भारत की विदेश नीति का असली चेहरा क्या है और फैसले साउथ ब्लॉक से होते हैं या सियासत से

भारत की विदेश नीति को लेकर बरसों से यह माना जाता रहा है कि इसे साउथ ब्लॉक के ठंडे कमरों में बैठा अनुभवी राजनयिक तंत्र तय करता है, जहां भावनाओं के बजाय रणनीति, और शोर के बजाय संतुलन को तरजीह दी जाती है. विदेश मंत्री, विदेश सचिव और भारतीय विदेश सेवा के अफसर मिलकर यह तय करते हैं कि किस देश से कैसे बात करनी है, कहां सख्ती दिखानी है और कहां धैर्य रखना है. लेकिन हाल के वर्षों में बार-बार ऐसे घटनाक्रम सामने आए हैं, जिन्होंने इस भरोसे को हिला दिया है कि भारत की विदेश नीति अब भी केवल कूटनीतिक सोच से संचालित हो रही है.विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर आज सरकार का सबसे मुखर अंतरराष्ट्रीय चेहरा हैं. उनके बयान, उनकी यात्राएं और वैश्विक मंचों पर भारत की तरफ से रखी जाने वाली दलीलें अक्सर यह आभास देती हैं कि भारत आत्मविश्वास से भरी, व्यावहारिक और दीर्घकालिक सोच वाली विदेश नीति पर चल रहा है. लेकिन कई बार ऐसे फैसले सामने आते हैं, जो इस छवि से मेल नहीं खाते. तब सवाल उठता है कि क्या विदेश मंत्री और विदेश मंत्रालय वास्तव में फैसले ले रहे हैं या वे केवल उन निर्णयों को अमल में ला रहे हैं, जिनकी पटकथा कहीं और लिखी जा चुकी है.



बांग्लादेश से जुड़ा हालिया विवाद इसी उलझन का ताजा उदाहरण है. एक तरफ विदेश मंत्री ढाका जाकर शोक संदेश सौंपते हैं, मुलाकातें होती हैं और यह संकेत दिया जाता है कि महीनों से चली आ रही तल्खी में नरमी आ सकती है. दूसरी तरफ, महज दो दिन के भीतर क्रिकेट के मैदान से जुड़ा एक फैसला दोनों देशों के रिश्तों में नई दरार पैदा कर देता है. एक खिलाड़ी को निशाना बनाया जाता है, प्रतिक्रिया में नाराजगी आती है और मामला खेल से निकलकर कूटनीति तक पहुंच जाता है. सवाल यह नहीं है कि खिलाड़ी सही था या गलत, सवाल यह है कि ऐसा फैसला किस सोच के तहत और किसके दबाव में लिया गया.भारत में क्रिकेट सिर्फ खेल नहीं है, यह देश की सॉफ्ट पावर का बड़ा औजार है. बीसीसीआई की ताकत किसी से छिपी नहीं है. अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद से लेकर एशियाई क्रिकेट तक भारत का दबदबा है. ऐसे में क्रिकेट से जुड़ा हर फैसला सिर्फ खेल का मामला नहीं रह जाता, उसका असर विदेश नीति पर भी पड़ता है. जब ऐसे फैसले बिना किसी पारदर्शी प्रक्रिया और व्यापक सलाह-मशविरा के लिए जाते हैं, तो यह संदेह गहराता है कि कहीं यह घरेलू राजनीति और भावनात्मक दबाव का नतीजा तो नहीं.



बीते कुछ सालों में यह देखा गया है कि सोशल मीडिया पर उठने वाला शोर कई बार सरकार की प्राथमिकताओं को प्रभावित करता दिखता है. पड़ोसी देशों को लेकर भावनात्मक राष्ट्रवाद, बहिष्कार की मांगें और आक्रामक बयानबाजी तेजी से ट्रेंड बन जाती है. राजनीतिक दलों और उनके नेताओं के लिए इस शोर को पूरी तरह नजरअंदाज करना आसान नहीं होता, खासकर तब जब चुनाव नजदीक हों. ऐसे में विदेश नीति जैसी संवेदनशील चीज भी कभी-कभी तात्कालिक राजनीतिक लाभ के तराजू पर तौली जाने लगती है.मालदीव के साथ हालिया तनातनी, तुर्की की कंपनी को लेकर लिया गया अचानक फैसला, या फिर गलवान के बाद चीन के खिलाफ बहिष्कार का उन्माद, ये सभी उदाहरण बताते हैं कि नीति और भावनाओं के बीच की रेखा धुंधली हो रही है. गलवान के बाद चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध और सामान के बहिष्कार ने जनता के गुस्से को शांत किया, लेकिन पांच साल बाद वही चीन फिर से बातचीत और सामान्य संबंधों की ओर बढ़ता दिखा. तब सवाल उठा कि अगर अंततः बातचीत ही करनी थी, तो शुरुआती उग्रता से हासिल क्या हुआ.



भारत का राजनयिक तंत्र हमेशा यह मानकर चलता रहा है कि पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते भावनाओं से नहीं, दीर्घकालिक हितों से तय होने चाहिए. बांग्लादेश के साथ भी यही नीति रही है. वहां के आंतरिक हालात, अल्पसंख्यकों की स्थिति और राजनीतिक बदलावों को लेकर भारत ने अतीत में भी चिंता जताई है, लेकिन आमतौर पर यह काम बंद दरवाजों के पीछे किया गया. सार्वजनिक मंचों पर बयानबाजी से बचा गया ताकि कट्टर ताकतों को बल न मिले. लेकिन जब ऐसे मुद्दे प्राइम टाइम की बहस और सोशल मीडिया ट्रेंड बन जाते हैं, तो नुकसान अंततः कूटनीति का ही होता है.असल सवाल यही है कि भारत की विदेश नीति का नियंत्रण किसके हाथ में है. संवैधानिक रूप से यह जिम्मेदारी कार्यपालिका की है, यानी प्रधानमंत्री और उनकी कैबिनेट की. विदेश मंत्रालय उनका औजार है, जो नीति को आकार देता और लागू करता है. लेकिन जब नीति के संकेत राजनीतिक बयानबाजी, सोशल मीडिया अभियानों और तात्कालिक दबावों से आने लगें, तो यह संतुलन बिगड़ने लगता है. तब विदेश मंत्री की यात्राएं और राजनयिक पहलें भी कमजोर पड़ जाती हैं.



भारत एक बड़ा देश है, जिसकी वैश्विक महत्वाकांक्षाएं हैं. वह खुद को जिम्मेदार शक्ति के रूप में पेश करना चाहता है. इसके लिए जरूरी है कि उसकी विदेश नीति अनुमानित, संतुलित और रणनीतिक हो. पड़ोसियों के साथ रिश्ते खास तौर पर भावनाओं के हवाले नहीं छोड़े जा सकते. अगर हर विवाद में घरेलू राजनीति हावी होगी, तो भरोसा कमजोर होगा और संवाद मुश्किल.अंततः विदेश नीति का मकसद तालियां बटोरना नहीं, बल्कि देश के दीर्घकालिक हितों की रक्षा करना होता है. यह काम शोर से नहीं, धैर्य से होता है. सवाल यही है कि क्या भारत इस बुनियादी सच को फिर से अपनाने को तैयार है, या फिर विदेश नीति भी धीरे-धीरे उसी राजनीतिक भीड़ का हिस्सा बनती जाएगी, जो हर मुद्दे को तुरंत जीत या हार में बदल देना चाहती है.



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