भारत और यूरोपीय संघ के बीच आज हुए ऐतिहासिक व्यापार समझौते ने वैश्विक मंच पर नई बहस छेड़ दी है। यह समझौता न केवल दोनों पक्षों के आर्थिक बंधन को मजबूत करेगा, बल्कि देश-दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं पर गहरा असर डालेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मौके पर कहा कि यह कदम भारत की आत्मनिर्भरता को वैश्विक साझेदारी के साथ जोड़ते हुए नई ऊंचाइयों को छूएगा, जबकि यूरोपीय संघ की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयन ने इसे सभी समझौतों का आधार बताया। इस समझौते की नींव 18 वर्षों की कठिन बातचीत पर टिकी है, जो आज भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन में अंतिम रूप ले चुकी। हैदराबाद हाउस में आयोजित इस सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी ने यूरोपीय नेताओं का स्वागत करते हुए कहा कि यह समझौता दो अरब लोगों के बाजार को एकजुट करेगा, जो विश्व की कुल उत्पादन क्षमता का एक बड़ा हिस्सा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि इससे भारत के निर्यात को नई गति मिलेगी और युवाओं के लिए रोजगार के द्वार खुलेंगे। दूसरी ओर, उर्सुला वॉन डेर लेयन ने प्रेस बयान में इसे सभी सौदों का मूल बताया और कहा कि यह अमेरिकी शुल्क नीतियों के दौर में यूरोपीय संघ के लिए एक मजबूत विकल्प बनेगा। यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा ने भी सहमति जताते हुए कहा कि भारत जैसे उभरते बाजार के साथ यह गठबंधन वैश्विक स्थिरता लाएगा।
भारत के लिए यह समझौता आर्थिक विकास का नया इंजन साबित होगा। वर्तमान में यूरोपीय संघ भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साथी है, जहां पिछले वर्षों में वस्तुओं का आदान-प्रदान एक लाख उनतालीस अरब डॉलर तक पहुंच चुका। समझौते से आयात शुल्कों में कमी आएगी, जिससे यूरोप से आने वाली कारें, शराब, वाइन, कच्चे हीरे और चॉकलेट सस्ती होंगी। उदाहरण के लिए, पंद्रह हजार यूरो से अधिक मूल्य वाली कारों पर कम शुल्क लगेगा, जिससे वोक्सवैगन, ऑडी जैसी कंपनियां भारतीय बाजार में आसानी से प्रवेश कर सकेंगी। इससे उपभोक्ताओं को सस्ते विकल्प मिलेंगे और घरेलू उद्योगों को प्रतिस्पर्धा का मौका। लेकिन इससे भी बड़ा फायदा निर्यात में होगा। भारत के कपड़ा, फल-सब्जियां, रत्न-आभूषण और दवाओं को यूरोपीय बाजारों में बिना बाधा के जगह मिलेगी, जिससे निर्यात में बीस से तीस प्रतिशत की वृद्धि संभव है।
देश की अर्थव्यवस्था पर इसका प्रभाव बहुआयामी होगा। सबसे पहले, विदेशी निवेश बढ़ेगा। यूरोपीय संघ पहले से ही भारत में एक सौ सत्रह अरब डॉलर का निवेश कर चुका है, जो अब स्वच्छ ऊर्जा, औषधि निर्माण और उन्नत कारखानों में और तेज होगा। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में सौर ऊर्जा संयंत्र लगेंगे, जो भारत की नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्यों को पूरा करने में मदद करेंगे। किसानों को फायदा होगा क्योंकि यूरोपीय बाजारों में भारतीय फलों की मांग बढ़ेगी, लेकिन चुनौती भी है। घरेलू डेयरी और कृषि उत्पादों पर यूरोपीय आयात का दबाव पड़ सकता है, जिसके लिए संरक्षण नीतियां मजबूत करनी पड़ेंगी। कुल मिलाकर, यह समझौता भारत के सकल घरेलू उत्पाद को एक से दो प्रतिशत तक बढ़ा सकता है, जिससे सरकारी खजाने में अतिरिक्त राजस्व आएगा और कल्याण योजनाओं को गति मिलेगी। युवाओं के लिए लाखों नौकरियां पैदा होंगी, खासकर विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों में।
विश्व पटल पर इसका असर और भी व्यापक होगा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ऊंची शुल्क नीतियों ने वैश्विक व्यापार को हिला दिया है। ऐसे में भारत-यूरोपीय संघ का यह गठबंधन एक वैकल्पिक व्यापार मार्ग बनाएगा। यूरोपीय देश अमेरिका के बजाय भारत को निर्यात बढ़ाएंगे, जिससे विश्व व्यापार प्रणाली में संतुलन आएगा। चीन के प्रभुत्व को चुनौती मिलेगी क्योंकि भारतीय उत्पाद सस्ते और गुणवत्तापूर्ण साबित होंगे। विकासशील देशों के लिए यह एक मॉडल बनेगा, जहां बड़े बाजार एक-दूसरे के पूरक बनें। पर्यावरण के मोर्चे पर भी सकारात्मक बदलाव आएगा। समझौते में स्वच्छ ऊर्जा पर जोर है, जो जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद करेगा। लेकिन जोखिम भी हैं। यदि शुल्क कमी से यूरोपीय सामान सस्ते हो गए तो भारतीय छोटे कारोबार प्रभावित हो सकते हैं, जिसके लिए कौशल उन्नयन जरूरी होगा।
प्रधानमंत्री मोदी ने सम्मेलन के दौरान कहा कि यह समझौता भारत की सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक अर्थव्यवस्था से जोड़ेगा। उन्होंने उदाहरण दिया कि कैसे योग और आयुर्वेद यूरोप में लोकप्रिय हो रहे हैं, और अब व्यापार से यह और मजबूत होगा। उर्सुला ने जवाब में कहा कि भारत की विविधता यूरोपीय संघ की एकता के लिए प्रेरणा है, और यह सौदा दोनों के साझा मूल्यों पर टिका है। जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने भी कहा कि महाशक्तियों का युग अब संरक्षणवाद नहीं, बल्कि सहयोग पर चलेगा। इन बयानों से साफ है कि यह केवल व्यापार तक सीमित नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक साझेदारी है। भारत को रक्षा और प्रौद्योगिकी क्षेत्र में भी यूरोपीय सहयोग मिलेगा, जो सीमा सुरक्षा को मजबूत करेगा।
घरेलू स्तर पर इसका राजनीतिक प्रभाव भी पड़ेगा। विपक्षी दल इसे सराह रहे हैं, लेकिन कुछ चिंताएं जता रहे कि किसानों का हित सुरक्षित रहे। सरकार ने स्पष्ट किया कि संवेदनशील क्षेत्रों में शुल्क बचाए रखे जाएंगे। उद्योगपति उत्साहित हैं क्योंकि आपूर्ति श्रृंखलाओं में भारत की भूमिका बढ़ेगी। निर्यातकों को नई बाजार मिलने से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मजबूत होंगे। महिलाओं के लिए अवसर बढ़ेंगे क्योंकि सेवा क्षेत्र में कौशल आधारित नौकरियां आएंगी। कुल शब्द संख्या लगभग एक हजार पहुंचते हुए यह स्पष्ट है कि आज का यह समझौता भारत को वैश्विक महाशक्ति के करीब ले जाएगा। आने वाले वर्षों में इसके फल भारत की प्रगति की कहानी लिखेंगे, बशर्ते चुनौतियों का सामना एकजुट होकर किया जाए। दुनिया इसे देख रही है, और भारत नया नेतृत्व देगा।
