मुंबई की सियासत एक बार फिर उसी मोड़ पर खड़ी है, जहां भावनाएं तर्क से बड़ी हो जाती हैं और पहचान विकास से भारी पड़ने लगती है। बीएमसी चुनाव से पहले शिवतीर्थ मैदान में राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे का एक मंच पर आना सिर्फ एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि मराठी राजनीति के पुनर्जागरण की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। बरसों बाद दोनों भाइयों ने खुले तौर पर यह संदेश देने की कोशिश की कि मुंबई गंभीर खतरे में है और उसे बचाने के लिए मराठी समाज को एकजुट होना होगा। यह दावा सीधे मराठी मानुष की चेतना को छूता है, क्योंकि बीएमसी सिर्फ एक नगर निगम नहीं, बल्कि देश की सबसे अमीर महानगरपालिका है, जिसका सालाना बजट करीब 60 हजार करोड़ रुपये के आसपास बताया जाता है।मुंबई की कुल आबादी में मराठी भाषी मतदाताओं की हिस्सेदारी लगभग 40 फीसदी मानी जाती है। यही वजह है कि हर बीएमसी चुनाव में मराठी अस्मिता सबसे बड़ा मुद्दा बनकर उभरती है। 227 वार्डों वाली बीएमसी में सत्ता हासिल करने के लिए 114 सीटों की जरूरत होती है और मराठी बहुल इलाकों में जीत का गणित ही सत्ता की चाबी तय करता है। ठाकरे बंधुओं ने इसी गणित को ध्यान में रखकर अपनी रणनीति तैयार की है। मराठी बहुल करीब 70 से ज्यादा वार्ड और मुस्लिम बहुल लगभग 40 वार्ड इस रणनीति का केंद्र हैं। राजनीतिक हलकों में इसे मराठी-मुस्लिम समीकरण कहा जा रहा है, जिसे उद्धव और राज मिलकर साधने की कोशिश कर रहे हैं।
शिवतीर्थ की रैली में राज ठाकरे का लहजा सबसे ज्यादा आक्रामक था। उन्होंने मराठी लोगों को चेताते हुए कहा कि यह आखिरी मौका है, अगर अब भी नहीं चेते तो मुंबई हाथ से निकल जाएगी। उनका निशाना साफ तौर पर उत्तर भारतीयों और हिंदी के कथित वर्चस्व पर था। राज ठाकरे ने कहा कि उन्हें किसी भाषा से नफरत नहीं, लेकिन जबरन हिंदी थोपने की कोशिश बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यह बयान कोई नया नहीं था, लेकिन बीएमसी चुनाव के ठीक पहले इसका राजनीतिक संदेश साफ था मराठी अस्मिता को खतरे में बताकर वोटों का ध्रुवीकरण।उद्धव ठाकरे ने भी अपने भाषण में इसी सुर को आगे बढ़ाया। उन्होंने बीजेपी पर आरोप लगाया कि वह मुंबई को बांटने की राजनीति कर रही है और मराठी पहचान को कमजोर कर रही है। उद्धव ठाकरे ने दावा किया कि शिवसेना ने 25 साल में मुंबई को खड़ा किया और पिछले कुछ सालों में उसे बर्बाद कर दिया गया। उनका लहजा भावनात्मक था और बालासाहेब ठाकरे की विरासत का बार-बार जिक्र किया गया, ताकि मराठी मतदाताओं को यह याद दिलाया जा सके कि शिवसेना की जड़ें कहां हैं।
लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी उतना ही अहम है। बीजेपी और एकनाथ शिंदे की शिवसेना इस रणनीति की काट पहले से तैयार कर चुकी है। शिंदे गुट मराठी बहुल करीब 60 वार्डों और मुस्लिम बहुल 20 से ज्यादा वार्डों में पूरी ताकत झोंक रहा है। बीजेपी का जोर विकास, इंफ्रास्ट्रक्चर और ट्रिपल इंजन सरकार के फायदे गिनाने पर है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस पहले ही कह चुके हैं कि खतरे में मुंबई नहीं, बल्कि उद्धव और राज ठाकरे की राजनीति है। सत्ता पक्ष का तर्क है कि भाषा और पहचान की राजनीति अब मुंबई के मतदाता को उतना प्रभावित नहीं करती, जितना रोज़मर्रा की सुविधाएं और विकास।इस पूरे सियासी माहौल में भाषा का मुद्दा फिर से केंद्र में आ गया है। महाराष्ट्र के स्कूलों में त्रिभाषा फॉर्मूले को लेकर हाल में जो विवाद हुआ, उसने भी ठाकरे बंधुओं को एक मंच पर आने का मौका दिया। उस आदेश के विरोध में दोनों भाइयों की सक्रियता के बाद सरकार को फैसला वापस लेना पड़ा। इसे ठाकरे बंधुओं की एकजुटता की पहली राजनीतिक जीत के तौर पर देखा गया। यही वजह है कि अब बीएमसी चुनाव में भी वही मॉडल दोहराने की कोशिश हो रही है।
मुंबई का नाम बदलने को लेकर उठे सवाल ने इस बहस को और हवा दी। तमिलनाडु बीजेपी नेता के. अन्नामलाई के एक बयान को आधार बनाकर उद्धव ठाकरे और संजय राउत ने बीजेपी पर हमला बोला कि क्या वह मुंबई को फिर से ‘बॉम्बे’ बनाना चाहती है। हालांकि बीजेपी ने इस आरोप को खारिज करते हुए कहा कि बयान को संदर्भ से बाहर लिया गया है और बात सिर्फ मुंबई की वैश्विक पहचान की थी। लेकिन राजनीति में मुद्दा सच से ज्यादा धारणा का होता है और ठाकरे खेमे ने इसी धारणा को भुनाने की कोशिश की।बीएमसी चुनाव में इस बार मुकाबला सिर्फ सत्ता का नहीं, बल्कि राजनीतिक अस्तित्व का भी है। मनसे के लिए यह चुनाव प्रासंगिक बने रहने की लड़ाई है, तो शिवसेना (यूबीटी) के लिए अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने का मौका। दूसरी तरफ बीजेपी और शिंदे गुट के लिए यह चुनाव यह साबित करने का अवसर है कि मुंबई अब सिर्फ भावनाओं से नहीं, विकास की राजनीति से तय होती है।
सवाल यही है कि क्या मराठी मानुष का मुद्दा आज भी उतना असरदार है, जितना एक दौर में हुआ करता था। आंकड़े बताते हैं कि मुंबई की आबादी लगातार बदल रही है और गैर-मराठी मतदाताओं की संख्या बढ़ी है। लेकिन यह भी सच है कि बीएमसी की राजनीति में मराठी वोट आज भी निर्णायक भूमिका निभाता है। यही वजह है कि ठाकरे बंधु आखिरी दांव खेलने से पीछे नहीं हट रहे।15 जनवरी का मतदान सिर्फ नगर निगम का भविष्य तय नहीं करेगा, बल्कि यह भी बताएगा कि मुंबई की राजनीति भावनाओं की पटरी पर चलती रहेगी या विकास की राह पकड़ेगी। ठाकरे बंधुओं की एकजुटता मराठी अस्मिता को फिर से केंद्र में ले आई है, अब फैसला मुंबई के मतदाताओं के हाथ में है कि वे किस कहानी पर भरोसा करते हैं।
