बीस साल बाद फिर मायावती का दलित-ब्राह्मण-मुस्लिम गठजोड़ फार्मूला

उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी करीब 15 सालों से सत्ता से बाहर है। 2007 से 2012 तक सत्ता में रही बसपा को पिछले तीन विधानसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा है। इस दौरान तीन लोकसभा चुनाव में भी बसपा का प्रदर्शन बेहद खराब रहा। इसके बाद से बसपा सुप्रीमो मायावती के बारे में यह धारणा आम तौर पर बनने लगी कि बसपा सुप्रीमो मायावती का कालखंड खत्म हो चुका है। ऐसा इस लिये भी कहा जा रहा था क्योंकि मायावती ने चुनाव प्रचार से भी काफी हद तक किनारा कर लिया था।बात अंतिम बार 2007 में विधानसभा चुनाव जीती बसपा की उस समय की चुनावी रणनीति की की जाये तो 2007 का चुनाव मायावती सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले से जीती थी। 2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी की अप्रत्याशित जीत ने राजनीतिक इतिहास रच दिया। 2007 में मायावती ने सामाजिक समीकरण साधकर 403 सीटों में से 206 सीटों पर कब्जा जमाया और कुल 30.43 प्रतिशत वोट हासिल किए। बसपा सुप्रीमो की यह जीत दलितों के परंपरागत वोट बैंक के अलावा ब्राह्मणों और कुछ गैर-यादव पिछड़ी जातियों तथा मुस्लिम मतदाताओं के समर्थन से संभव हुई थी। यह और बात है कि इसके बाद मायावती का यह फार्मूला दोबारा परवान नहीं चढ़ पाया।

बहरहाल, अबकी करीब 20 सालों के बाद एक बार फिर 2027 के विधानसभा चुनाव के लिये बसपा के पक्ष में दलितों के साथ ब्राह्मणों एवं मुसलमानों के वोटों की गोलबंदी देखी जा रही है। ब्राह्मणों और मुसलमानों के एक बार फिर बसपा की तरफ रुख करने की वजह में जाया जाए तो ऐसा लगता है कि योगी राज में ब्राह्मणों को लग रहा है कि उनके साथ यह सरकार नाइंसाफी कर रही है। नौकरशाही से लेकर सरकार तक में महत्वपूर्ण पदों से ब्राह्मणों को दूर रखा गया है। यही वजह है कि पिछले कुछ समय में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) में ब्राह्मण नेताओं का प्रवेश अधिक देखा गया है।जनवरी 2026 में अंबेडकर नगर से भाजपा के दिग्गज नेता राधेश्याम पांडे 51-100 ब्राह्मण समर्थकों के साथ बसपा में शामिल हुए। उन्होंने मायावती से मुलाकात कर पार्टी जॉइन की। दिसंबर 2025 में ब्राह्मण समाज के बड़े नेता जैसे जितेंद्र मिश्रा, दीपक द्विवेदी, नीरज पांडे, विशाल मिश्रा, वैभव दुबे, अनुराग शुक्ला, मोहित शर्मा भाजपा से बसपा में शामिल हुए। यह 2027 चुनाव से पहले भाजपा को झटका था। जनवरी 2026 में एक अन्य बड़े ब्राह्मण नेता ने मायावती से मुलाकात कर बसपा जॉइन की।

वहीं मुसलमान इसलिये बसपा की तरफ फिर से मुड़ता दिख रहा है क्योंकि उसे लगने लगा है कि समाजवादी पार्टी मुसलमानों से वोट तो लेती है, लेकिन उनका (मुसलमानों का) हक उन्हें नहीं दिया जाता है। इसी तरह से मुसीबत के समय भी अखिलेश मुसलमानों से दूरी बना लेते हैं। पार्टी के दिग्गज नेता आजम खान को अकेला छोड़ देना इसकी सबसे बड़ी मिसाल बताते हैं। बाहुबली अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी की भी मौत के लिये मुस्लिम समाज कहीं न कहीं अखिलेश यादव को जिम्मेदार मानते हैं। उन्हें लगता है कि विधानसभा सत्र के दौरान अखिलेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अतीक और मुख्तार को लेकर उकसाया नहीं होता तो आज वह जिंदा होते।दलित वोटरों ने बसपा को पूर्ण समर्थन दिया। जाटव समुदाय के 86 प्रतिशत मतदाताओं ने मायावती को चुना, जबकि वाल्मीकि जाति के 71 प्रतिशत ने पार्टी को तरजीह दी। पासी समुदाय से 53 प्रतिशत और अन्य अनुसूचित जातियों से 58 प्रतिशत वोट बसपा के खाते में आए। इन दलित उपजातियों की मजबूत पकड़ ने पार्टी को आधार प्रदान किया, क्योंकि दलित उत्तर प्रदेश की आबादी में करीब 21 प्रतिशत हैं। ऊपरी जातियों में ब्राह्मणों का 16 प्रतिशत समर्थन मिला, जो निर्णायक साबित हुआ। बसपा ने 51 ब्राह्मण उम्मीदवार उतारे, जिनमें से 20 जीते, लेकिन यह जीत मुख्यतः निचली जातियों के वोटों से आई। ठाकुरों और अन्य ऊपरी जातियों ने भी सीमित लेकिन महत्वपूर्ण योगदान दिया।

