पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की अधिसूचना फरवरी के अंत या मार्च की शुरुआत तक जारी हो सकती है, क्योंकि चुनाव मार्च-अप्रैल में होने हैं। ममता बनर्जी के लिए सत्ता बचाना इस बार कठिन चुनौती बन गया है, जबकि भारतीय जनता पार्टी मजबूत संगठन और मुद्दों के साथ खाली हाथ रहने को तैयार नहीं। प्रमुख मुद्दों में मतदाता सूची का पुनरीक्षण, घुसपैठ, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी शामिल हैं। चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल के लिए मतदाता सूची का विशेष सघन पुनरीक्षण अभियान चलाया है, जो नवंबर से शुरू होकर अब तेज विवाद का रूप ले चुका है। तृणमूल कांग्रेस इसे केंद्र सरकार का षड्यंत्र बताकर आक्रामक रुख अपनाए हुए है, जबकि भारतीय जनता पार्टी इसे स्वच्छ चुनाव की दिशा में आवश्यक कदम मान रही है। राज्य में सत्तारूढ़ दल का आरोप है कि यह अभियान उनके मतदाताओं को कमजोर करने की साजिश है, जिससे चुनावी माहौल गरमा गया है। ममता बनर्जी ने इस मुद्दे पर केंद्र और चुनाव आयोग के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। वे अदालत का रुख करने की बात कह रही हैं तथा इसे जनता के अधिकारों पर हमला बता रही हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यह तृणमूल का प्रमुख चुनावी हथियार बनेगा, क्योंकि बिहार में यह मुद्दा प्रभावी नहीं हुआ लेकिन बंगाल की राजनीति में यह गहरा असर डाल सकता है। दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा के कोलकाता दौरे ने पार्टी कार्यकर्ताओं में उत्साह भर दिया है।
भारतीय जनता पार्टी ने तीन मुख्य मुद्दों पर तृणमूल को घेरने का फैसला किया है। भ्रष्टाचार के आरोपों को सबसे ऊपर रखा गया है, जहां पार्टी राज्य सरकार के विभिन्न घोटालों को उजागर करने की तैयारी में जुटी है। घुसपैठ का मुद्दा भी तेज हो रहा है, क्योंकि बंगाल बांग्लादेश से सटा हुआ है तथा अवैध घुसपैठियों को वोट बैंक बनाने के आरोप लग रहे हैं। बेरोजगारी युवाओं के बीच असंतोष पैदा कर रही है, जिसे पार्टी गांव-गांव तक पहुंचाने का लक्ष्य रखे हुए है।तृणमूल कांग्रेस अंतरिम बजट सत्र के जरिए जनकल्याणकारी योजनाओं पर जोर दे रही है। फरवरी में होने वाले इस सत्र में विभिन्न वर्गों को लाभ पहुंचाने वाली घोषणाएं की जा सकती हैं, जो पांच महीने बाद होने वाले चुनाव के लिए मास्टरस्ट्रोक साबित होंगी। ममता बनर्जी विभिन्न समुदायों को साधने की रणनीति पर काम कर रही हैं, जिसमें हिंदू-मुस्लिम एकता पर बल दिया जा रहा है। लेकिन भ्रष्टाचार और हिंसा के पुराने आरोप उनके लिए बाधा बन सकते हैं।
भारतीय जनता पार्टी ने संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत किया है तथा 2021 की तुलना में अब परिवर्तन लाने की क्षमता रखती है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कमान संभाली है तथा बहुमत की सरकार बनाने का दावा किया है। पार्टी का नारा है कि अस्तित्व की रक्षा के लिए उनका साथ जरूरी है, जो हिंदुत्व और स्थानीय संस्कृति पर खतरे की भावना जगाता है। तृणमूल के बुआ-भतीजा समीकरण पर भी सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि आंतरिक कलह की चर्चाएं हैं।मतदाता सूची पुनरीक्षण पर विवाद और तेज हो सकता है। तृणमूल का कहना है कि लाखों वैध मतदाताओं को हटाया जा रहा है, जबकि भारतीय जनता पार्टी इसे फर्जी वोटों की सफाई बताती है। यह मुद्दा अदालत तक पहुंच सकता है तथा चुनावी परिणाम प्रभावित कर सकता है। राज्य में विकास, उद्योग और परंपराओं पर खतरे का प्रचार दोनों दल कर रहे हैं। बेरोजगारी और भ्रष्टाचार युवाओं व मध्यम वर्ग को भारतीय जनता पार्टी की ओर खींच सकते हैं।
चुनावी सर्वे बताते हैं कि मुकाबला कड़ा है। तृणमूल की सत्ता में 15 वर्षों की सरकार के बावजूद, विपक्ष ने जमीन तैयार कर ली है। ममता बनर्जी का किला ढह सकता है यदि मुद्दे सही ढंग से उठाए गए। भारतीय जनता पार्टी के लिए यह करो या मरो का मौका है, क्योंकि हार पर अगले 15 वर्ष सत्ता से बाहर रहना पड़ सकता है। दोनों दल वर्गों और पेशों से जुड़े लोगों से संपर्क बढ़ा रहे हैं।अधिसूचना जारी होते ही असली जंग शुरू होगी। ममता बनर्जी जनकल्याण पर निर्भर रहेंगी, जबकि भारतीय जनता पार्टी नकारात्मक मुद्दों से हमला करेगी। घुसपैठ, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी जैसे विषय निर्णायक साबित होंगे। राज्य की 294 सीटों पर यह युद्ध दोनों दलों के भविष्य का फैसला करेगा। जनता का फैसला कौन सा होगा, यह समय बताएगा।
