रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत की दो दिवसीय यात्रा ने अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है। गुरुवार से शुक्रवार तक चली इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने विभिन्न क्षेत्रों में गहरे और व्यापक सहयोग की योजना बनाई, जो न केवल द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करेगी बल्कि क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिरता में भी सहायक साबित होगी। पुतिन की यह यात्रा ऐसे समय में हुई है जब विश्व राजनीति में बदलाव और नई रणनीतियों की जरूरत महसूस की जा रही है, जिससे इस दौरे की अहमियत और भी बढ़ जाती है।पुतिन की भारत यात्रा के दौरान प्रमुख मुद्दों पर चर्चा हुई, जिनमें ऊर्जा, रक्षा, व्यापार और भू-राजनीतिक सहयोग शामिल थे। भारत और रूस के बीच लंबे समय से चल रहे ऊर्जा सहयोग को आगे बढ़ाने के कदमों पर सहमति बनी। विशेष रूप से परमाणु ऊर्जा और तेल-गैस क्षेत्रों में दोनों देशों ने सहयोग को और विस्तृत करने पर जोर दिया। इसके साथ ही रक्षा तकनीक और हथियार प्रणालियों के क्षेत्र में भी साझेदारी को मजबूत करने की योजना बनाई गई। यह कदम भारत की सुरक्षा जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ रूस के हथियार निर्यात को बढ़ावा देगा।दोनों नेताओं ने वैश्विक और क्षेत्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर भी गहन विचार-विमर्श किया। रूस और भारत ने अफगानिस्तान की स्थिति, आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई, और दक्षिण एशिया में शांति स्थिरता बनाए रखने के महत्व पर अपनी संकल्प साझा की। यह बात अहम है क्योंकि क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में इन दोनों शक्तियों का सहयोग महत्तवपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
हालांकि, इस यात्रा की कुछ राजनीतिक पृष्ठभूमि भी रही। माना जा रहा है कि पुतिन के भारत दौरे से अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत को लेकर नाराजगी बढ़ी है। ट्रंप के दौर में भारत-अमेरिका के बीच सुरक्षा और रणनीतिक साझेदारी को मजबूत किया गया था, लेकिन रूस के साथ भारत की बढ़ती निकटता कुछ हद तक ट्रंप की विदेश नीति से मेल नहीं खाती। इस संदर्भ में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने स्पष्ट किया कि भारत अपनी विदेश नीति में किसी एक पक्ष पर निर्भर नहीं रहता और जियोपॉलिटिक्स में उतार-चढ़ाव के बीच भी रूस के साथ भारत के रिश्ते सबसे बड़े और सबसे मजबूत रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भारत अपनी आज़ाद विदेश नीति पर कायम रहेगा और सभी बड़े देशों के साथ अपने संबंधों को संतुलित तरीके से बनाए रखेगा।भारत के लिए रूस के साथ यह रिश्ता केवल राजनीतिक या सैन्य सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आर्थिक और सांस्कृतिक स्तर पर भी गहरा है। भारत में रुसी तकनीक, शिक्षा और संस्कृति का व्यापक प्रभाव है। मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में रूस के साथ साझेदारी विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जहां हजारों भारतीय छात्र हर साल रूस में उच्च शिक्षा प्राप्त करते हैं। इसके अलावा, दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक विनिमय और पर्यटन भी नए आयाम प्राप्त कर रहे हैं।पुतिन की यात्रा के दौरान भारत ने रूस से कई निवेश परियोजनाओं की पुष्टि की, जिनमें तेल और गैस उद्योग की विस्तार योजनाएं प्रमुख हैं। इसके साथ ही, दोनों देशों ने अपना व्यापारिक आंकड़ा बढ़ाने की इच्छा जताई जो आने वाले वर्षों में दोनों अर्थव्यवस्थाओं के लिए लाभकारी सिद्ध होगा। तकनीकी और वैज्ञानिक अनुसंधान में सहयोग भी बढ़ेगा जिससे दोनों देशों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मजबूती मिलेगी।
रक्षा-क्षेत्र में, भारत ने रूस से कुछ अत्याधुनिक हथियार प्रणालियों की खरीद की योजना बनाई है। यह भारत की रक्षा क्षमता को बढ़ाने और उसके रणनीतिक हितों की रक्षा करने में सहायक होगा। यह समझा जा सकता है कि रूस के हथियार भारत के लिए सिर्फ उपकरण नहीं, बल्कि रक्षा नीति और सैन्य रणनीति का अभिन्न हिस्सा हैं।जैसी स्थिति विश्व राजनीतिक परिदृश्य में लगातार बदल रही है, भारत की यह कोशिश कि वह सभी महाशक्तियों के साथ संतुलित और मजबूत संबंध बनाए, उसकी रणनीतिक दृष्टि को दर्शाती है। पुतिन की यात्रा ने यह स्पष्ट कर दिया कि रूस भारत के लिए एक विश्वसनीय और स्थिर साझेदार है, जो दोनों देशों के बीच व्यापक सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है।
पुतिन की भारत यात्रा ने इस क्षेत्र की जियोपॉलिटिक्स में एक अहम बदलाव की भूमिका निभाई है। इससे न केवल भारत-रूस संबंधों को नया आयाम मिला है, बल्कि भारत की विदेश नीति की गहराई और व्यापकता भी आईने के सामने आई है। ये रिश्ते भारत के लिए राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा क्षेत्रों में स्थिरता और विकास का मार्ग प्रशस्त करेंगे।बहरहाल, पुतिन की इस यात्रा ने भारत को विश्व के वैश्विक महाशक्तियों के बीच अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत करने का अवसर प्रदान किया है। चाहे वह आर्थिक सहयोग हो, रक्षा समझौते हों या सामरिक सहयोग, यह यात्रा दोनों देशों के हितों को नई ऊंचाइयों पर ले जाने में सहायक रही। भविष्य में यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत और रूस किस तरह इन समझौतों को व्यवहार में लाते हैं और इनके आधार पर वैश्विक राजनीति में किस तरह की सक्रियता भारत दिखाता है।
