संसद के शीतकालीन सत्र में जैसे ही सरकार ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम यानी मनरेगा की जगह नया कानून लाने का संकेत दिया, वैसे ही सियासी पारा चढ़ गया। बीते करीब दो दशकों से ग्रामीण रोजगार की पहचान बन चुकी मनरेगा अब अपने मौजूदा स्वरूप में नहीं रहेगी। केंद्र सरकार इसे खत्म कर उसकी जगह ‘विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ यानी वीबी जी राम जी विधेयक लाने की तैयारी में है। सरकार इसे ग्रामीण भारत की बदली हुई जरूरतों के मुताबिक आधुनिक ढांचा बता रही है, जबकि विपक्ष इसे नाम बदलने की राजनीति और कांग्रेसी विरासत को मिटाने की कोशिश करार दे रहा है।
मनरेगा 2005 में यूपीए सरकार के दौर में कानून के रूप में लागू हुआ था। इसका मकसद था ग्रामीण परिवारों को हर साल कम से कम 100 दिन का रोजगार देना, ताकि गरीबी कम हो, गांवों में पलायन रुके और स्थानीय स्तर पर बुनियादी ढांचा मजबूत हो। 2009 में इस कानून के नाम के साथ महात्मा गांधी जोड़े गए। तब से लेकर अब तक यह योजना ग्रामीण भारत की रीढ़ मानी जाती रही है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक हर साल करोड़ों परिवार इस योजना के तहत काम पाते रहे हैं और महिलाओं की भागीदारी भी इसमें उल्लेखनीय रही है। कई राज्यों में कुल श्रमिकों का लगभग आधा हिस्सा महिलाएं रही हैं, जो इसे महिला सशक्तीकरण से भी जोड़ता है।
अब सरकार का कहना है कि पिछले 20 सालों में गांवों की तस्वीर बदली है। डिजिटल पहुंच बढ़ी है, गरीबी के आंकड़ों में कमी आई है और रोजगार की प्रकृति भी बदली है। ऐसे में पुराने कानून को उसी रूप में जारी रखना व्यावहारिक नहीं है। इसी तर्क के आधार पर नया वीबी जी राम जी विधेयक लाया जा रहा है। सरकार का दावा है कि नए कानून में रोजगार की गारंटी को 100 दिन से बढ़ाकर 125 दिन किया जाएगा। भुगतान प्रणाली को और तेज किया जाएगा और मजदूरी का पैसा हर हफ्ते या अधिकतम 15 दिन के भीतर खातों में पहुंचाने का प्रावधान होगा। देरी होने पर मुआवजा देने का नियम भी बना रहेगा।
लेकिन बदलाव सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है। सबसे बड़ा फर्क फंडिंग को लेकर है। मनरेगा में अकुशल मजदूरी का पूरा खर्च केंद्र सरकार उठाती थी, जबकि नए कानून में राज्यों को भी मजदूरी का बोझ साझा करना होगा। प्रस्ताव के मुताबिक पूर्वोत्तर, पहाड़ी राज्यों और कुछ केंद्र शासित प्रदेशों में केंद्र और राज्य का अनुपात 90:10 रहेगा, जबकि बाकी राज्यों के लिए यह 60:40 हो सकता है। इसके अलावा अगर कोई राज्य तय सीमा से ज्यादा खर्च करता है, तो अतिरिक्त राशि उसे खुद वहन करनी होगी। सरकार का तर्क है कि इससे राज्यों की जवाबदेही बढ़ेगी और योजनाओं का बेहतर क्रियान्वयन होगा।
नए विधेयक में खेती के मौसम को लेकर भी बड़ा बदलाव प्रस्तावित है। खेती के पीक सीजन यानी बुवाई और कटाई के दौरान रोजगार गारंटी पर अस्थायी ब्रेक का प्रावधान किया जा सकता है, ताकि खेतों में मजदूरों की कमी न हो। राज्यों को हर वित्तीय वर्ष में लगभग 60 दिन की ऐसी अवधि पहले से घोषित करनी होगी, जो अलग-अलग जिलों या ब्लॉकों में अलग हो सकती है। सरकार इसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था के हित में बता रही है, लेकिन विपक्ष का कहना है कि इससे सबसे ज्यादा नुकसान गरीब मजदूरों को होगा, जिनके लिए मनरेगा ही सहारा है।
योजना के नाम से महात्मा गांधी को हटाने पर विवाद और तेज हो गया है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इसे बीजेपी-आरएसएस की साजिश बताया है। उनका कहना है कि यह सिर्फ नाम बदलने की बात नहीं है, बल्कि धीरे-धीरे मनरेगा को कमजोर कर खत्म करने की तैयारी है। प्रियंका गांधी ने लोकसभा में सवाल उठाया कि महात्मा गांधी का नाम हटाने की क्या जरूरत थी। उन्होंने कहा कि गांधी सिर्फ कांग्रेस के नहीं, पूरे देश और दुनिया के नेता हैं, फिर उनके नाम से परहेज क्यों। जयराम रमेश ने सरकार पर आरोप लगाया कि वह योजनाओं के नाम बदलने में माहिर है और यह सब पैकेजिंग और ब्रांडिंग की राजनीति है।
कांग्रेस ने यह भी याद दिलाया कि पिछले 11 सालों में मोदी सरकार ने कई यूपीए कालीन योजनाओं के नाम बदले हैं। इंदिरा आवास योजना का नाम प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण कर दिया गया, जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण मिशन की जगह अमृत योजना लाई गई, राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना को दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना में बदला गया। कांग्रेस का आरोप है कि अब मनरेगा के साथ भी वही किया जा रहा है, ताकि पुरानी सरकारों का श्रेय मिटाया जा सके।
विपक्ष ने इस विधेयक को संसद की स्थायी समिति को भेजने की मांग की है, ताकि इसके हर पहलू पर गंभीर चर्चा हो सके। उनका कहना है कि मनरेगा एक अधिकार आधारित कानून है, जिसने ग्रामीण गरीबों को कानूनी हक दिया है। नया कानून इसे सरकारी योजना भर बना सकता है, जिससे मजदूरों की ताकत कमजोर होगी। वहीं सरकार का कहना है कि वह किसी का हक नहीं छीन रही, बल्कि रोजगार के दिन बढ़ाकर और भुगतान व्यवस्था सुधारकर इसे और मजबूत बना रही है।
इस पूरे विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या बदलाव सिर्फ नाम और ढांचे का है या इसके पीछे गहरी राजनीतिक मंशा भी है। एक तरफ सरकार ‘विकसित भारत 2047’ के सपने की बात कर रही है, तो दूसरी तरफ विपक्ष इसे गरीबों के अधिकारों पर हमला बता रहा है। गांव, रोजगार और गांधी के नाम पर छिड़ी यह बहस आने वाले दिनों में संसद से लेकर सियासत के मैदान तक और तेज होने के आसार दिखा रही है।
