उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पिछले नौ वर्षों से दिन-रात एक कर प्रदेश को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का दावा करते हैं। उनकी मेहनत देखने लायक है सड़कें, पुल, एक्सप्रेसवे, निवेशक सम्मेलन और कल्याणकारी योजनाओं का दौर चला ही है। लेकिन इस चमक-दमक के पीछे एक कड़वी सच्चाई छिपी है। नौकरशाही, यानी ब्यूरोक्रेसी, उनकी मेहनत पर लगातार पानी फेर रही है। कागजों पर तो यूपी दुनिया का सबसे मजबूत राज्य बन चुका है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयान करती है। सरकारी योजनाओं का लाभ आम जनता तक पहुंच ही नहीं पा रहा। लालफीताशाही, भ्रष्टाचार और उदासीनता ने योगी के सपनों को बौना बना दिया है। आइए, कुछ ठोस उदाहरणों से इस विडंबना को समझें।
लखनऊ के बाशिंदों को याद होगा मुख्यमंत्री आवास योजना। योगी जी ने 2017 में ही इसे लॉन्च किया था, वादा था कि गरीबों को पक्के मकान मिलेंगे। कागजों पर लाखों आवास स्वीकृत हो चुके हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर क्या हाल है। लखनऊ के गोमती नगर विस्तार और चिनहट इलाकों में सैकड़ों लाभार्थी आज भी खुले आसमान तले सोते हैं। एक बुजुर्ग महिला, राधा देवी, ने बताया साहब, फॉर्म भरा था, सर्वे हुआ, लेकिन तीन साल हो गए, न ईंट लगी न छत। अफसर कहते हैं फंड नहीं आया। विभागीय आंकड़ों के मुताबिक, 2025 तक 10 लाख आवास बनाने का लक्ष्य था, लेकिन केवल 40 फीसदी ही पूरे हुए। बाकी पर फाइलें धूल खा रही हैं। ब्यूरोक्रेसी का खेल साफ है टेंडर प्रक्रिया में कमीशनबाजी, ठेकेदारों की मनमानी और अफसरों की मिलीभगत। योगी जी की मेहनत रेंग रही है, जबकि नौकरशाह आराम फरमा रहे हैं।
एक और तगड़ा उदाहरण है पीएम आवास योजना ग्रामीण का। पूर्वांचल के गोरखपुर और आजमगढ़ जैसे जिलों में ग्रामीण आज भी कीचड़ भरे झोपड़ियों में रहते हैं। योगी सरकार ने दावा किया कि 2024–25 में 5 लाख नए आवास बनेंगे, लेकिन जमीनी जांच में पाया गया कि 60 फीसदी योजनाएं अधर में लटकी हैं। क्यों। क्योंकि जिला मजिस्ट्रेट और ब्लॉक डेवलपमेंट अफसर फाइलों को क्लियर करने में आलस दिखाते हैं। एक सर्वे में सामने आया कि लाभार्थियों को लिस्ट में नाम डलवाने के लिए 5–10 हजार रुपये रिश्वत देनी पड़ती है। गोरखपुर के एक गांव में 200 परिवारों ने सामूहिक धरना दिया, लेकिन डीएम साहब ने मीटिंग बुलाई और आंकड़े दिखाकर केस क्लोज कर दिया। योगी जी हवाई जहाज से गांव-गांव घूमते हैं, लेकिन उनके नीचे के अफसर जमीनी सच्चाई को दबा देते हैं। नतीजा। कागजों पर 100 फीसदी लक्ष्य हासिल, जमीनी हकीकत में जनता का विश्वास टूटा।
