विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के एक नए नियम ने उच्च शिक्षा संस्थानों ही नहीं समाज में भी ‘आग’ लगा दी है। बीजेपी अभी तक जिस हिन्दू समाज को एकजुट करने के लिये बड़े-बड़े कार्यक्रम चला रही थी। सबको एक मंच पर लाने की कोशिश कर रही थी,उसके सामने यूजीसी ने ऐसा ‘धर्म संकट’ पैदा कर दिया है जिसके एक तरफ खाई तो दूसरी तरफ कुंआ है। हिन्दू समाज अगड़े-पिछड़ो में बंट कर एक-दूसरे के खिलाफ सड़क पर उतर आयें हैं। ऐसे में सरकार समाज के एक को साधती है तो दूसरा वर्ग नाराज हो जाता है,दूसरे को साधती है तो पहला नाराज हो जाता है। वैसे तो यूजीसी ने नये नियम बनाते हुए इससे जातिगत भेदभाव रोकने का दावा किया है, लेकिन इसी नियम ने सवर्ण छात्रों के लिए इसे खतरा बताते हुए हिन्दुओं में अगड़े-पिछड़ों के बीच नई दरार पैदा कर दी है।वैसे यह नियम सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बने हैं,लेकिन यह नियम सुप्रीम कोर्ट की मंषा के कितना अनुरूप हैं यह चर्चा का गरमागरम मुद्दा बन गया है। बहरहाल, ऐसा लगता है कि यूजीसी के ये नियम समाजवादी पार्टी को राजनीतिक लाभ दे सकते हैं जबकि भाजपा को नुकसान पहुंचाने की आशंका है। वहीं कुछ बुद्धिजीवी यह भी मानते हैं कि बीजेपी ने दलितों और पिछड़ों की बड़ी आबादी को अपने पक्ष में करने के लिये नये बदलाव किये थे,क्यों कि यह मानकर चला जा रहा था कि सवर्ण मतदाताओं के सामने बीजेपी के अलावा कहीें और जाने का रास्ता नहीं है। उधर, इस मुद्दे पर चल रहे आंदोलन तेज होते जा रहे हैं। वहीं यूजीसी के नये नियम और माघ मेला विवाद के बाद सुर्खियों में आये शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के अपमान को लेकर उत्तर प्रदेश के जिला बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने अपने पद तक से त्यागपत्र दे दिया और आंदोलन पर उतर आये।
पहले बात विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के उस नियम की जिसे उसने 13 जनवरी 2026 को उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता बढ़ावा देने वाला नया नियम बताते हुए जारी किए, जो 15 जनवरी से सभी मान्यता प्राप्त कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में लागू भी हो गए। इन नियमों का उद्देश्य कैंपसों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों के साथ होने वाले कथित भेदभाव को समाप्त करना बताया गया है। हर संस्थान को समान अवसर केंद्र स्थापित करना अनिवार्य कर दिया गया, जिसमें समता समिति बनेगी जो शिकायतों का निपटारा करेगी। लेकिन इन नियमों ने सवर्ण छात्रों में भय पैदा कर दिया क्योंकि भेदभाव की परिभाषा में केवल इन्हीं वर्गों को पीड़ित माना गया है, जबकि सवर्णों को संभावित अत्याचारी ठहराया जा सकता है। झूठी शिकायतों पर कोई सजा न होने से दुरुपयोग की आशंका बढ़ गई।
सवाल यह है कि यूजीसी के सामने ऐसी क्या आवश्यकता थी इन नियमों की, यह प्रश्न इसलिये उठा क्योंकि पहले से ही भेदभाव रोकने के उपाय मौजूद थे। आलोचकों का कहना है कि ड्राफ्ट में अन्य पिछड़ा वर्ग को शामिल न करने पर आपत्ति हुई तो अंतिम रूप में जोड़ दिया गया, जिससे सामान्य वर्ग के छात्र उच्च कटऑफ तथा पूर्ण शुल्क का बोझ सहते हुए और असुरक्षित हो गए। रोहित वेमुला मामले तथा सर्वाेच्च न्यायालय के निर्देशों के बाद यह कदम उठाया गया, लेकिन इससे हिन्दू समाज में नई फूट पड़ रही है। सवर्ण संगठनों ने इसे सामाजिक तनाव फैलाने वाली साजिश करार दिया। कहां हुई चूक, तो चूक यही है कि नियम एकतरफा बने, सवर्णों के अधिकारों की अनदेखी की गई तथा झूठी शिकायतों पर अंकुश न लगाया। वहीं दूसरी तरफ इसे हिन्दुओं के बीच मतभेद पैदा करने का जिम्मेदार यूजीसी तथा केंद्र सरकार को ठहराया जा रहा है। सवर्ण आर्मी तथा राष्ट्रीय हिंदू सनातनी सेना जैसे संगठनों ने आरोप लगाया कि यह हिन्दू एकता तोड़ने का प्रयास है। भाजपा सरकार पर इल्जाम है कि वह पिछड़े वर्गों को साधने के चक्कर में सवर्ण भाइयों को कुर्बान कर रही है। इससे समाज में अगड़े-पिछड़ों का भाईचारा खतरे में पड़ गया।
बात समाजवादी पार्टी की कि जाये तो नये नियम से समाजवादी पार्टी को बड़ा फायदा हो सकता है क्योंकि वह पिछड़े तथा दलित वोटों पर निर्भर है। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, ऐसे में सवर्ण असंतोष से भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लग सकती है। पार्टी के नेता इसे सामाजिक न्याय का हथियार बना सकते हैं। वहीं भाजपा को भारी नुकसान की संभावना है क्योंकि उसके कई युवा मोर्चा पदाधिकारी तथा सवर्ण नेता इस्तीफा दे चुके हैं। पार्टी को सवर्णों का समर्थन खोने का डर सता रहा है। यह मुद्दा उग्र रूप धारण कर सकता है क्योंकि सोशल मीडिया पर अभियान तेज है तथा सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर हो चुकी है। यदि नियम वापस न हुए तो पूरे देश में आंदोलन फैल सकते हैं।
गौरतलब हो, आंदोलनों की शुरुआत 15 जनवरी के बाद हुई जब सोशल मीडिया पर विरोध शुरू हुआ। लखनऊ के हजरतगंज में राष्ट्रीय हिंदू सनातनी सेना ने विशाल प्रदर्शन किया, जिसमें अध्यक्ष राहुल हिंदू ने इसे काला कानून बताते हुए विधानसभा घेराव की चेतावनी दी।कणनी सेना भी सड़क पर उतर आई। जौनपुर में संगठनों ने राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपा। दिल्ली में सवर्ण समाज ने यूजीसी कार्यालय घेराव का ऐलान किया, ठाकुर शिवम सिंह ने इसे एकता के लिए खतरा बताया। बरेली के उप जिलाधिकारी अलंकार अग्निहोत्री ने पद से इस्तीफा दे दिया। भाजपा युवा मोर्चा नोएडा के उपाध्यक्ष राजू पंडित समेत दस पदाधिकारियों ने त्यागपत्र दिए। जयपुर तथा अन्य शहरों में सवर्ण संगठन सड़कों पर उतरे। हैशटैग जैसे नियम वापस लो प्रचारित हो रहे हैं। लखनऊ इकाई से भाजपा नेता भी विरोध में हैं। आंदोलन शांतिपूर्ण रहे लेकिन तनाव बढ़ रहा है। यदि मांगें न मानी गईं तो चरमरा सकता है।
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