यूजीसी के इक्विटी रेगुलेशंस 2026 से कैंपस में बराबरी बढ़ेगी या नया असंतुलन जन्म लेगा

15 जनवरी 2026 से लागू हुए यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन के प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस, 2026 को लेकर देश के उच्च शिक्षा संस्थानों में जितनी चर्चा है, उतनी ही बेचैनी भी। सरकार और यूजीसी इसे दशकों से चले आ रहे जातिगत भेदभाव के खिलाफ सख्त और जरूरी कदम बता रहे हैं, जबकि छात्रों और शिक्षकों का एक बड़ा वर्ग इसे एकतरफा, असंतुलित और दुरुपयोग की आशंका वाला कानून मान रहा है। यह बहस सिर्फ नीतिगत नहीं है, बल्कि सीधे कैंपस के सामाजिक माहौल, अकादमिक स्वतंत्रता और छात्रों के भविष्य से जुड़ गई है। यूजीसी के नए नियम 2012 में बने पुराने एंटी-डिस्क्रिमिनेशन फ्रेमवर्क की जगह लाए गए हैं। इनका आधार सुप्रीम कोर्ट के वे निर्देश हैं, जो रोहित वेमुला और पायल तडवी जैसे मामलों के बाद सामने आए थे। अदालत में यह बात उभरकर आई थी कि देश के कई विश्वविद्यालयों और मेडिकल कॉलेजों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्ग से आने वाले छात्रों को संस्थागत उपेक्षा, मानसिक उत्पीड़न और सामाजिक अलगाव का सामना करना पड़ता है। उस समय कोर्ट ने साफ कहा था कि केवल संवेदनशीलता की अपील काफी नहीं है, बल्कि शिकायतों के लिए मजबूत, समयबद्ध और जवाबदेह व्यवस्था बनानी होगी।

सरकारी आंकड़े इस पृष्ठभूमि को और स्पष्ट करते हैं। सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के संसद में दिए गए जवाबों के अनुसार, 2019-20 से 2023-24 के बीच उच्च शिक्षा संस्थानों से जातिगत भेदभाव की शिकायतों में 100 फीसदी से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई। इसी अवधि में यूजीसी को 1100 से ज्यादा शिकायतें मिलीं, जिनमें से लगभग 90 प्रतिशत मामलों में निपटारे का दावा किया गया, लेकिन लंबित शिकायतों की संख्या भी तेजी से बढ़ी। खास बात यह है कि इन शिकायतों में सिर्फ एससी और एसटी ही नहीं, बल्कि ओबीसी छात्रों की हिस्सेदारी भी लगातार बढ़ती गई। यही आंकड़े यूजीसी के लिए यह तर्क बने कि पुराने नियम अपर्याप्त हैं।फरवरी 2025 में जब यूजीसी ने ड्राफ्ट गाइडलाइंस जारी कीं, तो शुरुआत में उनमें ओबीसी को जातिगत भेदभाव की स्पष्ट परिभाषा से बाहर रखा गया था। इस पर तीखी प्रतिक्रिया हुई। छात्र संगठनों, सामाजिक समूहों और कई शिक्षाविदों ने कहा कि सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग भी भेदभाव का सामना करते हैं और उन्हें बाहर रखना वास्तविकता से मुंह मोड़ने जैसा होगा। इसी बीच संसद की शिक्षा, महिला, बाल और युवा संबंधी मामलों की स्थायी समिति ने ड्राफ्ट की समीक्षा की। इस समिति ने 8 दिसंबर 2025 को अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी। समिति की अध्यक्षता राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह कर रहे थे। रिपोर्ट में स्पष्ट सिफारिश की गई कि ओबीसी को भी जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा में शामिल किया जाए और इक्विटी कमेटियों में एससी, एसटी और ओबीसी का पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो।