स्वास्थ्य क्षेत्र में भी यही कहानी दोहराई जा रही है। आयुष्मान भारत योजना के तहत योगी जी ने करोड़ों गरीबों को मुफ्त इलाज का वादा किया। लखनऊ के बलरामपुर अस्पताल में हाल ही में एक मरीज, रामू पासवान, की मौत हो गई। कारण। आयुष्मान कार्ड बना था, लेकिन अस्पताल ने भर्ती करने से इनकार कर दिया, कहा फंड नहीं मिला। राज्य सरकार के आंकड़े कहते हैं 2 करोड़ से ज्यादा कार्ड बने, लेकिन उपयोग दर महज 30 फीसदी। क्यों। क्योंकि निजी अस्पताल अफसरों के इशारे पर नाम का गेम खेलते हैं। एक आरटीआई से खुलासा हुआ कि स्वास्थ्य विभाग के 40 फीसदी अधिकारी पद रिक्त हैं या ट्रांसफर-पोस्टिंग के चक्कर में व्यस्त हैं। योगी जी ने मुख्यमंत्री जन आरोग्य योजना भी शुरू की, लेकिन ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों पर डॉक्टर गायब हैं। बरेली के एक सीएचसी में मरीजों को 50 किलोमीटर दूर भटकना पड़ता है। ब्यूरोक्रेसी यहां भी फेल साबित हो रही है फाइलें साफ हैं, लेकिन दवाइयां गायब हैं।
कृषि क्षेत्र में पीएम किसान सम्मान निधि का मामला तो हद पार कर गया। योगी सरकार ने दावा किया कि हर किसान को 6 हजार रुपये सालाना मिल रहे हैं। लेकिन बुंदेलखंड के जालौन और हमीरपुर में हजारों किसान आज भी इंतजार कर रहे हैं। एक किसान नेता ने बताया आधार लिंकिंग हो गई, लेकिन बैंक में पैसे नहीं आते। अफसर कहते हैं सॉफ्टवेयर गड़बड़ है। 2025 के आंकड़ों में 80 लाख किसानों को लाभ पहुंचा बताया गया, लेकिन वास्तव में 50 लाख ही मिले। बाकी का पैसा कहां गया। विभागीय अफसरों के खाते में ब्याज कमा रहा है। योगी जी की मेहनत से फसल खरीद केंद्र बने, लेकिन भुगतान में देरी से किसान कर्जदार बने। नौकरशाही का जाल इतना जटिल है कि छोटा किसान फंस जाता है।
शिक्षा के क्षेत्र में भी यही ढर्रा है। मुख्यमंत्री बाल सेवा योजना और स्कूलों का कायाकल्प कागजों पर शानदार। लेकिन लखनऊ के ट्रांसपोर्ट नगर के सरकारी स्कूल में बच्चे बिना बेंच के बैठते हैं। शिक्षक अनुपस्थित रहते हैं, क्योंकि ब्यूरोक्रेसी उन्हें ट्रांसफर के लालच में भटकाती है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, 30 फीसदी प्राइमरी स्कूलों में शिक्षकों की कमी है। योगी जी ने डिजिटल शिक्षा की बात की, लेकिन ग्रामीण बच्चों के पास स्मार्टफोन नहीं हैं। नतीजा। ड्रॉपआउट रेट बढ़ा है।
ये उदाहरण साबित करते हैं कि योगी आदित्यनाथ की मेहनत सच्ची है, लेकिन ब्यूरोक्रेसी उनका साथ नहीं दे रही। कागजों पर आंकड़े चमकते हैं जीडीपी ग्रोथ 8 फीसदी, निवेश 10 लाख करोड़ लेकिन जमीनी जनता भूखी-प्यासी है। लालफीताशाही ने योजनाओं को बंधक बना लिया है। भ्रष्टाचार, जवाबदेही की कमी और राजनीतिक दबाव ने नौकरशाहों को बेलगाम कर दिया है। योगी जी को अब सख्त कदम उठाने होंगे ट्रांसफर-पोस्टिंग बंद करें, ई-गवर्नेंस को सशक्त बनाएं और फील्ड लेवल पर मॉनिटरिंग बढ़ाएं। वरना, उनकी मेहनत व्यर्थ चली जाएगी। उत्तर प्रदेश का आम आदमी आज भी वही कह रहा है साहब, कागजों से पेट नहीं भरता। जमीनी हकीकत बदलनी होगी, तभी योगी मॉडल चमकेगा।
