2020 के विधानसभा चुनाव में कई सीटें ऐसी थीं, जहां महागठबंधन 3,000 वोटों से कम के अंतर से हारा था। अगर एक बूथ से 10 नाम भी काटे जाते हैं, तो एक विधानसभा क्षेत्र से 3,200 वोटर कम हो सकते हैं, जो चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकता है।तेजस्वी ने पहले भी 9 जुलाई को मतदाता सूची के अपडेशन के खिलाफ चक्का जाम का ऐलान किया था। उन्होंने निर्वाचन आयोग से मांग की थी कि इस प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए एक सार्वजनिक डैशबोर्ड तैयार किया जाए। उनके मुताबिक, बिहार में बाढ़ की स्थिति और प्रवासी मजदूरों की अनुपस्थिति के कारण यह प्रक्रिया और भी जटिल हो गई है। तेजस्वी ने यह भी आरोप लगाया कि मतदाता सूची में सुधार के लिए मांगे जा रहे दस्तावेज, जैसे माता-पिता का जन्म प्रमाण पत्र, गरीब तबके के पास उपलब्ध नहीं हैं। उन्होंने इसे एक सुनियोजित साजिश बताते हुए कहा कि इसका मकसद गरीबों और वंचितों को मतदान से वंचित करना है।

इस सत्र में एक और चर्चा का केंद्र रहा तेजस्वी यादव और उनके बड़े भाई तेज प्रताप यादव के बीच का रिश्ता। मई 2025 में लालू प्रसाद यादव ने तेज प्रताप को आरजेडी और परिवार से निष्कासित कर दिया था। इसके बावजूद, विधानसभा की सीटिंग व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं किया गया, और तेज प्रताप को तेजस्वी के बगल में ही बैठने की जगह दी गई। हालांकि, सत्र के पहले दिन तेज प्रताप सदन में नहीं पहुंचे, जिससे पत्रकारों और नेताओं को निराशा हुई। लोग यह देखने के लिए उत्सुक थे कि क्या दोनों भाई एक फ्रेम में साथ नजर आएंगे। तेज प्रताप की अनुपस्थिति ने सियासी गलियारों में नई अटकलों को जन्म दिया। कुछ का मानना है कि यह पारिवारिक विवाद का नतीजा हो सकता है, जबकि कुछ इसे रणनीतिक कदम मान रहे हैं।बिहार में बढ़ते अपराध भी इस सत्र में विपक्ष का प्रमुख मुद्दा रहे। तेजस्वी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा, “ताजा अपराध! बेखौफ अपराधी! पटना में वकील को गोली मारी, वैशाली में लड़की की हत्या, परसा में शिक्षक की गोली मारकर हत्या। मुख्यमंत्री बीमार, प्रदेश लाचार!” उनकी यह टिप्पणी नीतीश सरकार की कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाती है। तेजस्वी ने दावा किया कि बिहार में अपराधियों का मनोबल इतना बढ़ गया है कि वे दिनदहाड़े हत्याएं कर रहे हैं, और सरकार मूकदर्शक बनी हुई है।

सत्ताधारी गठबंधन ने भी तेजस्वी के आरोपों का जवाब देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी ने विपक्ष को “कामचोर” और “जमीन पर काम न करने वाला” करार दिया। उन्होंने तेजस्वी और राहुल गांधी को “राजकुमार” कहकर तंज कसा और कहा कि इन नेताओं को लोकतंत्र में विश्वास नहीं है। बीजेपी नेता नितिन नवीन ने तेज प्रताप के निष्कासन को “राजनीतिक स्टंट” बताया और कहा कि लालू परिवार की अंदरूनी कलह का बिहार की जनता से कोई लेना-देना नहीं है।इस सत्र में तेजस्वी ने न केवल सरकार को घेरने की कोशिश की, बल्कि अपनी पार्टी को भी मजबूत करने का संदेश दिया। उन्होंने हाल ही में आरजेडी के सदस्यता अभियान को गति देने के लिए समीक्षा बैठक की थी, जिसमें उन्होंने कार्यकर्ताओं से 2025 के विधानसभा चुनाव में महागठबंधन की जीत सुनिश्चित करने की अपील की। तेजस्वी ने दावा किया कि बिहार की जनता बदलाव चाहती है, और आरजेडी के नेतृत्व में नई सरकार बनेगी।

बिहार विधानसभा का यह सत्र कई मायनों में महत्वपूर्ण है। यह न केवल मौजूदा सरकार और विपक्ष के बीच टकराव का मंच बना, बल्कि लालू परिवार की अंदरूनी सियासत को भी उजागर करता है। तेजस्वी यादव की मुखरता और उनके द्वारा उठाए गए मुद्दों ने साफ कर दिया कि वे बिहार की सियासत में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। दूसरी ओर, सत्ताधारी गठबंधन भी विपक्ष के हमलों का जवाब देने के लिए तैयार है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, बिहार का सियासी पारा और गर्म होने की संभावना है।यह सत्र न केवल बिहार की जनता, बल्कि पूरे देश की नजरों में है। तेजस्वी यादव ने जिस तरह से लोकतंत्र और मतदाता अधिकारों के मुद्दे को उठाया है, वह आने वाले दिनों में और चर्चा में रहेगा। क्या विपक्ष अपनी मांगों को मनवाने में कामयाब होगा, या सत्ताधारी गठबंधन अपनी स्थिति को और मजबूत करेगा? इसका जवाब शायद समय ही देगा।

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