पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 की लड़ाई अब औपचारिक राजनीति से निकलकर पूरी तरह सत्ता संघर्ष में बदल चुकी है। इस बार माहौल इसलिए अलग है क्योंकि भारतीय जनता पार्टी ने बंगाल को केवल एक राज्य नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के अगले चरण की नींव मान लिया है। यही वजह है कि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने चुनाव की कमान खुद संभाली है और कोलकाता में तीन दिन तक रुककर साफ कर दिया है कि बीजेपी इस बार आधी तैयारी के साथ मैदान में नहीं उतरेगी।294 सीटों वाली विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 148 है। 2021 में तृणमूल कांग्रेस ने 213 सीटें जीतकर ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी, जबकि बीजेपी 77 सीटों पर सिमट गई थी। यह आंकड़ा बीजेपी के लिए दोहरी सीख लेकर आया। एक तरफ पार्टी 2016 की 3 सीटों से 77 तक पहुंची, दूसरी तरफ यह भी साफ हो गया कि सत्ता तक पहुंचने के लिए सिर्फ विपक्ष का कमजोर होना काफी नहीं है। ममता बनर्जी की राजनीतिक पकड़, संगठन और वोट ट्रांसफर की क्षमता अब भी बेहद मजबूत है।
अमित शाह की रणनीति की शुरुआत वहीं से होती है जहां बीजेपी खुद को सबसे सहज मानती है सुरक्षा और पहचान की राजनीति। घुसपैठ का मुद्दा इस पूरे अभियान की रीढ़ बनाया गया है। बंगाल के उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना, कूचबिहार, मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे सीमावर्ती जिलों में यह सवाल लंबे समय से स्थानीय राजनीति का हिस्सा रहा है। बीजेपी इसे स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़कर पेश कर रही है। शाह का यह संदेश कि सत्ता में आने पर “एक-एक घुसपैठिये को बाहर निकाला जाएगा”, सीधे उन इलाकों के मतदाताओं को लक्षित करता है जहां संसाधनों और जनसंख्या संतुलन को लेकर असंतोष रहा है।लेकिन बंगाल का चुनाव केवल मुद्दों से नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना से तय होता है। राज्य की लगभग 30 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है और इसका सीधा असर करीब 100 से 120 सीटों पर पड़ता है। 2011 और 2016 में मुस्लिम वोट का बड़ा हिस्सा लेफ्ट और कांग्रेस में बंटा था, लेकिन 2021 आते-आते यह लगभग पूरी तरह तृणमूल कांग्रेस के साथ चला गया। यही वह निर्णायक बदलाव था जिसने ममता बनर्जी को 213 सीटों तक पहुंचाया। बीजेपी की समस्या यह है कि यह वोट बैंक उसके लिए लगभग बंद दरवाजा बना हुआ है, और इसे तोड़ने का फिलहाल उसके पास कोई विश्वसनीय रास्ता नहीं दिखता।
बीजेपी की दूसरी बड़ी दिक्कत यह है कि बंगाल में विपक्ष का कमजोर होना उसके लिए फायदा नहीं, बल्कि नुकसान बन गया है। कांग्रेस और वाम दलों के कमजोर होने से जो वोट खाली हुआ, वह बीजेपी की तरफ नहीं गया, बल्कि तृणमूल कांग्रेस में समाहित हो गया। 2021 के चुनावी आंकड़े बताते हैं कि बीजेपी का वोट शेयर बढ़ा जरूर, लेकिन उतना नहीं जितना सीटों के हिसाब से चाहिए था। वहीं टीएमसी ने न केवल सीटें, बल्कि वोट प्रतिशत भी मजबूत किया।क्षेत्रीय स्तर पर देखें तो बंगाल कम से कम पांच राजनीतिक जोन में बंटा हुआ है उत्तर बंगाल, जंगलमहल, कोलकाता-हावड़ा शहरी क्षेत्र, दक्षिण बंगाल का ग्रामीण इलाका और सीमावर्ती मुस्लिम बहुल क्षेत्र। बीजेपी को 2019 लोकसभा चुनाव में उत्तर बंगाल और जंगलमहल में बड़ी बढ़त मिली थी, लेकिन 2021 में ममता बनर्जी ने इन इलाकों में भी वापसी कर ली। अमित शाह की मौजूदा रणनीति का बड़ा हिस्सा इन्हीं क्षेत्रों में दोबारा पैठ बनाने पर केंद्रित है।संगठन के स्तर पर बीजेपी इस बार पहले से कहीं ज्यादा सतर्क है। बूथ मैनेजमेंट, पन्ना प्रमुख, वोटर लिस्ट सत्यापन और स्थानीय मुद्दों की पहचान पर जोर दिया जा रहा है। बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में चुनाव संभाल चुके नेताओं को बंगाल में सक्रिय करना इसी रणनीति का हिस्सा है। पार्टी मानती है कि अगर 20-25 हजार वोटों से हारने वाली सीटों पर संगठन मजबूत हो जाए, तो तस्वीर बदली जा सकती है।
लेकिन नेतृत्व का संकट बीजेपी के लिए अब भी बड़ा सवाल है। बंगाल में ममता बनर्जी सिर्फ मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि एक भावनात्मक प्रतीक हैं। उनके पास “बंगाली अस्मिता” का ऐसा नैरेटिव है, जो बीजेपी के राष्ट्रीय नेतृत्व के सामने स्थानीय पहचान की मजबूत दीवार खड़ी करता है। शुभेंदु अधिकारी को आगे किया गया है, लेकिन उनका प्रभाव राज्य के कुछ हिस्सों तक ही सीमित माना जाता है। इसके अलावा, टीएमसी से आए नेताओं को तरजीह देने से बीजेपी के पुराने कैडर में असंतोष भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।ममता बनर्जी ने बीजेपी के हर हमले का जवाब राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक भाषा में देने की कोशिश की है। उनका संदेश साफ है कि बंगाल को बाहरी नियंत्रण से नहीं, बल्कि स्थानीय नेतृत्व से चलाया जाना चाहिए। यही वजह है कि बीजेपी के राष्ट्रवाद और विकास के नैरेटिव के सामने ममता का क्षेत्रीय गर्व वाला कार्ड अब भी असरदार दिखता है।
2026 का बंगाल चुनाव इसलिए खास है क्योंकि यहां टकराव सिर्फ दो दलों के बीच नहीं, बल्कि दो राजनीतिक सोच के बीच है। एक तरफ अमित शाह की आक्रामक, डेटा-आधारित और केंद्रीय रणनीति है, दूसरी तरफ ममता बनर्जी की जमीनी पकड़, भावनात्मक अपील और मजबूत संगठन। बीजेपी के लिए यह चुनाव जीतना सिर्फ सत्ता का सवाल नहीं, बल्कि यह साबित करने का मौका है कि वह क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति को भी मात दे सकती है। वहीं ममता के लिए यह चुनाव अपनी राजनीतिक विरासत और राष्ट्रीय कद को बचाए रखने की लड़ाई बन चुका है।नतीजा जो भी हो, इतना तय है कि बंगाल की यह लड़ाई 2026 के बाद की राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने में निर्णायक भूमिका निभाएगी।
