इस साल राज्यसभा चुनाव में एनडीए होगा मजबूत,महागठबंधन की घटेगी ताकत

साल 2026 में राज्यसभा की 72 सीटें खाली हो रही हैं। इनके चुनाव केंद्रीय राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकते हैं। सत्ताधारी भाजपा और उसके सहयोगी दलों का भविष्य इन चुनावों से प्रभावित होगा। साथ ही विपक्षी कांग्रेस की रणनीति भी कमजोर पड़ सकती है। विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं की दलीय स्थिति को देखें तो भाजपा और एनडीए मजबूत स्थिति में हैं। वहीं कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के लिए चुनौतियां बढ़ रही हैं। राज्यसभा के अंकगणित में भले ही बहुत बड़ा बदलाव न हो, लेकिन एनडीए अपना बहुमत और मजबूत कर लेगा। भाजपा की संख्या भी बढ़ जाएगी। इससे संसद के दोनों सदनों में विधायी कामकाज सरल हो जाएगा। सरकार को और सुविधा मिलेगी। विपक्ष की सरकार को घेरने की रणनीति कमजोर पड़ जाएगी। राज्यसभा की आधिकारिक जानकारी के अनुसार अभी सदन में भाजपा के 103 सदस्य हैं। एनडीए के कुल 126 सदस्य हैं। 2026 में भाजपा के 30 सदस्यों का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। उसके 32 सदस्य नए चुनकर आ रहे हैं। जोड़-तोड़ से पार्टी तीन सीटें और हासिल कर सकती है। सहयोगी दलों के चार सदस्य बढ़ेंगे। इनमें तेलुगु देशम, जनसेना, शिवसेना और एनसीपी का एक-एक सदस्य शामिल होगा। हालांकि दो सदस्य कम भी हो सकते हैं। फिर भी कुल मिलाकर एनडीए लाभ की स्थिति में रहेगा। मनोनीत सदस्य पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई भी मार्च में रिटायर हो रहे हैं। उनकी जगह आने वाला सदस्य भी सरकार का समर्थन करने की संभावना रखता है।

इन चुनावों का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि कई प्रमुख नेताओं का कार्यकाल खत्म हो रहा है। इनमें केंद्र सरकार के मंत्री और विभिन्न दलों के शीर्ष नेता शामिल हैं। यदि मंत्री दोबारा चुनकर नहीं आते तो उनका पद पर बने रहना कठिन होगा। अन्य नेताओं के लिए भी परेशानियां बढ़ेंगी। जिन प्रमुख नेताओं का कार्यकाल समाप्त हो रहा है उनमें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवगौड़ा, दिग्विजय सिंह, शरद पवार, केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी, बी एल वर्मा, जॉर्ज कुरियन आदि प्रमुख हैं। इसके अलावा प्रेमचंद गुप्ता, राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह, रामनाथ ठाकुर, उपेंद्र कुशवाहा, प्रियंका चतुर्वेदी, रामदास अठावले, रामगोपाल यादव, नीरज शेखर, राम जी, शक्ति सिंह गोहिल, अभिषेक मनु सिंघवी, थंबी दुरई, तिरुचि शिवा और मनोनीत पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई शामिल हैं। इन नेताओं का भविष्य इन चुनावों पर टिका है।
इस वर्षं 72 सीटों के लिए चुनाव होंगे। इनमें अप्रैल में 37 सीटें, जून में 23 सीटें, जुलाई में एक सीट और नवंबर में 11 सीटें शामिल हैं। अप्रैल के चुनाव असम, बिहार, छत्तीसगढ़, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, तमिलनाडु, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से होंगे। नवंबर में सबसे महत्वपूर्ण उत्तर प्रदेश की 10 सीटें खाली होंगी। जून के 23 चुनावों में आंध्र प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, मध्य प्रदेश जैसे राज्य शामिल हैं। बिहार की पांच सीटें खाली हो रही हैं। इनमें जेडीयू की दो, राजद की दो और आरएलएम की एक सीट है। चुनाव बाद जेडीयू और भाजपा दो-दो सीटें जीत सकते हैं। उनका सहयोगी एक सीट हासिल कर सकता है। झारखंड में दो सीटें रिक्त होंगी। इनमें झामुमो की एक पहले से खाली है और भाजपा की एक और होगी। नए समीकरण में दोनों को एक-एक सीट मिल सकती है। उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक 10 सीटें खाली हो रही हैं। इनमें भाजपा की आठ, सपा की एक और बसपा की एक है। चुनाव बाद भाजपा को सात और सपा को दो सीटें मिलना तय है। भाजपा सहयोगी दलों से एक और सीट जीत सकती है। बसपा का राज्यसभा से सफाया लगभग निश्चित है। उत्तराखंड में एक सीट खाली होगी जो भाजपा के पास ही रहेगी।

