यूजीसी के नए इक्विटी नियमों को लेकर देश में उठी बहस अब संवैधानिक स्तर पर पहुंच गई है। सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों की धारा 3C को लेकर गंभीर आपत्ति जताते हुए इसकी भाषा पर सवाल खड़े किए और फिलहाल इस पर रोक लगाने का रुख अपनाया है। अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया नियमों की भाषा अस्पष्ट है और इसका गलत इस्तेमाल होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। इसी के साथ केंद्र सरकार को निर्देश दिया गया है कि वह विशेषज्ञों और प्रतिष्ठित व्यक्तियों की एक समिति गठित करे, जो इन नियमों की समीक्षा कर सके और यह सुनिश्चित करे कि समाज में किसी भी वर्ग के साथ भेदभाव न हो। इस मामले में दायर जनहित याचिका में कहा गया है कि नियमों की धारा 3C में भेदभाव की परिभाषा केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग तक सीमित कर दी गई है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इससे सामान्य वर्ग के छात्रों और शिक्षकों को सुरक्षा और शिकायत निवारण की व्यवस्था से बाहर कर दिया गया है। उनका कहना है कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 19 के खिलाफ है, क्योंकि ये अनुच्छेद सभी नागरिकों को समानता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देते हैं। शिक्षा जैसे क्षेत्र में अगर किसी वर्ग को अलग रखकर नियम बनाए जाएंगे, तो यह समाज में दूरी बढ़ाने वाला कदम होगा।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि किसी भी विनियमन का उद्देश्य समाज को जोड़ना होना चाहिए, न कि उसे नए खांचों में बांटना। उन्होंने कहा कि जब नियमों की भाषा स्पष्ट नहीं होती, तो उसका दुरुपयोग भी आसान हो जाता है। इसी वजह से अदालत ने केंद्र सरकार से कहा कि वह इस मामले की गंभीरता को देखते हुए एक समिति बनाए, जो नियमों की भाषा और उसके प्रभाव का परीक्षण करे। न्यायमूर्ति बागची ने भी कहा कि संविधान का अनुच्छेद 15(4) राज्यों को अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए विशेष प्रावधान बनाने की अनुमति देता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी दूसरे वर्ग को पूरी तरह बाहर कर देना उचित है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत को ऐसी स्थिति की ओर नहीं बढ़ना चाहिए, जहां अलग-अलग वर्गों के लिए अलग-अलग शैक्षणिक व्यवस्थाएं बन जाएं।अदालत में यह मुद्दा भी उठा कि कुछ राजनीतिक बयानों के कारण यह संदेश गया है कि सामान्य वर्ग के छात्रों को अधिक शुल्क देना पड़ेगा या उनके लिए सुविधाएं कम होंगी। इससे भ्रम और असंतोष बढ़ा है। एक वकील ने यह उदाहरण भी दिया कि अगर कोई सामान्य वर्ग का छात्र किसी कॉलेज में उत्पीड़न या रैगिंग का शिकार होता है, तो नए नियमों में उसके लिए स्पष्ट उपचार नहीं दिखता। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने सवाल उठाया कि क्या सामान्य वर्ग इन नियमों के तहत कवर नहीं होता, जिस पर जवाब मिला कि मौजूदा परिभाषा में नहीं।
यूजीसी ने इन नए नियमों को 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित किया था। इनका घोषित उद्देश्य यह था कि उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति, धर्म, लिंग, जन्मस्थान और विकलांगता जैसे आधारों पर होने वाले भेदभाव को रोका जाए। इसके तहत हर विश्वविद्यालय और कॉलेज में समान अवसर केंद्र और इक्विटी समिति बनाने का प्रावधान किया गया है। इन समितियों में विभिन्न सामाजिक वर्गों के प्रतिनिधियों को शामिल करने की बात कही गई है, ताकि शिकायतों का समाधान किया जा सके। यूजीसी का दावा है कि पिछले कुछ वर्षों में विश्वविद्यालयों में भेदभाव से जुड़ी शिकायतों में वृद्धि हुई है और इन्हीं आंकड़ों को ध्यान में रखते हुए यह नियम लाए गए हैं।हालांकि, इन नियमों की मंशा और उनकी व्याख्या को लेकर मतभेद साफ दिखाई दे रहे हैं। देश के कई हिस्सों में छात्रों और संगठनों ने इन नियमों के खिलाफ प्रदर्शन किए हैं। उनका कहना है कि यह व्यवस्था सामाजिक न्याय के नाम पर एक नए तरह का भेदभाव पैदा कर रही है। दूसरी ओर, कुछ समूह इन नियमों को जरूरी सुधार मानते हैं और कहते हैं कि लंबे समय से वंचित वर्गों को संरक्षण देना समय की मांग है।
सुप्रीम कोर्ट ने प्रारंभिक सुनवाई के बाद यह भी स्पष्ट कर दिया है कि इस मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी। इस तारीख को अदालत नियमों की संवैधानिकता, उनकी भाषा की स्पष्टता और उनके सामाजिक प्रभाव पर विस्तार से विचार करेगी। तब तक केंद्र सरकार से अपेक्षा की गई है कि वह समिति गठित कर अपनी रिपोर्ट या रुख स्पष्ट करे। अदालत ने यह संकेत भी दिया है कि वह समानता के अधिकार की कसौटी पर इन नियमों को परखेगी और यह देखा जाएगा कि क्या यह वर्गीकरण उचित है या नहीं।यह विवाद केवल एक नियम या एक धारा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस बड़े सवाल से जुड़ा है कि शिक्षा व्यवस्था में समानता का अर्थ क्या है और सामाजिक न्याय को कैसे लागू किया जाए। सुप्रीम कोर्ट की रोक और 19 मार्च की अगली सुनवाई ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय बहस का केंद्र बना दिया है। अब सभी की निगाहें इस पर टिकी हैं कि अदालत का अंतिम रुख क्या होगा और क्या यूजीसी के इक्विटी नियमों में बदलाव किया जाएगा या उन्हें उसी रूप में लागू किया जाएगा।