पिछड़ी जातियों ने भी बसपा की ओर रुख किया। गैर-यादव और गैर-कुर्मी अन्य पिछड़ा वर्ग के 30 प्रतिशत मतदाताओं ने पार्टी चुनी। कुल पिछड़ा वर्ग के कई खंडों से वोट उमड़े, जिसने सामाजिक समीकरण को मजबूत बनाया। बसपा ने 110 पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवार मैदान में उतारे। यह समर्थन समाजवादी पार्टी और अन्य दलों से छिटके वोटरों का परिणाम था, जो विकास और सुशासन के वादों से प्रभावित हुए।मुस्लिम मतदाताओं का योगदान सबसे चमत्कारिक रहा। 2007 में बसपा को कुल वोटों में मुस्लिम वोट 10 प्रतिशत से अधिक थे। एक सर्वे के अनुसार 17 प्रतिशत मुस्लिमों ने पार्टी को समर्थन दिया। पार्टी ने 61 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे, जिनमें से 29 विधायक बने। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी 19 प्रतिशत होने के बावजूद यह समर्थन बहुमत के लिए जरूरी साबित हुआ। समाजवादी पार्टी से नाराज मुस्लिमों ने बसपा को मौका दिया, क्योंकि मायावती ने अल्पसंख्यक कल्याण के वादे किए।

मायावती की रणनीति ने जातिगत बंधनों को तोड़ा। दलित-ब्राह्मण गठजोड़ की बात भले ही प्रचारित हुई, लेकिन वास्तव में जाटव, वाल्मीकि, पासी जैसे दलितों के साथ अन्य अनुसूचित जातियां, पिछड़े वर्ग के 30 प्रतिशत, ब्राह्मणों के 16 प्रतिशत और मुस्लिमों के 17 प्रतिशत वोटों ने चमत्कार रचा। बसपा का वोट प्रतिशत 2002 के 23 से बढ़कर 30 हो गया। पार्टी ने प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलनों से ऊपरी जातियों को लुभाया, जबकि मुस्लिम बहुल सीटों पर मजबूत प्रदर्शन किया। यह जीत सामाजिक न्याय की मिसाल बनी।मायावती ने सत्ता में आकर अपराध पर अंकुश लगाया और विकास कार्य तेज किए। लेकिन जातिगत समीकरण की बारीकी ने राजनीति को नया आयाम दिया। दलितों का कोर वोट 80-86 प्रतिशत तक रहा, ऊपरी जातियों से 16-20 उम्मीदवार जीते, पिछड़ों से 30 प्रतिशत समर्थन और मुस्लिमों के 17 प्रतिशत ने पूर्ण बहुमत सुनिश्चित किया।

बसपा सुप्रीमो मायावती किस तरह से पंडित कार्ड खेल रही हैं, इसका ताजा उदाहरण यह बताता है कि उनका ब्राह्मणों के प्रति झुकाव बढ़ता जा रहा है। मायावती ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नये नियमों को लेकर सवर्णों, विशेषकर ब्राह्मणों की नाराजगी के बाद से चल रही राजनीति पर और इसके बाद बॉलीवुड फिल्म ‘घूसखोर पंडित’ के खिलाफ ब्राह्मणों के पक्ष में बयान देने में देरी नहीं की।इससे पहले यूजीसी के नये नियम पर संयमित प्रतिक्रिया देते हुए मायावती ने कहा था कि इस नये कानून से किसी को बिना वजह प्रताड़ित नहीं किया जाये। देश भर में ‘घूसखोर पंडित’ फिल्म के विरोध के बीच बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने फिल्म पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर ब्राह्मण कार्ड खेल दिया है। वहीं यूजीसी प्रकरण में असहज हुई भाजपा भी अब फिल्म के मुद्दे पर ब्राह्मणों को साधने की कोशिश में है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने फिल्म पर एफआईआर के निर्देश देकर इस वर्ग के साथ का संदेश दिया।

बसपा प्रमुख ने इस मामले में शुक्रवार 06 फरवरी को एक्स पर लिखा, ‘यह बड़े दुख व चिंता की बात है कि पिछले कुछ समय से अकेले यूपी में ही नहीं, बल्कि अब तो फिल्मों में भी ‘पंडित’ को घुसपैठिया बताकर पूरे देश में जो इनका अपमान व अनादर किया जा रहा है, जिससे समूचे ब्राह्मण समाज में इस समय जबरदस्त रोष व्याप्त है। इसकी हमारी पार्टी भी कड़े शब्दों में निंदा करती है। इस जातिसूचक फिल्म पर केंद्र सरकार को तुरंत प्रतिबंध लगाना चाहिए, यह बसपा की मांग है।’वर्ष 2007 में बसपा ने ब्राह्मणों के साथ सोशल इंजीनियरिंग का दांव चला था और बहुमत की सरकार बनाई थी। इस बार भी बसपा उसी फार्मूले पर चुनावी तैयारी में जुटी है और पार्टी प्रमुख के एक्स पोस्ट को उसी रणनीति को आगे बढ़ाने का संकेत माना जा रहा है।

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