आंध्र प्रदेश की चार सीटें रिक्त होंगी। इनमें तेलुगु देशम की एक और वायएसआरसीपी की तीन हैं। चुनाव बाद तेलुगु देशम को दो, भाजपा को एक और जनसेना को एक सीट मिलने की संभावना है। अरुणाचल प्रदेश में भाजपा की एक सीट खाली हो रही है। वहां भाजपा का ही सदस्य दोबारा चुना जाएगा। असम में तीन सीटें खाली होंगी। इनमें भाजपा की दो और एक निर्दलीय है। चुनाव बाद भाजपा के दो और कांग्रेस के एक सदस्य का चुनाव तय है। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के दोनों सदस्य रिटायर हो रहे हैं। चुनाव बाद भाजपा और कांग्रेस को एक-एक सीट मिल सकती है। गुजरात में चार सीटें खाली होंगी। इनमें तीन भाजपा की और एक कांग्रेस की है। सभी चार सीटें भाजपा के पास आ सकती हैं। हरियाणा में दोनों सीटें भाजपा की हैं। चुनाव बाद भाजपा को एक और कांग्रेस को एक सीट मिलेगी। हिमाचल प्रदेश में भाजपा की एक सीट खाली हो रही है। यह कांग्रेस के पास चली जाएगी। कर्नाटक की भी चार सीटें खाली होंगी। इनमें भाजपा की दो, कांग्रेस की एक और जेडएस की एक है। विधानसभा स्थिति के आधार पर कांग्रेस को तीन और भाजपा को एक सीट मिल सकती है। मध्य प्रदेश की तीन सीटें खाली होंगी। इनमें भाजपा की दो और कांग्रेस की एक है। यहां भाजपा को दो और कांग्रेस को एक सीट मिलेगी।

महाराष्ट्र में सात सीटें रिक्त होंगी। इनमें भाजपा की दो, शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) की एक, राकांपा (शरद पवार गुट) की दो, कांग्रेस की एक और रिपब्लिकन पार्टी की एक है। चुनाव बाद भाजपा को तीन, राकांपा को एक, शिवसेना को एक, आरपीआई को एक और कांग्रेस को एक सीट मिल सकती है।पश्चिम बंगाल की पांच सीटें खाली होंगी। इनमें तृणमूल कांग्रेस की चार और माकपा की एक है। इस बार तृणमूल को चार और भाजपा को एक सीट मिलेगी। मणिपुर में भाजपा की एक सीट खाली होगी जो भाजपा को ही मिलेगी। मेघालय में एनपीपी की एक सीट खाली होगी। वहां भी वही दल जीतेगा। मिजोरम में एमएनएफ की सीट खाली होगी लेकिन जेडपीएम का सदस्य चुना जाएगा।
वहीं ओडिशा में चार सीटें खाली होंगी। इनमें भाजपा की दो और बीजेड की दो हैं। दोनों दलों को दो-दो सीटें मिलेंगी। राजस्थान की तीन सीटों में भाजपा की दो और कांग्रेस की एक है। वही स्थिति बनी रहेगी। तमिलनाडु की छह सीटें खाली होंगी। इनमें द्रमुक की चार, अन्नाद्रमुक की एक और टीएमसी की एक है। द्रमुक चार सीटें जीतेगी। अन्नाद्रमुक एक जीतेगी। एक सीट स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करेगी। तेलंगाना की दो सीटें खाली होंगी। इनमें कांग्रेस की एक और बीआरएस की एक है। दोनों कांग्रेस के पास जाएंगी। कुल मिलाकर इन चुनावों से एनडीए का वर्चस्व बढ़ेगा। विपक्ष कमजोर पड़ेगा। कई दिग्गजों का राजनीतिक सफर प्रभावित होगा। राज्यसभा में संतुलन सरकार के पक्ष में झुक जाएगा।

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