Global Minerals Conference: भारत को आमंत्रण, पाकिस्तान को अमेरिका ने ठुकराया भू-रणनीति में बड़ा झटका

India Pakistan News: अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन में होने वाले ग्लोबल मिनरल्स कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेने के लिए विदेश मंत्री एस जयशंकर अमेरिका में हैं. दिलचस्प बात ये है कि इस मीटिंग में पाकिस्तान को आमंत्रित नहीं किया है. यह फैसला अहम इसलिए है क्योंकि ऐसे समय में आया है, जब पाकिस्तान पिछले कई महीनों से अमेरिका को अपने रेयर-अर्थ मिनरल्स के सैंपल दिखाकर आकर्षित कर रहा है. मुनीर और शहबाज दोनों ही सेल्समैन की तरह सूटकेस में भरकर ये खजाना ले गए थे, जो किसी काम नहीं आया.पिछले साल पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर खुद व्हाइट हाउस जाकर तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रेयर-अर्थ मिनरल्स का एक बॉक्स भेंट कर चुके हैं. इसे अमेरिका को यह संकेत देने की कोशिश माना गया था कि पाकिस्तान वैश्विक खनिज बाजार में अहम भूमिका निभाना चाहता है. पाकिस्तान लगातार ये दावा कर रहा था कि उसके पास दुर्लभ खनिज भंडार मौजूद हैं और अमेरिका के लिए एक सप्लायर बन सकता है.

मुनीर-शहबाज की चापलूसी भी नहीं आई काम
पाकिस्तान ने लगातार यह दावा कर रहा है कि उसके पास रेयर-अर्थ समेत कई रणनीतिक खनिजों का बड़ा भंडार है और वह चीन पर निर्भरता कम करने की अमेरिकी कोशिशों में एक वैकल्पिक सप्लायर बन सकता है. सेना प्रमुख आसिम मुनीर और अन्य अधिकारियों ने कई मंचों पर पाकिस्तान की खनिज क्षमता को उजागर किया और अमेरिकी माइनिंग कंपनियों के साथ साझेदारी की बात भी रखी. इन तमाम कोशिशों के बावजूद पाकिस्तान को सम्मेलन में जगह नहीं मिली, जबकि भारत को इसमें आमंत्रित किया गया है. इससे साफ है कि यह मामला सिर्फ खनिज संसाधनों का नहीं है.

पाकिस्तान को दिया अमेरिका ने दिया झटका
पाकिस्तान, अमेरिका के साथ दशकों पुराने सुरक्षा-केंद्रित रिश्तों से हटकर आर्थिक और भू-रणनीतिक साझेदारी की ओर बढ़ना चाहता है. पाकिस्तान का दावा है कि उसके पास करीब 6 ट्रिलियन डॉलर के खनिज संसाधन हैं और उसने अमेरिकी कंपनी यूएस स्ट्रैटेजिक मेटल्स के साथ 50 करोड़ डॉलर का समझौता भी किया है. हालांकि, अमेरिका की नजर में पाकिस्तान की सबसे बड़ी समस्या उसकी विश्वसनीयता है. अमेरिकी नीति निर्माता किसी भी खनिज साझेदारी में राजनीतिक स्थिरता, नीतियों की निरंतरता और लंबे समय तक परियोजनाएं पूरी करने की क्षमता को अहम मानते हैं. पाकिस्तान में बार-बार सरकारों का बदलना, सिविल-मिलिट्री तनाव और निवेश सुरक्षा को लेकर अनिश्चितता, अमेरिका के भरोसे को कमजोर करती रही है. यही वजह मानी जा रही है कि तमाम कोशिशों के बावजूद पाकिस्तान इस अहम वैश्विक सम्मेलन से बाहर रह गया.

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