अखिलेश का भाजपा पर हमला सनातन शंकराचार्य और PDA राजनीति केंद्र में प्रदेश

उत्तर प्रदेश की राजनीति में गर्मी तेज है और इसी बीच समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भारतीय जनता पार्टी पर तीखा प्रहार करते हुए एक बार फिर सियासी बहस का रुख तय कर दिया है। राजधानी लखनऊ में दिए गए बयान में अखिलेश ने भाजपा को पूंजीवाद और सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने वाली पार्टी बताते हुए कहा कि मौजूदा सरकार अधर्म के रास्ते पर चल रही है। उनका यह हमला ऐसे समय आया है जब प्रदेश में 403 सीटों वाली विधानसभा के लिए 2027 के चुनाव की तैयारियां तेज हो चुकी हैं और सभी दल अपने-अपने सामाजिक आधार को साधने में जुटे हैं। अखिलेश के बयान को सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप नहीं, बल्कि सपा की रणनीतिक दिशा के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें धार्मिक अस्मिता, सामाजिक न्याय और प्रशासनिक जवाबदेही तीनों को एक साथ जोड़ने की कोशिश साफ नजर आती है।

अखिलेश यादव ने शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के मामले को उठाते हुए सरकार पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि शंकराचार्य के पक्ष में सभी सनातनी खड़े हैं और किसी भी तरह से साधु-संतों का अपमान स्वीकार नहीं किया जाएगा। स्नान को रोकने जैसे फैसलों को उन्होंने अधर्म करार दिया और कहा कि इससे बड़ा अधर्म कुछ नहीं हो सकता। उनके मुताबिक, सरकार को शंकराचार्य की प्रतिष्ठा और सम्मान बचाकर आगे बढ़ना चाहिए। अखिलेश ने यह भी आरोप लगाया कि अधिकारियों पर दबाव बनाकर नोटिस भेजे जा रहे हैं, जबकि जमीनी सच्चाई यह है कि अधिकारी खुद पाप का भागीदार नहीं बनना चाहते। यह बयान सीधे-सीधे प्रशासनिक तंत्र की स्वतंत्रता और राजनीतिक हस्तक्षेप के मुद्दे को सामने लाता है, जो पिछले कुछ वर्षों से लगातार चर्चा में रहा है।

समाजवादी आंदोलन की विरासत का जिक्र करते हुए अखिलेश ने जनेश्वर मिश्र का नाम लिया और कहा कि उन्होंने जो आंदोलन दिया, उसे जिम्मेदारी से आगे बढ़ाया जा रहा है। यह टिप्पणी सपा के उस पुराने समाजवादी एजेंडे की याद दिलाती है, जिसमें समानता, सामाजिक न्याय और वंचित वर्गों की आवाज को प्राथमिकता दी जाती रही है। अखिलेश ने भाजपा की नीतियों पर हमला करते हुए कहा कि पार्टी पूंजीवाद को बढ़ावा दे रही है और सांप्रदायिक चीजों को आगे बढ़ा रही है। उनके अनुसार भाजपा का रास्ता पूंजीवाद का रास्ता है, जिसमें आम आदमी की हिस्सेदारी कम और बड़े घरानों का वर्चस्व ज्यादा दिखाई देता है। यह तर्क उस समय और अहम हो जाता है जब सरकारी आंकड़ों के मुताबिक महंगाई दर बीते वर्षों में कई बार 6 प्रतिशत के आसपास रही और रोजगार के सवाल पर विपक्ष लगातार सरकार को घेरता रहा है।

हालिया नोएडा इंजीनियर मौत के मामले का जिक्र करते हुए अखिलेश ने प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि जब अधिकारी मौके पर पहुंचे थे, तब भी इंजीनियर की जान क्यों नहीं बच पाई। इस घटना को उन्होंने सिस्टम की असंवेदनशीलता से जोड़ते हुए कहा कि ऐसी घटनाएं दोबारा न हों, इसके लिए ठोस कदम उठाने होंगे। प्रदेश में हर साल दर्ज होने वाली आकस्मिक मौतों और औद्योगिक हादसों के आंकड़े बताते हैं कि सुरक्षा मानकों और त्वरित चिकित्सा सहायता में अभी भी कई स्तरों पर सुधार की जरूरत है। अखिलेश का यह सवाल सिर्फ एक घटना तक सीमित नहीं, बल्कि व्यापक प्रशासनिक जवाबदेही की मांग करता है।