सरकार ने समिति की सिफारिशों को स्वीकार किया और यूजीसी ने फाइनल नियमों में बड़ा बदलाव करते हुए ओबीसी को शामिल कर लिया। साथ ही हर उच्च शिक्षा संस्थान के लिए इक्विटी कमेटी और इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर बनाना अनिवार्य कर दिया गया। इन कमेटियों में एससी, एसटी, ओबीसी, महिलाओं और दिव्यांगों का प्रतिनिधित्व जरूरी होगा। नियमों के मुताबिक, शिकायत मिलने के 24 घंटे के भीतर प्राथमिक कार्रवाई शुरू करनी होगी और तय समयसीमा में जांच पूरी करनी होगी। गंभीर मामलों में पुलिस को सूचना देने और संस्थान प्रमुख को तत्काल कदम उठाने का अधिकार भी दिया गया है।यहीं से विवाद गहराने लगा। सामान्य वर्ग के छात्रों और कुछ शिक्षकों का कहना है कि नए नियम जाति आधारित भेदभाव को केवल एससी, एसटी और ओबीसी तक सीमित कर देते हैं। उनका तर्क है कि इससे यह मान लिया जाता है कि सामान्य वर्ग कभी जाति के कारण भेदभाव का शिकार नहीं हो सकता। सोशल मीडिया पर इसे “दूसरा एससी/एसटी एक्ट” कहा जा रहा है। सबसे बड़ी चिंता यह जताई जा रही है कि फाइनल नियमों में झूठी शिकायतों पर जुर्माने या सजा का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं रखा गया, जबकि ड्राफ्ट में ऐसा संकेत था।

आलोचकों का कहना है कि शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया जितनी आसान है और कार्रवाई की समयसीमा जितनी सख्त, उतना ही ज्यादा दुरुपयोग का खतरा भी है। उनका तर्क है कि कैंपस में व्यक्तिगत रंजिश, अकादमिक मतभेद या राजनीतिक टकराव को जातिगत भेदभाव का रूप देकर शिकायत की जा सकती है, और आरोपी को पहले ही बदनामी, निलंबन या निष्कासन जैसी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। हाल के वर्षों में अदालतों ने सख्त कानूनों के दुरुपयोग पर जो टिप्पणियां की हैं, उनका हवाला देकर कहा जा रहा है कि बिना संतुलित सुरक्षा के ऐसा ढांचा डर का माहौल पैदा कर सकता है।यूजीसी और सरकार इन आरोपों को खारिज करती हैं। आयोग का कहना है कि नियम किसी वर्ग को पहले से दोषी ठहराने के लिए नहीं हैं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से वंचित समूहों को सुरक्षा और सम्मान देने के लिए बनाए गए हैं। यूजीसी का तर्क है कि सामान्य भेदभाव की व्यापक परिभाषा में धर्म, लिंग, जन्म स्थान और दिव्यांगता जैसे आधार शामिल हैं और हर शिकायत तथ्यों के आधार पर देखी जाएगी। अधिकारियों का कहना है कि अगर शिकायतें बढ़ी हैं तो इसका मतलब यह भी है कि लोग अब बोलने लगे हैं और संस्थानों को जवाबदेह बनाना जरूरी हो गया था।

इन नियमों का एक और असर संस्थानों पर पड़ रहा है। मान्यता रद्द करने या अनुदान रोकने जैसे प्रावधानों के चलते विश्वविद्यालय प्रशासन पर भारी दबाव है। कई कुलपति और प्रशासक मानते हैं कि वे अब “जीरो रिस्क” मोड में जाएंगे, जहां निष्पक्षता से ज्यादा अनुपालन प्राथमिकता बन सकता है। इससे अकादमिक स्वतंत्रता, खुली बहस और शिक्षक-छात्र संबंधों पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।कुल मिलाकर, यूजीसी के इक्विटी रेगुलेशंस 2026 ने उच्च शिक्षा में समानता की बहस को नई तीव्रता दी है। एक तरफ वे छात्र और समूह हैं जो इसे लंबे समय से चली आ रही उपेक्षा को खत्म करने का अवसर मानते हैं, तो दूसरी तरफ वे लोग हैं जो इसे असंतुलित और संभावित रूप से खतरनाक मान रहे हैं। आने वाले महीनों में जब ये नियम जमीन पर लागू होंगे और शिकायतों पर कार्रवाई शुरू होगी, तभी साफ होगा कि यह व्यवस्था वास्तव में भेदभाव कम करती है या कैंपस में एक नया तनाव पैदा करती है। फिलहाल इतना तय है कि यह मुद्दा शिक्षा नीति से निकलकर सामाजिक और राजनीतिक बहस का अहम हिस्सा बन चुका है।

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