जज के तबादले के मुद्दे पर भी अखिलेश ने टिप्पणी की और कहा कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट संज्ञान लेगा। यह बयान न्यायपालिका की स्वतंत्रता और पारदर्शिता से जुड़े उस विमर्श को आगे बढ़ाता है, जो हाल के वर्षों में कई बार सुर्खियों में रहा है। अखिलेश का कहना है कि संस्थाओं की स्वायत्तता लोकतंत्र की रीढ़ होती है और इसमें किसी भी तरह का दबाव लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। उनके इस रुख को विपक्षी राजनीति में संवैधानिक संस्थाओं के पक्ष में खड़े होने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

समाजवादी पार्टी की रणनीति पर बोलते हुए अखिलेश ने साफ किया कि पार्टी PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग की लड़ाई आगे बढ़ा रही है। उत्तर प्रदेश की सामाजिक संरचना में यह वर्ग बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व करता है। जनगणना और सामाजिक सर्वेक्षणों के आधार पर देखें तो ओबीसी, दलित और अल्पसंख्यक मिलकर प्रदेश की कुल आबादी का बड़ा हिस्सा बनाते हैं, जो किसी भी चुनावी गणित में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। अखिलेश का PDA पर जोर उसी सामाजिक समीकरण को साधने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसने पहले भी सपा को सत्ता तक पहुंचाया है।

उपमुख्यमंत्री पर किए गए व्यंग्य ने भी सियासी माहौल को और गरमा दिया। अखिलेश ने कहा कि डिप्टी सीएम को शंकराचार्य के चरणों में लोट जाना चाहिए और उन्हें बाटी-चोखा नहीं खाना चाहिए। इस तंज के जरिए उन्होंने सरकार के भीतर मौजूद कथित असहजता और दबाव की ओर इशारा किया। यह बयान भले ही व्यंग्यात्मक हो, लेकिन इसके पीछे सत्ता संरचना और निर्णय प्रक्रिया पर सवाल छिपे हुए हैं। राजनीति में ऐसे तंज अक्सर सीधे आरोपों से ज्यादा असरदार साबित होते हैं और यही वजह है कि यह टिप्पणी तेजी से चर्चा का विषय बन गई।

अखिलेश यादव के इन बयानों को राजनीतिक विश्लेषक 2027 की तैयारी के तौर पर देख रहे हैं। 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद सपा लगातार अपने कोर वोट बैंक को फिर से संगठित करने में जुटी है। 2024 के लोकसभा चुनाव में मिले संकेतों के बाद पार्टी को यह भरोसा मिला है कि सामाजिक समीकरणों को मजबूती से साधा जाए तो मुकाबला कड़ा किया जा सकता है। प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों और 403 विधानसभा सीटों का अनुभव बताता है कि चुनावी जीत सिर्फ मुद्दों से नहीं, बल्कि सामाजिक एकजुटता से तय होती है।

कुल मिलाकर, अखिलेश यादव का यह बयान सिर्फ भाजपा पर हमला नहीं, बल्कि एक व्यापक राजनीतिक संदेश है। इसमें धर्म, समाजवाद, प्रशासनिक जवाबदेही और सामाजिक न्याय सब एक साथ बुने गए हैं। सपा की कोशिश साफ है कि वह खुद को सिर्फ सत्ता विरोधी नहीं, बल्कि वैकल्पिक राजनीति के रूप में पेश करे। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह रणनीति जमीन पर कितनी असरदार साबित होती है और क्या यह वास्तव में सपा के कोर वोट बैंक को एकजुट कर पाती है या नहीं। प्रदेश की राजनीति में फिलहाल इतना तय है कि सियासी तापमान बढ़ चुका है और मुकाबला अब और तीखा होने वाला है।

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